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प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा है 'फानी'

प्रकृति के अंधाधुंध और अनुचित दोहन के परिणाम पूरा विश्व भुगत रहा है। पिघलते ग्लेशियर, दहकती गर्मी, दरकती धरती, उफनते समुद्र, घटते जंगल, फटते बादल प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का ही नतीजा हैं। प्रकृति के दोहन से पृथ्वी की जलवायु पर दबाव बढ़ता जा रहा है और यही कारण है कि चक्रवातों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। इसी के चलते तीन दशक का सबसे भयंकर च्रकवात फोनी देश के तटवर्ती क्षेत्र ओडिशा, पं. बंगाल में तांडव मचा रहा है।

प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा है

प्रकृति के अंधाधुंध और अनुचित दोहन के परिणाम पूरा विश्व भुगत रहा है। पिघलते ग्लेशियर, दहकती गर्मी, दरकती धरती, उफनते समुद्र, घटते जंगल, फटते बादल प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का ही नतीजा हैं। प्रकृति के दोहन से पृथ्वी की जलवायु पर दबाव बढ़ता जा रहा है और यही कारण है कि चक्रवातों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। इसी के चलते तीन दशक का सबसे भयंकर च्रकवात फोनी देश के तटवर्ती क्षेत्र ओडिशा, पं. बंगाल में तांडव मचा रहा है।

भारी बारिश और करीब 225 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार की प्रचंड हवाओं के साथ फोनी ने शुक्रवार को सुबह ओडिशा तट पर दस्तक दी। भयंकर तूफान के कारण इसके प्रभाव वाले इलाकों में पेड़ उखड़ गए, झोपड़ियां तबाह हो गई हैं और पुरी के कई इलाके पानी में डूबे हुए हैं। तूफान के बाद अब तक तीन लोगों की मौत की खबर है। तकरीबन 12 लाख लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया है।

करीब 10,000 गांवों और 52 शहरी इलाकों से हटाए गए 11 लाख लोग 4,000 शिविरों में ठहरे हुए हैं जिनमें से विशेष रूप से चक्रवात के लिए बनाए गए 880 केंद्र शामिल हैं। पिछले तीन दशकों में पूर्वी तटों से टकराने वाला यह चौथा सबसे खतरनाक चक्रवात है। ओडिशा ने इससे पहले जिन भयानक चक्रवाती तूफानों का सामना किया है, वे साल 1893, 1914, 1917, 1982 और 1989 में आए थे।

अब तक आए सबसे खतरनाक 35 चक्रवाती तूफानों में से 26 बंगाल की खाड़ी से शुरू हुए हैं। 1999 में आए सुपर सायक्लोन, जो ओडिशा में 30 घंटे तक रहा था, में 10 हजार लोग मारे गए थे। इससे पहले 1971 में ऐसे ही चक्रवात में करीब 10 हजार लोग ही मारे गए थे। अक्टूबर 2014 में हुदहुद नाम चक्रवात में 124 लोगों की मौत हुई थी। फोनी चक्रवात की तीव्रता भी लगभग उतनी ही बताई जा रही है।

हालांकि फोनी से जान का ऐसा नुकसान होने की संभावना नहीं के बराबर है। पूर्व में चक्रवातों में जान-माल की हानि इसलिए ज्यादा हुई, क्योंकि हमारे पास ऐसी प्राकृतिक आपदा की पूर्व जानकारी मिलने की तकनीक नहीं थी। अब अंतरिक्ष में हमारे इसरो के सैटेलाइट मौजूद हैं। हालांकि इससे प्राकृतिक आपदा को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन पूर्व जानकारी होने के कारण केंद्र, राज्य सरकारें, आपदा प्रबंधन अधिकारी चौकन्ने हो जाते हैं।

बीते कुछ वर्षों में भारत चक्रवाती आपदाओं से शानदार तरीकों से निपटने में कामयाब रहा है। साल 2013 में ऐसे ही चक्रवाती तूफान फालिन से भारत निपट चुका है। फोनी की भी जानकारी हमें दो दिन पूर्व ही मिल गई थी। इसके बाद तटवर्ती क्षेत्र के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की व्यवस्था की गई। विशेष रूप से चक्रवात के लिए 880 केंद्र बनाए गए। जहां इन लोगों को ठहराया गया।

तूफान की जानकारी मिलते ही पीएम नरेंद्र मोदी ने आपदा से निपटने के लिए हाईलेवल बैठक की और प्रभावित राज्यों के लिए 1000 करोड़ रुपये जारी कर दिए। एनडीआरएफ की 28, ओडिशा डिजास्टर मैनेजमेंट रैपिड ऐक्शन फोर्स की 20 यूनिट और फायर सेफ्टी डिपार्टमेंट के 525 लोग रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए तैयार रखा गया। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग की 302 रैपिड रेस्पॉन्स फोर्स टीम तैनात की गई हैं।

कोस्टगार्ड, भारतीय नौसेना और थल सेना को स्थानीय प्रशासन के सहयोग के लिए अलर्ट कर रखा गया। भुवनेश्वर व कोलकता एयरपोर्ट से फ्लाइट का संचालन रोक दिया गया है। रेलवे ने तूफान के मद्देनजर तीन मई से दिल्ली और हरिद्वार से पुरी, भुवनेश्वर और विशाखापत्तनम समेत 147 ट्रेनें रद कर दी थी। यह सारी व्यवस्था पूर्व सूचना मिल जाने के कारण ही संभव हो पाई। जिसके चलते जान माल की हानि का काबू पाया जा सका।

प्रकृति ऐसी प्रलय न लाए इसके लिए हमें सचेत होना होगा। कुछ सालों में मौसम से जुड़ी कुछ इतनी विचित्र घटनाएं देखने को मिली हैं, जिनकी अतीत में कोई मिसाल नहीं मिलती। जलवायु विज्ञानी एक अर्से से कहते आ रहे हैं कि इंसान के हाथों रची जा रही ग्लोबल वॉर्मिंग धरती के लिए तबाही का सबब बन सकती है। प्रकृति के दोहन से पृथ्वी की जलवायु का असर समुद्र पर भी पड़ रहा है। जिस कारण चक्रवातों की संख्या में वृद्धि हो रही है। हमें अगर ऐसी अापदाओं से बचना है तो प्रकृति का दोहन नहीं बल्कि उससे प्रेम करना होगा।

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