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चुनाव सुधारों पर बहस हो

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का कहना है कि उनके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है जिससे इन ‘हेट स्पीच'' को रोका जाए।

चुनाव सुधारों पर बहस हो

सभी पांच विधानसभाओं के जो चुनाव हुए उसमें कई बातें उभर कर आई। सभी दलों ने मर्यादा लांघकर एक दूसरे को कसकर गालियां दी और भर्त्सना की। इसे अंग्रेजी में ‘हेट स्पीच' कहते हैं। नेताओं ने सारे बांध तोड़ दिए और जो मन आया एक दूसरे के खिलाफ विषवमन करते रहे।

हाल में दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों एसवाई कुरैशी और एचएस ब्रह्मा से दिल्ली के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार के संवाददाताओं ने पूछा कि इस तरह की ‘हेट स्पीच' पर चुनाव आयोग प्रतिबंध क्यों नहीं लगाता है? उन दोनों पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का कहना था कि उनके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है जिससे इन ‘हेट स्पीच' को रोका जाए।

यदि इस तरह का अनर्गल भाषण देने वालों पर ‘एफआईआर' दर्ज की जाती है तो वह मुकदमा 10-15 वर्षां तक चलेगा और तब तक सारा खेल समाप्त हो जाएगा।

आवश्यकता इस बात की है कि सारे राजनीतिक दल चुनाव के महत्व को समझें और एक दूसरे के खिलाफ विषवमन नहीं करें,परंतु लाख टके का प्रश्न है कि ये राजनेता क्या भविष्य में इस तरह का सिद्धांत अपनाएंगे? इन दोनों पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने कहा कि देश में चुनाव सुधार की बड़ी आवश्यकता है।

उन्होंने कई बार इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विभिन्न सरकारों का ध्यान आकर्षित किया है,परंतु उन्हें केवल निराश हाथ लगी है। यह सच है कि विमुद्रीकरण के कारण चुनाव में कालेधन का उपयोग काफी हद तक रुक गया था, परंतु फिर भी विभिन्न टीवी चैनलों पर करोड़ों रुपये के नए नोट पकड़े जाने दृश्य दिखाए गए।

ये नोट विभिन्न राजनेताओं द्वारा चुनाव के दौरान काम में आने वाले थे। एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इतनी बड़ी राशि नए नोट के रूप में आखिर इन राजनेताओं के पास कैसी आ गई? इन दोनों पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने कहा कि परंपरा यह है कि चुनाव के दो दिन पहले हर तरह का प्रचार बंद हो जाता है।

केवल विभिन्न राजनीतिक दलों के राजनेता घर धर जाकर प्रचार कर सकते हैं, परंतु इसमें पेंच यह है कि चुनाव के 48 घंटे पहले जो इस तरह की रोक लगाई जाती है उसी दौरान विभिन्न पार्टियों के नेता अलग अलग क्षेत्रों में जाकर पैसे चुपचाप बांट देते हैं जिसकी किसी को कानों कान खबर नहीं होती है। स्वच्छ चुनाव प्रक्रिया के लिए यह सबसे बड़ा घपला होता है।

उन्होंने स्वयं संवाददाताओं से पूछा कि क्या विभिन्न राजनीतिक दल इस तरह घर-घर चुनाव प्रचार चुनाव के 48 घटे पहले बंद करने के पक्ष में होंगे? जाहिर है कि कोई भी तैयार नहीं होगा, क्येांकि सबका इसमें निहित स्वार्थ है।

इन दोनों मुख्य चुनाव आयुक्तों ने कहा कि मीडिया को सख्त हिदायत दी गई है कि किसी प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव से दो दिन पहले कोई प्रचार नहीं करें, परंतु यह देखा गया है कि ठीक चुनाव के दिन विभिन्न राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों के पक्ष में एक पूरे पेज का विज्ञापन विभिन्न समाचारपत्रों में प्रकाशित कर देते हैं।

स्वाभाविक है कि इस तरह के विज्ञापनों का असर मतदाताओं पर पड़ता है। क्या विभिन्न राजनीतिक दल इस तरह के विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए तैयार हो जाएंगे? पांचों विधानसभाओं के चुनाव संपन्न हो गए, परंतु इस चुनाव ने पूरे समाज में एक ऐसी कटुता छोड़ दी जिस पर जल्दी मरहम नहीं लगाया जा सकेगा।

