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डाॅ. एलएस यादव का लेख : रक्षा चुनौतियां अधिक, बजट कम

रक्षा बजट से सारा देश ही नहीं बल्कि दूसरे देशों के लोग इस बात का अंदाजा लगाते हैं कि भारत की रक्षा तैयारियां किस तरह की मजबूती की तरफ बढ़ रही हैं। हमें नए परिवेश को ध्यान में रखकर परंपरागत लड़ाई के साथ साइबर युद्धों की भी तैयारियां कर लेनी चाहिए। आज विश्व के विकसित देश इस ओर कदम बढ़ा रहे हैं और जो देश इसमें पीछे रह गए वे नुकसान भी उठा सकते हंै क्योंकि हम जिन हथियारों की तैयारी में लगे हैं भविष्य में शायद उनकी जरूरत कम ही पड़े और यौद्धिक संक्रियाओं का रुख नवीन युद्ध प्रणालियों की तरफ बढ़ जाए। आवश्यकता इस बात की भी है कि रक्षा बजट में इन तैयारियों के लिए भी धन निर्धारित किया जाए।

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म्यांमार सेना (प्रतीकात्मक फोटो)

डाॅ. एलएस यादव

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा एक फरवरी को पेश किए गए बजट में वित्त वर्ष 2021-22 के लिए रक्षा बजट को बढ़ाकर 478195.62 करोड़ रुपये किए जाने का प्रावधान किया गया है, जबकि पिछला रक्षा बजट 471378 करोड़ रुपये था। स्पष्ट है कि पिछले साल की तुलना में 6817.62 करोड़ रुपये की मामूली वृद्धि की गई है, जबकि पिछले वर्ष की तुलना में भारत की रक्षा चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं। भारत के पुराने प्रतिद्वंद्वी चीन के साथ एलएसी पर तनाव चलते हुए काफी दिन हो चुके हैं। पाकिस्तान की सीमा पर खतरे एवं चुनौतियां बरकरार हैं। इसके अलावा समुद्र की तरफ से भी भारत को चुनौतियां मिल रहीं हैं।

यह भी सर्वविदित है कि पाकिस्तान व चीन सहित विश्व के अनेक देश भारत की तुलना में सुरक्षा पर अधिक धन खर्च कर रहे हैं, फिर भी भारत सुरक्षा पर कम धन खर्च कर रहा है। सीमा पर तनाव को देखते हुए सैन्य खरीद की विशेष आवश्यकता थी। सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा ढांचा मजबूत करना भी जरूरी हो गया है। इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में तकनीकी विकास के लिए भी अधिक धन की जरूरत थी। वर्तमान सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर यह औसत 2.50 प्रतिशत से ज्यादा होना चाहिए। वैश्विक रक्षा खर्च का मानक 2.25 फीसदी है। भारत का रक्षा बजट वैसे तो पांच लाख करोड़ के नजदीक पहुंच गया है, लेकिन अन्य देशों की तुलना में काफी कम है।

रक्षा बजट से सारा देश ही नहीं बल्कि दूसरे देशों के लोग इस बात का अंदाजा लगाते हैं कि भारत की रक्षा तैयारियां किस तरह की मजबूती की तरफ बढ़ रही हैं। हमें नए परिवेश को ध्यान में रखकर परंपरागत लड़ाई के साथ साइबर युद्धों की भी तैयारियां कर लेनी चाहिए। आज विश्व के विकसित देश तरफ अपने कदम बढ़ा रहे हैं और जो देश इसमें पीछे रह गए वे नुकसान भी उठा सकते हंै क्योंकि हम जिन हथियारों की तैयारी में लगे हैं भविष्य में शायद उनकी जरूरत कम ही पड़े और यौद्धिक संक्रियाओं का रुख नवीन युद्ध प्रणालियों की तरफ बढ़ जाए। ऐसे मे आवश्यकता इस बात की भी है कि रक्षा बजट में इन तैयारियों के लिए भी धन निर्धारित किया जाए।

रक्षा बजट में की गई कम बढ़ोत्तरी से तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण की योजनाओं के प्रभावित होने की संभावना बनी रहेगी। चीन तथा पाकिस्तान की ओर से दी जा रही युद्ध की चुनौती के लिए सेना को हर समय तैयार रखना जरूरी है। आगामी वित्त वर्ष के लिए आवंटित 478195.62 करोड़ रुपये में से यदि सेना के पेंशन मद के खर्च को हटा दिया जाए तो 3.62 करोड़ रुपये की धनराशि बचती है जबकि पिछले वर्ष यह 3.37 करोड़ रुपये थी। चुनौतियों के हिसाब से यह बढ़ोत्तरी कोई खास नहीं है। रक्षा बजट में सैन्य आधुनिकीकरण के लिए 135060 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं, पिछले वर्ष यह राशि 113734 करोड़ रुपये थी। सरकार की योजना है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनते हुए रक्षा उपकरणों का निर्यात किया जाए। इस बात के मद्देनजर यह धनराशि काफी कम होगी। आगामी वर्ष में सेना का खर्च ज्यादा बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि लद्दाख में चीन की चुनौती को देखते हुए करीब 50000 सैनिकों की तैनाती की जा चुकी है। इसके अलावा वहां टैंकों, विमानों एवं मिसाइलों की तैनाती कर दी गई है जिससे युद्ध की स्थिति से निपटा जा सके। ऐसे में और अधिक रक्षा बजट की जरूरत थी।

