Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

क्या माकपा को बदहाली से उबार पाएंगे येचुरी?

पार्टी के भीतर एक बड़ा समूह इनको महासचिव बनाना चाहता था, लेकिन अंतत: पार्टी की कमान येचुरी के हाथों में देने पर सर्वसम्मति बनी।

क्या माकपा को बदहाली से उबार पाएंगे येचुरी?

मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव के रूप में सीताराम येचुरी का चुनाव अवश्यंभावी था क्योंकि संसद में इस समय वामदलों के प्रतिनिधि के रूप में सबसे महत्वपूर्ण और जाना-पहचाना नेता अभी वही हैं। हालांकि बासठ वर्षीय येचुरी के चुनाव पर अंत-अंत तक अनिश्चितता बनी रही, क्योंकि इस पद के दूसरे दावेदार के रूप में एस रामचंद्रन पिल्लई भी मौजूद थे।

पिल्लई पार्टी की सबसे मजबूत केरल इकाई के उम्मीदवार थे। पार्टी के भीतर एक बड़ा समूह इनको महासचिव बनाना चाहता था, लेकिन अंतत: पार्टी की कमान येचुरी के हाथों में देने पर सर्वसम्मति बनी। उदारवादी सोच वाले येचुरी के सामने कई चुनौतियां मौजूद हैं क्योंकि पूर्व महासचिव प्रकाश करात पार्टी की गिरती हुई लोकप्रियता को संभाल नहीं पाए।

सीताराम येचुरी को इस सवाल के भी हल खोजने होंगे कि वे कौन से फैसले रहे जिसकी वजह से माकपा का प्रदर्शन लगातार गिर रहा है यानी वामदलों में लोगों की दिलचस्पी कम होती प्रतीत हो रही है। पश्चिम बंगाल, जिसे वामपंथी दलों का गढ़ माना जाता था, की सत्ता उसके हाथ से निकल गई है। वहां करीब 35 साल पार्टी ने शासन किया। ममता बनर्जी ने वामपंथ के मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया। केरल में भी उसकी सरकारें रही हैं, लेकिन वहां भी उसे पराजय का सामना करना पड़ा।

अभी सिर्फ त्रिपुरा ही एकमात्र राज्य है जहां पार्टी की सरकार है। वहां भी इसीलिए कि मुख्यमंत्री माणिक सरकार की छवि बहुत ही ईमानदार और काम करने वाले नेता की है। जाहिर है, माकपा, भाकपा, फॉरवर्ड ब्लॉक आदि वामदलों का जनाधार खिसक रहा है। वे आज युवाओं और मध्यवर्ग की बड़ी आबादी को आकर्षित करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। दूसरी ओर देश में कार्यकर्ता के अभाव में काडर भी कमजोर हो रहा है। केंद्र में भी वामपंथी दलों की स्थिति कुछ अलग नहीं है।

साल 2004 में लोकसभा चुनाव में माकपा ने जहां 43 सीटें जीती थी, वहीं अब इसके सिर्फ नौ सदस्य हैं। सीताराम येचुरी के सामने पार्टी की छवि को बदलने और युवाओं व मध्यवर्ग को आकर्षित करने की चुनौती है। उन्हें पार्टी संगठन को भी मजबूत करना होगा। साथ ही इस पर भी मंथन करना होगा कि पार्टी का विस्तार दूसरे राज्यों में किस तरह हो, खासकर हिंदीभाषी राज्यों में क्योंकि वहां अभी भी एक बड़ी आबादी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रही है।

बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की मजबूती और भारतीय जनता पार्टी की लगातार बढ़ते जनाधार के बीच येचुरी माकपा को कितना मजबूत कर पाएंगे यह देखना दिलचस्प होगा। हालांकि येचुरी अपने लचीलेपन विचारों के लिए जाने जाते हैं। साथ ही वे अंग्रेजी व हिंदी सहित कई भाषाएं बोलने में माहिर हैं।

इससे पार्टी को हिंदी भाषी राज्यों में भी संगठन विस्तार में फायदा मिल सकता है। सीताराम येचुरी को आम लोग ज्यादा जानते हैं। उनका चेहरा वाम राजनीति का वह लोकप्रिय चेहरा है, जिसे सामने रखकर माकपा अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए आसानी से अभियान चला सकेगी, ऐसा आम तौर पर पार्टी में लोगों का मानना है। अब देखना होगा कि वे इस उम्मीद पर कितना खरा उतरते हैं।

खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-
Next Story
Top