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एस गुरुमूर्ति का लेख : कोविड : तथ्‍य से परे भ्रामक विमर्श

इस खराब हालत में इस संकट से निपटने के लिए बहुत बड़े राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत थी, लेकिन दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों ने वातावरण को भावनात्मक रूप से इतना प्रभावित कर दिया कि सारे फैक्ट्स और तर्क, असंगत हो गए। इसने जन विमर्श को गलत दिशा में मोड़ दिया, कोविड पर विचारों की दिशा को तोड़-मरोड़ दिया और इस चुनौती का सामना करने के लिए राष्ट्रीय इच्छाशक्ति को नुकसान पहुंचाया। इस अभूतपूर्व सुनामी से निपटने के लिए सामूहिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, न कि तथ्यों को नजरअंदाज करने की।

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कोरोना (फाइल फोटो)

एस गुरुमूर्ति

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दो महीने पहले, 15 फरवरी को घोषणा की थी कि, पिछले सात दिनों में भारत के हर पांचवें (One-fifth) जिले में कोई कोरोना के केस रिपोर्ट नहीं किए गए हैं। ऐसा लग रहा है कि हमने कोविड की गति को सीमित कर दिया है।" जो रोजाना संक्रमण बीते साल 90,000 मामलों तक पीक पर पहुंच गए थे, वो तब तक 9,000 से भी कम पर आ गए थे, लेकिन अप्रैल तक आते आते चीजें नाटकीय रूप से बदलीं और एक अभूतपूर्व आपदा में तब्दील हो गईं। इस खराब हालत में इस संकट से निपटने के लिए बहुत बड़े राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत थी, लेकिन दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों ने वातावरण को भावनात्मक रूप से इतना प्रभावित कर दिया कि सारे फैक्ट्स और तर्क, असंगत हो गए। इसने जन विमर्श को गलत दिशा में मोड़ दिया, कोविड पर विचारों की दिशा को तोड़-मरोड़ दिया और इस चुनौती का सामना करने के लिए राष्ट्रीय इच्छाशक्ति को नुकसान पहुंचाया। ज़रा देखें कि कौन से अहम तथ्य छूट गए।

मुनाफाखोरों की शिकायत

ऑक्सीजन की कमी से मौतें सबसे पहले दिल्ली के कॉरपोरेट अस्पतालों में हुईं। इस महामारी की बदौलत इन अस्पतालों ने भारी मुनाफा कमाया, पिछले साल तो और भी ज्यादा। इस स्थिति पर नेशनल हेराल्ड में गत वर्ष 20 जून को कोविड समय में मुनाफाखोरी शीर्षक से एक रिपोर्ट छपी, जिसमें में कहा गया - '25,090, 53,090, 75,590, 5,00,000, 6,00,000, 12,00,000 रुपये कोई रेंडम आंकड़े नहीं हैं, बल्कि ये दिल्ली के निजी अस्पतालों में प्रतिदिन की लागत और कुल मिलाकर दो सप्ताह का खर्च है। यदि कोई कोरोना संक्रमित हो जाए तो।' व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण- पीपीई, जांच और दवाओं का खर्च मिलाकर यह बिल एक भारतीय की वर्षभर में होने वाली आय के बराबर है। घर में उपचार की फीस भी कोई कम नहीं है, यह प्रतिदिन 5700 रुपये से 21,900 रुपये के बीच है, जांच के खर्चों को छोड़कर। उस रिपोर्ट ने इस लूट के खिलाफ सप्रीम कोर्ट में एक याचिका का भी हवाला दिया। याचिका से सतर्क होकर एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स (एएचपी) और फिक्की के सदस्य सेल्फ रेगुलेशन पर सहमत हुए। अब देखें कि ये सेल्फ रेगुलेशन फीस क्या थी? एएचपी की जेनरल वार्ड की प्रतिदिन की फीस 15000 रुपये जोड़ 5000 रुपये ऑक्सीजन के लिए, आईसीयू की फीस 25000 रुपये जोड़ 10,000 रुपये वेंटिलेटर के लिए। फिक्की की दरें तो और भी ऊंची थीं-17000 रुपये से लेकर 45,000 रुपये प्रतिदिन तक और इससे भी बढ़कर कि अस्पतालों ने पीपीई 375 से लेकर 500 रुपये प्रति किट खरीदा और रोगियों को दस-बारह गुना अधिक कीमत पर भेजा। चेन्नई और मुंबई भी अपवाद नहीं रहे। क्या ये वही अस्पताल हैं जिन्होंने अब जीवन के संवैधानिक अधिकार के तहत सरकार द्वारा ऑक्सीजन आपूर्ति को लेकर याचिकाएं दायर की हैं, जिनके लिए वे रोगियों से प्रतिदिन 5000 रुपये ले रहे थे! क्या किसी ने भी ऑक्सीजन के अभाव में हो रही मौतों पर चल रही बहस के बीच लूट के इन भयानक तथ्यों को सुना? यह बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि अनाप-शनाप मुनाफा कमाने वाले ये अस्पताल मामूली कीमत पर अपना खुद का ऑक्सीजन संयंत्र लगा सकते थे।

