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राष्ट्र की सुरक्षा का विषय सबसे अहम

पिछले तीस दशक के दौरान देश में राजनीति का चरित्र बिल्कुल बदल गया है।

राष्ट्र की सुरक्षा का विषय सबसे अहम
ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर सभी राजनीतिक दल एक सुर में बोलते थे। ये दोनों मुद्दे वोट की राजनीति से ऊपर माने जाते थे और चुनावी हार-जीत के लिए नेता इन्हें जनता के बीच नहीं घसीटते थे। यदि विपक्ष का सरकार से मतभेद होता था, तो बात पर्दे के पीछे निपट जाती थी। सुरक्षा से जुड़े विषयों पर तो अक्सर प्रधानमंत्री सर्वदलीय बैठक बुलाकर सरकार का पक्ष रखते थे।
सवार्नुमति बनाने का प्रयास होता था, लेकिन राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के बीच अविश्वास की ऊंची दीवार खड़ी होने से आज र्मयादा का चीरहरण हो रहा है। बेझिझक परंपराओं की बलि चढ़ा दी जाती है। हद तो यह है कि सेना को भी गंदी राजनीति के कीचड़ में घसीटा जा रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति इसका उदाहरण है। पिछले तीस दशक के दौरान देश में राजनीति का चरित्र बिल्कुल बदल गया है।
संसद और विधानसभाओं में धन्नासेठों और अपराधियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। राजनीति सेवा नहीं सत्ता पाने और पैसा कमाने का जरिया बन गई है। सार्वजानिक जीवन में बहस का स्तर गिर गया है। चौथाई सदी पहले जब देश ने बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाया, तब से पतन की प्रक्रिया और तेज हो गई। कॉर्पोरेट से हाथ मिलाकर हमारे बड़े नेता अक्सर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बेदर्दी से करते हैं।
सत्ता सुख पाने और कुर्सी पर बने रहने के लिए वे घटिया चाल चलने से नहीं हिचकिचाते, इसीलिए विरोधियों की हत्या तक करा दी जाती है। इस पतन के लिए किसी एक दल को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जब नौबत हत्या और हिंसा तक आ जाए तब राजनीतिक सवार्नुमति की बात करना नक्कारखाने में तूती बजाने जैसा है। विचारों की भिन्नता ही किसी संगठन, समाज व राष्ट्र के विकास की जरूरी खुराक होती है, इसीलिए संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को बहुत ऊंचा दर्जा दिया जाता है।
दुर्भाग्य से आज हम निंदक का गला घोंटने के दौर में जी रहे हैं। मतभेद को विरोध मान लिया जाता है और फिर विरोधी को जड़-मूल से समाप्त करने का षड्यंत्र रचा जाता है। कहने को जनतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता, इसलिए राजनीतिक दल अपने विरोधियों को तर्क और जन-सर्मथन के बल पर पराजित करने की बात करते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्ष में बेसिर-पैर की बात उछालने, मिथ्यारोप लगाने की घटनाओं में बेतहाशा इजाफा हुआ है।
इस कारण तर्क से जीत में विश्वास रखने वाली जमात आशंकित है। मुखालफत में खड़े लोग अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। ऐसे में भारतीय लोकतंत्र के भविष्य पर सवाल उठाने लाजिमी हैं। हिंसा और राजनीतिक हत्याओं में आई तेजी इस पतन का परिणाम हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट टटोलने पर देश में होने वाली राजनीतिक हत्याओं का अंदाजा लगाया जा सकता है।
रिपोर्ट में सियासी रंजिश में जान गंवाने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं का उल्लेख है। पार्टी वर्कर्स की हत्या में इजाफे से बदलते राजनीतिक माहौल की तपिश महसूस की जा सकती है। रिपोर्ट (वर्ष 2014) के अनुसार 2013 में देशभर में कुल 101 राजनीतिक कत्ल हुए, जिनमें सर्वाधिक (26) बंगाल में दर्ज किए गए. दूसरा स्थान मध्य प्रदेश (22) तथा तीसरा बिहार (12) का रहा। इन हत्याओं की संख्या और इलाका हर साल बदलता है। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने इसी लोकतंत्र का सपना देखा था?
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