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दोषियों को सजा जरूरी

मौजूदा राजनीतिक माहौल ऐसा बन गया है जिसमें सभी दल कड़वा-कड़वा थू-थू और मीठा-मीठा गप-गप की लकीर पर चल रहे हैं।

दोषियों को सजा जरूरी
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गुड़गांव के जमीन घोटाले पर भले ही न्यायाधीश एसएन ढींगरा ने अपनी 182 पेज की रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंप दी है, लेकिन जब तक यह सार्वजनिक नहीं हो जाती तब तक किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। वैसे जिस दिन रिपोर्ट आई उसी दिन से सियासत के गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिल चालू है।
कांग्रेस पार्टी पूरी रिपोर्ट सार्वजानिक करने की मांग कर रही है जबकि भाजपा का कहना है कि इसमें सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की करतूतों का कच्चा चिट्ठा है। सही समय पर इसे सार्वजनिक किया जाएगा। मौजूदा राजनीतिक माहौल ऐसा बन गया है जिसमें सभी दल कड़वा-कड़वा थू-थू और मीठा-मीठा गप-गप की लकीर पर चल रहे हैं। कांग्रेस तो दोहरे मापदंड अपनाने वालों की सरगना है।
मनमोहन सिंह के शासनकाल में हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने वाड्रा द्वारा गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में जमीन खरीदने और कुछ समय बाद ही उसे करोड़ों रुपये के मुनाफे पर बेचने की घटना पर विस्तृत रिपोर्ट देकर नेहरू-गांधी परिवार की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। खेमका की रिपोर्ट से वाड्रा ही नहीं हरियाणा सरकार द्वारा किए जमीन घोटालों का भी पता चलता है। रिपोर्ट के अनुसार 2005 से 2012 के बीच सात साल में राज्य सरकार के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने 213666 एकड़ जमीन के लाइसेंस जारी किए।
हुड्डा सरकार के शासन काल में जारी जमीन लाइसेंस कांड में दो खरब से 3.5 खरब रुपये का घोटाला हुआ जो कोयला और 2-जी घोटाले से भी बड़ा है। ऐसे में अकेले रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ नहीं, हरियाणा सरकार के विरुद्ध भी जांच होनी चाहिए। खेमका ने अपनी सौ पेज की रिपोर्ट में वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटलिटी द्वारा 3.53 एकड़ जमीन खरीद सौदे को तार-तार कर दिया था। खेमका की रिपोर्ट के अनुसार जब वाड्रा ने 8 फरवरी, 2008 में जमीन खरीदने का सौदा किया तब उसकी कंपनी की पेडअप कैपिटल मात्र एक लाख रुपये थी।
वाड्रा ने कारपोरेशन बैंक का जाली चेक लगाकर जमीन की रजिस्ट्री करा ली। जमीन का मूल्य 7.5 करोड़ रुपये दिखाया और रजिस्ट्री पर खर्चा आया 45 लाख रुपये। जमीन खरीदने के 18 दिन के भीतर हरियाणा सरकार के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने लैंड यूज बदलकर इस जमीन पर कॉलोनी बनाने का लाइसेंस जारी कर दिया। खरीदने के छह महीने बाद वाड्रा ने अपनी जमीन 58 करोड़ रुपये में डीएलएफ को बेच दी।
डीएलएफ से जो अग्रिम पैसा मिला वाड्रा ने उसी से जमीन का मूल्य चुकाया। मतलब यह है कि बिना एक भी धेला खर्च किए सोनिया गांधी के दामाद ने सिर्फ छह महीने में 40 करोड़ रुपये से ज्यादा कमा लिए। मामले की निष्पक्ष जांच कराने की बजाय तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वाड्रा का बचाव किया था। तब इस मुद्दे पर संसद की कार्यवाही भी ठप हुई, लेकिन सोनिया गांधी वाड्रा के खिलाफ कोई कदम उठाने को राजी नहीं हुईं।
हालात यह बने कि हरियाणा से कांग्रेस के तत्कालीन सांसद राव इन्द्रजीत ने तो राबर्ट वाड्रा के खिलाफ जांच की मांग खुले आम कर दी थी। आज आम आदमी को यह महसूस होने लगा है कि बड़े नेताओं, उनके परिवार को सजा मिलना लगभग असंभव है। जनता का कानून में विश्वास बहाल करने के लिए कसूरवार कुछ बड़े और असरदार लोगों को सजा दिलाना निहायत जरूरी है।
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