ऑक्सीजन का व्यापार अनियंत्रित

ऑक्सीजन का उत्पादन, व्यापार, भंडारण निजी है। भारत में चिकित्सा ऑक्सीजन का व्यापार नियंत्रित या नियमित नहीं है, लेकिन इसकी कीमत रसायन और उर्वरक मंत्रालय के तहत एक स्वायत्तशासी संस्था राष्ट्रीय औषध मूल्य प्राधिकरण (एनपीपीए) द्वारा नियंत्रित की जाती हैं। उत्पादक ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए उद्योगों, अस्पतालों और सरकार के साथ भी निजी अनुबंध करते हैं। अस्पताल निर्णय लेते हैं कि आपात समय में ऑक्सीजन की कितनी जरूरत है, आपूर्ति के समय का आकलन कर उसके अनुसार ऑर्डर करते हैं, लेकिन अस्पतालों ने आपात जरूरतों के लिए कोई प्लानिंग नहीं की और पैसे बचाए, साथ ही इस जरूरत से आगे कमाने की जुगत भी लगाई। क्या किसी ने भी 10 दिन से चल रहे शोर शराबे के बीच इन तथ्यों पर गौर किया?

ऑक्सीजन का कोई अभाव नहीं

दूसरी बात यह कि ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है। हम प्रतिदिन एक लाख टन ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं, इसमें से गुजरात की एक कंपनी ही अकेले पांचवें हिस्से का उत्पादन करती है। इस कुल उत्पादन में से एक बहुत छोटा हिस्सा, लगभग एक प्रतिशत चिकित्सा ऑक्सीजन का होता है। कोविड संकट के दौरान भी यह 5-6 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। तरल रूप में ऑक्सीजन का परिवहन भारी, सुरक्षित टैंकरों के जरिये होता है, जिसमें प्रत्येक पर 45 लाख रुपये की लागत आती है। सबसे बदतर बात तो यह कि मात्र 300 रुपये के ऑक्सीजन को रखने वाले सिलेंडर की कीमत 10,000 रुपये होती है। महामारी के समय यह आपूर्ति श्रृंखला दबाव का सामना नहीं कर सकी।

दोष दूसरे पर मढ़ दिया

पिछले साल कोविड की पहली लहर के बाद, प्रत्येक (दिल्ली) अस्पताल को अपनी ऑक्सीजन उत्पादक इकाई स्थापित करनी चाहिए थी। 40 आईसीयू बेड वाला 240 बेड का अस्पताल सामान्य समय में लगभग 5 लाख रुपये प्रति माह ऑक्सीजन का उपयोग करता है। एक प्रेशर स्विंग एडजॉरप्शन (पीएसए) ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने के लिए कुछ 50 लाख रुपये का खर्च आता है, जिसे वे 18 महीने के भीतर वसूल कर सकते हैं। दिल्ली का प्रत्येक अस्पताल इसे वहन कर सकता था, लेकिन कोई भी ऑक्सीजन संयंत्र लगाने के लिए कीमती जगह आवंटित करने के लिए तैयार नहीं था। इसकी बजाय उन्होंने एक हजार किलोमीटर दूर से ऑक्सीजन खरीदने का विकल्प चुना और इसे अपने बैकयार्ड में नहीं बनाया। एक सर्वे के मुताबिक अधिकांश अस्पताल आपदाओं के दौरान दुर्घटनाओं को आमंत्रित करते हुए एक ही स्थान से एकल पाइपलाइन पर निर्भर करते हैं। सर्वे में अस्पताल के आकार और तरल ऑक्सीजन संयंत्र के लिए अस्पताल की निकटता के आधार पर ऑक्सीजन के कई स्रोतों की सिफारिश की गई।

