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डा. गौरीशंकर राजहंस का लेख : आपातकाल की स्याह यादें

1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल भारत के इतिहास में एक काला धब्बा था जिसे धोने के लाख प्रयास किये जाएं, वह नहीं धूलेगा। नई पीढ़ी के लोगों को इमरजेंसी की सच्ची बातें पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से अवश्य बताई जानी चािहये। यह तो ईश्वर की कृपा थी कि भारत में लोकतंत्र जिन्दा रहा, अन्यथा यदि इमरजेंसी लम्बे समय तक चलती तो भारत से लोकतंत्र सदा के लिये समाप्त हो जाता और देश में अन्य विकासशील देशों की तरह तानाशाही स्थापित हो जाती।

डा. गौरीशंकर राजहंस  का लेख : आपातकाल की स्याह यादें

डा. गौरीशंकर राजहंस

आज से 45 वर्ष पहले इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई थी। मेरे कई मित्रों का आग्रह है कि मैंने इमरजेंसी को बहुत करीब से देखा है इसलिये पाठकों को इमरजेंसी के बारे में बताऊं। उन दिनों मैं दिल्ली के एक बहुत बड़े समाचारपत्र समूह में सीनियर एक्जीक्यूटिव था। 25 जून की आधी रात को जब देश में इमरजेंसी लगाई गई तो मुझे अंग्रेजी अखबार के न्यूज एडिटर ने आधी रात को नींद में जगाकर कहा कि देश में आपातकाल लगा दिया गया है और अंग्रेजी और हिन्दी अखबारों का छपना बन्द कर दिया गया है, लाखों की संख्या में छपे हुए अखबार बेकार पड़े हैं। अतः मुझे तुरन्त से दफ्तर आ जाना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली के सारे समाचारपत्रों के दफ्तरों की बिजली भी काट दी गई है। इसी कारण समाचारपत्र के कार्यालय से समाचारपत्र नहीं छप रहे हैं।

जल्दी जल्दी दफ्तर पहुंचकर मैंने पता लगाया तो पता लगा कि सारे समाचारपत्रों की बिजली काट दी गई है। अपने निकटवर्ती समाचारपत्रों के संपादकों को फोन करके पूछा तो पता चला कि देश में इमरजेंसी लग गई है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने मित्रों की सलाह पर देश में इमरजेंसी लगा दी है। क्योंकि एक मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज ने उनके चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था। कहा जाता है कि इमरजेंसी लगाने की सलाह उन्हें सिद्वार्थ शंकर रे ने दी थी। जल्दी जल्दी इमरजेंसी का मसौदा तैयार किया गया और इंदिरा गांधी तथा उनके कुछ सहयोगी उसे लेकर तत्कालीन राष्ट्पति फखरूद्दीन अली अहमद के पास गये। उन्हें नीन्द से जगाया गया और उस इमरजेेंसी के ड्ाफ्ट पर उनके दस्तखत करा लिये गये। कोई कैबिनेट की बैठक नहीं हुई। अचानक रेडिया पर आकर इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। देश के सभी विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिये गये।

कुछ दिनों के बाद पता चला कि देश के शासन की बागडौर संजय गांधी ने अपने हाथ में ले ली थी और उनके इशारे से देश का शासन चलने लगा। उनके मुख्य सलाहकार विद्याचरण शुक्ला, बंसीलाल और आेम मेहता थे। जगह जगह धर पकड़ होने लगी और तेजी से लोगों की नसबन्दी होने लगी। 60-70 वर्ष तक के लोगों को पकड़ पकड़ उनकी नसबन्दी की जाने लगी। संजय गांधी की सरकार ने लोगों को हिदायत दी थी कि जो जितनी नसबन्दी करायेगा, उसे उतनी ही तरक्की मिलेगी। लोग नसबन्दी से बचने के लिये भाग भागकर खेतों आदि में छिपने लगे। हमारे दफ्तर में देश के कोने कोने से लोग आते थे और बताते थे कि किस प्रकार सरकारी कर्मचारी उन्हें तबाह कर रहे हैं और उनकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं है।

