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दशहरा 2018: विजयादशमी पर अपने भीतर के रावण का दहन जरूरी

असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय के प्रतीक स्वरूप विजयादशमी का पर्व पूरे देश में अलग-अलग रूप में मनाया जाता है। कई राज्यों और क्षेत्रों में जहां से राम की रावण पर विजय के रूप में मनाया जाता है, तो बहुत से प्रदेशों में इसे दुर्गा पूजा और उनकी महिषासुर पर विजय के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।

दशहरा 2018: विजयादशमी पर अपने भीतर के रावण का दहन जरूरी

असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय के प्रतीक स्वरूप विजयादशमी का पर्व पूरे देश में अलग-अलग रूप में मनाया जाता है। कई राज्यों और क्षेत्रों में जहां से राम की रावण पर विजय के रूप में मनाया जाता है, तो बहुत से प्रदेशों में इसे दुर्गा पूजा और उनकी महिषासुर पर विजय के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।

इस अवसर पर रावण दहन और देवी दुर्गा की पूजा तो होती ही है, इससे पहले नौ से दस दिन तक अलग-अलग तरह के आयोजन भी होते हैं। नवरात्र के समापन के तौर पर इसे देखा जाता है। भारतीय संस्कृति में शुभ कार्यों के लिए जिन तिथियों को सर्वाधिक शुभ माना जाता है, उनमें दशहरा अथवा विजयदशमी भी एक है।

पुराने राजे-महाराजे इसी तिथि पर युद्ध के लिए प्रस्थान करना पसंद करते थे। उनकी मान्यता थी कि इस दिन यदि युद्ध का उद्घोष हो तो विजय निश्चित है। इसी प्रकार घर, प्रतिष्ठान, शासन-प्रशासन में यदि किसी चीज की शुरुआत करनी हो तो इस तिथि को उत्तम माना जाता है। लगभग सभी वर्गों में विजयदशमी के अवसर पर हर्षोल्लास का वातावरण देखा जाता है।

हिमाचल से लेकर गुजरात तक और असम-पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण व उत्तर पश्चिम के तमाम राज्यों मे उत्सव मनाए जाते हैं। कहीं गरबा होता है तो कहीं देवी दुर्गा की शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं। असत्य और बुराई के प्रतीक रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाने की परंपरा भी देश के अधिकांश हिस्सों में मनाई जाती है।

पुतलों के दहन के मौके पर रामलीला मैदानों में शहर भर के नागरिक से लेकर आम ओ खास जुटते हैं। वर्षों से दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री इस मौके पर स्वयं पहुंचकर असत्य के प्रतीक रावण के पुतले को जलते हुए देखने के लिए पहुंचते हैं। जिस प्रकार का उत्साह इस पर्व के दौरान आम जनमानस में देखने को मिलता है,

उससे यह तो साफ तौर पर पता चलता है कि अधिकांश लोग राम राज्य यानी सत्य के मर्यादित और अनुशासित जन कल्याणकारी शासन में विश्वास करते हैं, जहां छल, कपट, भ्रष्टाचार और छिपे उद्देश्यों के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। यह पर्व भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा भी बने हुए हैं,

परंतु अंतरविरोधों की विडंबना देखिए कि कुछ दिन असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय पर तालियां बजाकर खुशी का प्रदर्शन करने वाले लोग समाज और देश में होने वाली इन बुराइयों का उस तरह प्रतिकार नहीं करते, जिसकी उनसे अपेक्षा होती है। कौन सा ऐसा क्षेत्र है, जहां वो सारी बुराइयां नहीं आ गई हैं,

जिनका निषेध इन पर्वों के जरिए हम सहस्रों वर्षों से करते आ रहे हैं परंतु लगता है कि हम लोग जिस तरह दो-तीन घंटे की फिल्म में बुराई का अंत होते देखने के बाद खुशी-खुशी घर लौट आते हैं और फिर किसी न किसी रूप में उसी से मिलती जुलती बुराइयों में लिप्त हो जाते हैं अथवा उनका विरोध नहीं करके उसे बढ़ावा देते हैं,

वैसे ही दशहरे-विजयदशमी के यह पर्व भी संदेश देकर चले जाते हैं और हम बस कागज और खरपच्चियों से बने रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतलों को फंककर समझ लेते हैं कि हमने बुराई का नाश कर दिया। अफसोस की बात यही है कि हम प्रतीक स्वरूपों का दहन करते हैं, अपने भीतर के रावणों का सर्वनाश करने के लिए कुछ नहीं करते।

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