इस सावधानी को दिल्ली के अस्पतालों में लागू करके वे स्वयं ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते थे, लेकिन उन्होंने नहीं किया। उन्होंने आपदा के दौरान ऑक्सीजन की निर्बाध आपूर्ति के लिए कभी योजना नहीं बनाई। जब ऑक्सीजन के लिए उनकी आपूर्ति लाइनें जिस पर वे मुनाफाखोर थे, असफल हो गए, तो उन्होंने जीवन के संवैधानिक अधिकार का हवाला दिया और अदालत से कहा कि वे सरकारों को ऑक्सीजन देने के लिए निर्देश दें। अदालत की भावनात्मक प्रतिक्रिया ने वास्तव में सरकारों पर दोष को स्थानांतरित करने में मदद की। इसने कोविड पर विमर्श और नैरेटिव को बदल दिया। क्या जनता को पिछले कुछ दिनों में इन महत्वपूर्ण तथ्यों की कोई जानकारी थी?

ऑनस्‍पॉट ऑक्‍सीजन प्‍लांट विफल

वर्तमान बुलंद विमर्श तथ्य रहित है जो अस्पतालों की सप्‍लाई चेन विफलता के लिए सरकार को दोष देता है, वह एक अधिक महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज करता है। इस तरह की आकस्मिकता का पूर्वानुमान लगाते हुए, मोदी सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में 200 करोड़ रुपये की लागत से 162 पीएसए प्‍लांट़स समूचे भारत के सरकारी अस्पतालों के लिए ऑर्डर किए थे। इससे प्रति मिनट 80,500 लीटर मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन हो सकता था। इससे प्रति संयंत्र प्रति दिन लगभग एक टन तरल ऑक्सीजन बन सकती है, लेकिन 162 अस्पतालों के लिए आदेशित संयंत्रों में से केवल 33 ही स्थापित हुए। क्यों? राज्यों के सरकारी अस्पतालों ने ऑन स्‍पॉट ऑक्‍सीजन उत्‍पादन सुविधाओं के लिए केंद्र की योजना विफल कर दी।

द प्रिंट कहता है, ऑर्डर दिसंबर में दिए गए थे, लेकिन जब विक्रेता इंस्टॉलेशन के लिए अस्पतालों में पहुंचे, तो उनमें से अनेक को 'प्रतिरोध का सामना करना पड़ा', 'कोई जगह नहीं' का नाटक करते हुए-समूची आवश्‍यकता के लिए ऑनसाइट उत्पादन के बजाय ऑक्सीजन की खरीद का निर्णय करना निहित स्वार्थ था। इससे पता चला कि केंद्र द्वारा ऑन स्‍पॉट ऑक्‍सीजन सप्‍लाई के लिए अग्रिम योजना को राज्यों द्वारा संचालित अस्पतालों द्वारा भी विफल कर दिया गया था। मीडिया और सोशल मीडिया पर शोर व आरोप-प्रत्‍यारोप में, क्या किसी ने सरकार के इस दूरदर्शी कदम के बारे में सुना है?

