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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : बेटियों को बराबरी का हक

सुखद है कि कानूनी फैसलों से बेटियों के अधिकारों से जुड़ी जटिलताएं दूर हो रही हैं। इन फैसलों का असर सामाजिक-पारिवारिक सोच की दिशा तय करने में भी अहम्ा भूमिका निभाएगा। बाप-दादा की संपत्ति के बंटवारे जुड़ा सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला स्त्रियों के जीवन के लिए दंश बनी लैंगिक असमानता के हर पक्ष पर सकारात्मक असर डालेगा, जिससे बेटियों के प्रति हमारे समाज-परिवार में विचार और व्यवहार के स्तर पर मौजूद कई दोहरे मानक टूटेंगे।

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सुप्रीम कोर्ट फ़ोटो फ़ाइल

डॉ. मोनिका शर्मा

हाल ही में आए उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के मुताबिक अब बेटों की ही तरह बेटियां भी जन्म के साथ पैतृक संपत्ति में बराबरी की हकदार होंगीं। इस विषय में 2005 में हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम बनाया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में व्यवस्था दी है कि पहले के मामले में भी यह कानून लागू होगा। जिसका सीधा अर्थ यह है कि सुप्रीम अदालत ने अपने फैसले के माध्यम से इस कानून में मौजूद विरोधाभास को खत्म कर स्पष्टकर दिया है कि 9 सितंबर 2005 से पहले अगर किसी पिता की मृत्यु हो गई हो तो भी बेटियों को संपत्ति में बेटों के बराबर हिस्सेदारी मिलेगी। हालिया प्रावधान अब वैधानिक रूप से बेटियों के जन्म के समय से ही उनके हमवारिस के अधिकारों को मान्यता देता है।

महिलाओं के प्रति लैंगिक भेदभाव की मौजूदगी वाले हमारे समाज में यह निर्णय बदलाव लाने वाला साबित होगा। यह एक कटु सच है कि अपनों के लिए हर परिस्थति में स्नेह और संबल की बुनियाद बनने वाली बेटियां हमेशा एक परायेपन के भाव को जीती रही हैं। इतना ही नहीं शादी के बाद उनके हिस्से आने वाले कई समझौते और शोषण के हालातों की एक वजह उनके पास कोई संपत्ति या आर्थिक सम्बल न होना ही रहा है। जिसके चलते औरतों का अपना कोई घर नहीं होता जैसी बातें किस्से-कहानियों में ही नहीं असल जिन्दगी में देखने-सुनने को मिलती रहीं हैं। संविधान द्वारा दिए गए समान नागरिक अधिकारों के बावजूद इस मामले में अधिकारहीन और अपनों पर निर्भर रहना जाने कितनी ही औरतों को असहनीय परिस्थतियों में जीने को विवश करता रहा है।

दरअसल, हमारे पारिवारिक ढांचे में बेटियों को लेकर एक परम्परागत सोच का दबदबा रहा है। जिसके चलते उनके साथ किया जाने वाला व्यवहार भी कहीं न कहीं एक तयशुदा भाव के अनुसार ही किया गया। अफसोस कि अपने ही घर में पनपे और पोषित हुए ऐसे विचार और बर्ताव ने उनके जीवन के हर पहलू पर असमानता और प्रताड़ना की स्थितियां पैदा कर दीं। नतीजतन आधी आबादी के साथ दोयम दर्जे की नागरिक का व्यवहार हर मोर्चे पर देखने को मिला है। जन्म लेने के मानवीय हक से लेकर शिक्षा पाने के अधिकार तक, गैर-बराबरी के हालात बन गए। इस भेदभाव के कारण कई कुरीतियों और रूढ़ियों का बोझ भी उनके ही हिस्से आया। ऐसी पक्षपाती सोच का ही नतीजा है कि कई घरों में महिलाओं की राय और भागीदारी के भी कोई मायने नहीं होते।