यदि थल सेना की जरूरतों की तरफ ध्यान दिया जाए तो बड़ी संख्या में तोपों की खरीद का सौदा हो चुका है। अमेरिका से तोपों एवं असाॅल्ट राइफलें खरीदने पर धन खर्च किया जाना है। बड़ी संख्या में होवित्जर एम-777, के-9 बज्र होवित्जर एवं धनुश श्रेणी की होवित्जर तोपों की जरूरत पूरी की जानी है। थल सेना के हेलिकाॅप्टर बेड़े की मजबूती के लिए हल्के उपयोग वाले हेलिकाॅप्टरों की खरीद की जानी है। चीन से लगने वाली उत्तरी एवं पूर्वी सीमा पर ढांचागत विकास तथा धीमी गति से विकसित की जा रही पर्वतीय डिविजन के गठन में तेजी लाने के लिए धन की दरकार है। यही नहीं थल सेना की अन्य जरूरतों में मुख्य युद्धक टैंक टी-90 एमएस की बड़ी संख्या में खरीद की जानी है। लाखों की संख्या में ए.के.-203 राइफलों की खरीद करोड़ों रुपये की होगी। सेना को बैरेट्टा स्काॅर्पियो स्नाइपर राइफलें व एम-95 एमएस बैरेट-50 बीएमजी एंटी मैटीरियल राइफलें चाहिए। बुलेट प्रूफ जैकेटों एवं बुलेट प्रूफ हेल्मेटों की जरूरतों को भी पूरा किया जाना है। थल सेना के लिए काॅम्बैट व्हीकल आईसीवी की बड़ी संख्या में जरूरत है। एंटी टैंक मिसााइलों व पैदल सैनिकों को जंग के मैदान तक ले जाने वाले एफआईसी वाहनों की खरीद की जानी है। सेना को उच्च खमता वाले रेडियो रिले एवं बड़ी मात्रा में लाइट मशीनगनें भी चाहिए।

यह सब आयुध प्रणालियां इस बजट से कैसे पूरी होंगी? वायु सेना का खर्च सबसे ज्यादा एवं महत्वपूर्ण है क्योंकि मिग-27 विमानों के बेड़ों की विदाई हो चुकी है। इनकी जगह तेजस विमानों के बेड़े तैयार किए जाने हैं, एलसीए तेजस के 83 विमानों को एचएएल से लिये जाने का आर्डर अभी हाल ही में दिया गया है। जिनकी कीमत 49797 करोड़ रुपये है। इसका भुगतान भी किया जाना है। भारत तेजस मार्क-2 को विकसित कर जल्द ही वायु सेना में शामिल करना चाहता है, जिसमें बड़ी धनराशि की जरूरत होगी। तेजस विमानों का उत्पादन शुरू करने के अलावा वायु सेना को हेलिकाॅप्टरों की जरूरत है। राफेल विमानों की खरीद का भुगतान किया जाना है। सुखोई विमानों का बेड़ा बढ़ाने के लिए रूस से खरीदारी होनी हैं। चिनूक व अपाचे अभी पूरी संख्या में नहीं मिले हैं। इन पर भी खर्च करना पड़ेगा। ड्रोन विमानों की खरीद की जानी है। एस-400 मिसाइल डिफेन्स सिस्टम, एयर डिफेन्स गनों और डोर्नियर विमानों पर धन खर्च होगा।

नौसेना की जरूरतों में नए बहुउद्ेदश्यीय हेलिकाॅप्टर व पनडुब्बी निरोधक बम शामिल हैं। छह पनडुब्बी खरीदे जाने का सौदा अभी हाल ही में हुआ है। निकट भविष्य में पुराने चेतक हेलिकाॅप्टरों की जगह नए हेलिकाॅप्टरों की खरीद की जानी है जो इस बजट से सम्भव नहीं है। अरिहन्त क्लास की पनडुब्बियां, अकुला श्रेणी की न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बियां, एसएसएन श्रेणी की परमाणु पनडुब्बियां की संख्या बढ़ाई जानी है। प्रोजेक्ट-75 के तहत भी कुछ पनडुब्बियां निर्मित हो रही हैं। एस-5 क्लास की एसएसबीएन परमाणु पनडुब्बियां भी चुनौतियों के हिसाब से चाहिए। यही नहीं अगली पीढ़ी की मिसाइल पोत भी तैयार की जा रही हैं। युद्ध पोतों का ब्रह्मोस मिसाइलों का बेड़ा नौसेना को शीघ्र चाहिए। अगर मिसाइल क्षेत्र पर नजर डाली जाए तो आकाश मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाया जाना है, क्योंकि इन मिसाइलों की तैनाती चीन सीमा के नजदीक लद्दाख क्षेत्र में कर दी गई है। न्यू जनरेशन की आकाश मिसाइलों को विकसित किया जाना है। आकाश व ब्रह्मोस मिसाइलों के निर्यात किए जाने की उम्मीद है, इसलिए निर्माण में तेजी लानी होगी। इन कामों के लिए धन की जरूरत है।

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