नई कोविड सुनामी

एक और भी अधिक महत्वपूर्ण तथ्य जो ऑक्सीजन की कमी पर विमर्श में अनुपस्थित है, वह यह है कि वर्तमान कोविड सुनामी पुराने की वापसी नहीं है, बल्कि पूरी तरह से अप्रत्याशित नई आपदा है। मार्च के पहले सप्ताह से शुरू हुए कोविड प्रकोप ने मार्च के पूरे महीने गति पकड़ी और अप्रैल के पहले दो हफ्तों में तेजी से बढ़ता चला गया। बाद में सुनामी बन गया। सिर्फ सात हफ्तों में, सुनामी, किसी भी प्रत्याशा से परे, बिहार में दैनिक नए मामलों में 522 गुना, यूपी में 399 गुना, आंध्र में 186 गुना, दिल्ली और झारखंड में 150 गुना, पश्चिम बंगाल में 142 गुना और राजस्थान में 123 गुना वृद्धि हुई। यह पिछले साल कोविड 1.0 का दोहराव नहीं है। यह एक नया भारतीय प्रकार का डबल म्‍यूटेंट है जो प्रत्येक स्थान पर उत्पन्न हुई, जहां कोविड 1.0 पहले आ चुका था। कोई भी विशेषज्ञ इसका अनुमान नहीं लगा सका। इस बाढ़ ने अस्पतालों और आईसीयू की सभी योजनाओं को ध्वस्त कर दिया।

राष्ट्रीय इच्छाशक्ति की आवश्यकता

इस अभूतपूर्व सुनामी से निपटने के लिए एक साझा जिम्मेदारी और सामूहिक इच्छा शक्ति की जरूरत है, न कि तथ्यों को नजरअंदाज करने या विमर्श को गलत तरीके से प्रस्तुत करने और दोष को दूसरे के सिर मढ़ने की। कोविड जैसी राष्ट्रीय आपदा के समक्ष भी हमने सामूहिक इच्छाशक्ति की कमी को दिखाया, यह चिंता का विषय है। सरकार द्वारा आपातकालीन उपयोग के लिए अनुमोदित किए गए कोवैक्‍सीन की विपक्षी दलों ने किस प्रकार ब्रांडिंग की, उससे राष्‍ट्र का नुकसान ही हुआ। कांग्रेस नेताओं रणदीप सिंह सुरजेवाला, शशि थरूर, मनीष तिवारी और जयराम रमेश ने कोवैक्‍सीन के खिलाफ कोरस में नारेबाजी की। राजस्थान को छोड़कर, विपक्षी शासित पंजाब, छत्तीसगढ़, केरल, पश्चिम बंगाल और झारखंड ने टीकों के बारे में लोगों के मन में संदेह पैदा किया। नतीजतन, लोगों में टीके के प्रति झिझक पैदा हुई। जनवरी में केवल 33% लाभार्थी डोज के लिए तैयार थे, 40% ने प्रतीक्षा करना पसंद किया और 16% ने 'नहीं' कहा। मार्च में, इच्छुक लोग 57% तक बढ़ गए, इंतजार करने वालों की संख्या आधी रह गई और ना कहने वाले 6% तक कम हो गए। तीन कीमती महीने खो गए। 30 लाख की औसत दैनिक टीकाकरण क्षमता के बावजूद मार्च तक मात्र 9 करोड़ टीके प्रति माह लगाए जा सके। यदि टीके को लेकर हिचक व भ्रम पैदा न की गई होती तो यह संख्या दोगुनी हो सकती थी। इतना ही नहीं, एक राष्ट्र के रूप में हमने अपनी रक्षा क्षमता को कम प्रदर्शित किया। जैसा कि गूगल मोबिलिटी डाटा से पता चलता है, कोविड के जारी रहने के बावजूद हम-प्री-लॉकडाउन अवधि की तुलना में मनोरंजन में 78%, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों में 87%, परिवहन में 92% और खरीदारी में 120% लगभग सामान्य जीवन जीने लगे और वह भी ज्यादातर बिना दो गज की दूरी के और बिना मास्क पहने। अब हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है- जिसका सामना करने के लिए हमें सामूहिक राष्ट्रीय इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। क्या हम इसके लिए सक्षम हैं?

(लेखक तुगलक के संपादक हैं और आर्थिक-राजनीतिक विषयों के टिप्‍पणीकार हैं।)

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