दरअसल, समानता के बिना सम्मान और सहजता दोनों ही मोर्चों पर कुछ कमी सी रहती है। हमारे समाज में महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव ही उनके जीवन से बहुत कुछ कम हो जाने की बड़ी वजह है। निःस्संदेह, अपने ही घर संपत्ति का हक न पाना उनके जीवन में आने वाले हर अधूरेपन की शुरुआती कड़ी माना जा सकता है। यही वजह है कि लंबे समय से महिलाओं के संपत्ति के अधिकार को लेकर कानून में बदलाव की बात होती रही है। बेटियों को पुश्तैनी जायदाद में हक दिए जाने की चर्चा भी समाज का जागरूक वर्ग काफी वक्त से करता रहा है। इसी के चलते समय-समय पर कानून में बदलाव और संशोधन हुए भी हैं। लेकिन बेटियों के लिए पैतृक संपत्ति के समान उत्तराधिकार के मामले में कई उलझनें बनी हुईं थी। इस ताजा फैसले ने पूरी स्थिति स्पष्ट कर बेटियों के जन्म से ही हकदार होने की स्थिति स्पष्ट कर दी है। गौरतलब है कि बहन-भाइयों के बीच संपत्ति के बंटवारे के जिस केस में यह फैसला आया है उसमें भाइयों ने बहन को इस आधार पर जायदाद में बराबर का हिस्सा देने से इनकार कर दिया था कि उनके पिता की मृत्यु 9 सितंबर 2005 से पहले हुई थी। इसलिए उत्तराधिकार कानून का संशोधन लागू नहीं होगा। अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी दी है कि बेटियों को हर हाल में बेटों के बराबर ही पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलेगा। बेटी को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही साझीदार बनाते हुए अदालत ने तारीख और वर्ष वाली शर्त खत्म कर दी है। इससे कई उलझनें खत्म होंगी।

सुखद है कि कानूनी ही नहीं मानवीय मोर्चे पर भी यह एक सराहनीय निर्णय है। बराबरी के इस हक के बिना अपने आंगन से मन से जुड़ाव रखने वाली बेटियां जीवन में कहीं अलग-थलग सी पड़ जाती थीं। यही कारण रहा कि इस निर्णय को सुनाते हुए न्यायालय ने टिप्पणी की है कि बेटियों को बेटों के समान अधिकार दिया जाना चाहिए, बेटी जीवन भर प्यार करने वाली बेटी बनी रहती है। बेटी पूरे जीवन एक सहदायिक बनी रहेगी, भले ही उसके पिता जीवित हों या नहीं। साथ यह भी कहा गया कि एक बार एक बेटी हमेशा एक बेटी, बेटा तब तक बेटा होता है जब तक उसकी शादी नहीं हो जाती। इसीलिए बेटियों को भी बेटे की तरह संपत्ति के बंटवारे में बराबर हिस्सा दिया जाना चाहिए। यह जरूरी भी है क्योंकि यह केवल आर्थिक स्थिति की बेहतरी से जुड़ा मसला नहीं है। यह विवाहित बेटियों को पैतृक धन दिए जाने भर की नहीं बल्कि सही मायने में उनके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार्यता देने की बात है। कई बार देखने में आता है कि माता-पिता के दुनिया से जाने के बाद अविवाहित बेटियों का अपने ही घर में जीना दूभर हो जाता है। कोई बेटी विधवा हो जाए या शादीशुदा जीवन में अलगाव के हालात बनें तो भी वह अपने घर नहीं लौट पाती। हमारे यहां परंपरागत रूप से शादी के बाद बेटियों को परिवार का सदस्य ही नहीं माना जाता। अब जब वे जन्म के साथ ही पिता की पैतृक संपत्ति की अधिकारी मानी जाएगी तो जीवन के विपरीत हालातों में यह पुश्तैनी जायदाद उनके लिए मददगार साबित होगी। महिलाएं सिर्फ इसलिए शोषण और प्रताड़ना झेलने को मजबूर नहीं होगी कि उसके पास गुजारे के लिए कोई सहारा नहीं, रहने के लिए कोई घर नहीं।

शिक्षित, सजग और सशक्त बेटियां किसी भी राष्ट्र का आज और आने वाला कल दोनों सुदृढ़ बनाती हैं। मायके ससुराल का पुल कही जाने वाली लाडलियां समग्र समाज में संवेदनाओं और सहस्तित्व को पोषित करती हैं। आज तो हर क्षेत्र में बेटियां बेटों के बराबर भागीदारी पुख्ता कर रही हैं। माता-पिता का सहारा भी बनती हैं। बावजूद इसके संपत्ति के बंटवारे के मसले में बंधी-बंधाई लीक चलने वाली यह मनमानी वाकई तकलीफदेह थी। सुखद है कि ऐसे कानूनी फैसलों से उनके अधिकारों से जुड़ी जटिलताएं दूर हो रही हैं। सुखद यह भी कि इन फैसलों का असर सामाजिक-पारिवारिक सोच की दिशा तय करने में भी अहम्ा भूमिका निभाएगा। बाप-दादा की संपत्ति के बंटवारे जुड़ा यह ताजा न्यायिक निर्णय स्त्रियों के जीवन के लिए दंश बनी लैंगिक असमानता के हर पक्ष सकारात्मक असर डालेगा। जिससे बेटियों के प्रति हमारे समाज-परिवार में विचार और व्यवहार के स्तर पर मौजूद कई दोहरे मानक टूटेंगे।

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