हम लोगों ने दो-चार बार ऐसे लोगों की कहानी अपने समाचारपत्र में अंग्रेजी और हिन्दी में प्रकाशित भी की। तुरन्त हमें सरकार की ओर से निर्देश आया कि हम इस तरह की कहानी छापनी बन्द कर दें।

अखबारों पर एक तरह का सेंसर लगा दिया गया था। हमें कहा गया था कि पूरे अखबार का फोरमेट तैयार कर सूचना और प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारियों को दिखाया जाए और उनकी स्वीकृति के बाद ही अखबार छपे। यह एक बहुत ही कठिन काम था। क्योंकि उस समय नजदीक के स्थानों पर केवल टैक्सी से अखबार जाते थे और कोई व्यवस्था अलग से नहीं थी।

अखबार का फोरमेट तैयार कर हमारे एक वरिष्ठ अफसर और पत्रकार उसे सूचना और प्रसारण मंत्रालय ले जाते थे जहां बेरहमी से आधे से ज्यादा खबरों को काट दिया जाता था और हमें कहा जाता था कि अखबार के उस स्थान पर कोई बनावटी विज्ञापन छाप दिया जाए। जब हमारे प्रतिनिधि सूचना और प्रसारण मंत्रालय से लौटते थे तो बहुत देर हो जाती थी और जल्दी जल्दी हम आधे अखबार में बनावटी विज्ञापन देकर अखबार छाप देते थे। कंपनी को भयापक घाटा हो रहा था। परन्तु किसी को बोलने की इजाजत नहीं थी।

देश का शासन संजय गांधी, विद्याचरण शुक्ला और बंसीलाल के हाथों में था। जब दो वर्ष के बाद किसी ने इंदिरा गांधी को सलाह दी कि देश में शांति हो गई है और सारे लोग इमरजेंसी से बहुत खुश हैं, तब इंदिरा गांधी ने अचानक इमरजेंसी हटा दी। नतीजा हुआ विपक्ष के जो नेता जेल में बन्द थे, उन्होंने रातों रात 'जनता दल' बना लिया। देश में चुनाव की घोषणा हो गई। इंदिरा गांधी और उनके अधिकतर सहयोगी बुरी तरह हार गये। परन्तु जनता दल में भी बहुत दिनों तक एकता नहीं रही। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। परन्तु जनता दल के अन्य नेता जैसे चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम आदि मोरारजी देसाई को पसन्द नहीं कर रहे थे। अन्त में कुछ महीनों के बाद जनता दल बिखर गया और इंदिरा गांधी दुबारा से शासन में आ गई। परन्तु इमरजेंसी की कटु यादें लोगों के मन में अरसे तक बसी रहीं।

इमरजेंसी में मुख्यमंत्रियों की यह हालत थी कि वे संजय गांधी का जूता ढोते थे और संजय गांधी के इशारे पर लोगों का तबादला करते थे। देश में भय का वातावरण था। इमरजेंसी की भयावह काली रातें और भय का आतंक अभी भी लोगों को यूं का यूं याद है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जिस तरह से नसबन्दी के लिये सताया गया वे सभी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि देश में आपातकाल जैसे भयावह दिन नहीं लौटे। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि इमरजेंसी भारत के इतिहास में एक काला धब्बा था जिसे धोने के लाख प्रयास किये जाएं वह नहीं धूलेगा। नई पीढ़ी के लोगों को इमरजेंसी की सच्ची बातें पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से अवश्य बताई जानी चािहये। यह तो ईश्वर की कृपा थी कि भारत में लोकतंत्र जिन्दा रहा अन्यथा यदि इमरजेंसी लम्बे समय तक चलती तो भारत से लोकतंत्र सदा के लिये समाप्त हो जाता और देश में अन्य विकासशील देशों की तरह तानाशाही स्थापित हो जाती।

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