लोकसभा और विधानसभा के चुनावों के लिए कानून में प्रावधान है कि कोई प्रत्याशी एक सीमित रकम ही खर्च कर सकेंगे,परंतु इन चुनावों में प्रत्याशियों ने और उनकी पार्टियों तथा उनके समर्थकों ने पानी की तरह पैसा बहाया।

बेशक अधिकतर प्रत्याशी चुनाव हार गए, परंतु क्या कोई गरीब और ईमानदार प्रत्याशी चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाएगा और यदि उसने चुनाव लड़ने की योजना भी बनाई तो वह इतने पैसे कहां से लाएगा?

विधानसभा चुनावों के दौरान जब अनेक प्रत्याशियांे ने अपनी चल और अचल संपत्ति का विवरण दिया तो उन दृश्यों को टीवी पर देखकर आम जनता की आंखें फटी की फटी रह गई।

कई राज्यों में अनेक ऐसे प्रत्याशियों ने अपनी आमदनी का खुलासा किया जिसमें यह वर्णन था कि पांच वर्ष पहले उनकी सालाना आमदनी केवल कुछ हजार रुपये थी। अब वह करोड़़ों की हो गई है।

आश्चर्य की बात यह है कि इस तरह का खुलासा करने पर न तो चुनाव आयोग और न आयकर अधिकारी उनसे पूछते हैं कि पांच वर्षें में उन्होंने इतनी संपत्ति कैसे अर्जित की। इसमें कोई संदेह नहीं कि विभिन्न राज्यों में विकास के नाम पर सरकार द्वारा जो धन खर्च किया जाता है उसे ये राजनेता बेरहमी से लूटकर अकूत संपत्ति जमा कर लेते हैं। इस तरह की लूट में सबसे ऊपर राजनेता रहते हैं। फिर ठेकेदार, इंजीनियर और सरकारी अफसर।

यदि कभी किसी ने इन नेताओं के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत की तो इन तथाकथित नेताओं के बाहुबली उन्हें धूल चटा देते हैं। आम जनता किसी लफड़े में नहीं पड़ना *चाहती है।

इसलिए जो चलता है उसे चलने दो *के सिद्वांत पर चलकर आम जनता देखकर मक्खी निगल जाती है। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में अपने सांसदों से कहा कि वे तबादले और पोस्टिंग के लिए मंत्रियों पर दबाव नहीं डालें।

अनेक राज्यों में तबादला और पोस्टिंग व्यापार बन गया है। ये राजनेता मंत्रियों पर दबाव डालकर मनपसंद इंजीनियरों और अफसरों की पोस्टिंग कराते हैं और उनकी मदद से कालाधन कमाते हैं।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि सांसद न तो स्वयं कोई ठेका लें और इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार करें कि उनका कोई रिश्तेदार कोई ठेका नहीं ले। यही बात उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने भी विधानसभा सदस्यों को कही है।

होता यह है कि ये राजनेता मंत्रियों पर दबाव डालकर मनपंसद इंजीनियरों और अफसरों की पोस्टिंग कराते हैं और उनकी मदद से कालाधन कमाते हैं। वे लोगों को खनिज पदार्थों के दोहन का ठेका दिलाते हैं और हिस्सेदार बन जाते हैं। दोनों पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव प्रक्रिया में सुधार होना चािहए और इसके लिए पूरे देश में हर स्तर पर खुलकर बहस हो।

यदि चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी को रोका नहीं गया तो भारत से लोकतंत्र धीरे धीरे समाप्त हो जाएगा। अतः यह सबके हित में है कि चुनाव प्रकिया में होने वाले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जाए।

प्रधानमंत्री ने यह भी सुझाव दिया है कि प्रतिवर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं, इसलिए अच्छा यह होगा कि पहले की तरह ही लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों जिससे खर्च भी कम होगा और पुलिस व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त कर मतदान कराया जा सकेगा।

इस मुद्दे पर भी पूरे देश में बहस होनी चाहिए। देश की कुल आबादी में 35 वर्ष के कम उम्र के युवकों की संख्या अधिक है। यदि उन्हें चुनाव प्रक्रिया की गड़बडी से अवगत कराया जाए तो क्रातिकारी बदलाव आयेगा। समय आ गया है जब देश में चुनाव सुधाराें पर खुलकर बहस हो।

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