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देश में भ्रष्ट नौकरशाही की सफाई जरूरी

देश के लिए यह कितनी गंभीर बात है कि शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्ति भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे हुए हैं

देश में भ्रष्ट नौकरशाही की सफाई जरूरी
हमारे प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार किस कदर गहरे जड़ तक समाया हुआ है, इसका नमूना तमिलनाडु के मुख्य सचिव राममोहन राव के घर आयकर विभाग के छापे में मिले अकूत धन से पता चलता है। इस छापे में राव के घर से करोड़ों रुपये के आय से अधिक संपत्ति का पता चला है।
देश के लिए यह कितनी गंभीर बात है कि शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्ति भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे हुए हैं। मुख्य सचिव पर एक तरह से समस्त राज्य को चलाने की जिम्मेदारी होती है। उन पर एक बेहतर व्यवस्था बनाने का दायित्व होता है।
इस अहम पद पर बैठे व्यक्ति अगर राज्य के अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर ईमानदारी से काम करे तो कोई ताकत नहीं है जो किसी भी राज्य की गरीबी उन्मूलन से रोक ले। लेकिन शीर्ष पदों पर काम कर रहे लोगों के आचरण में ही अगर शुचिता नहीं है, तो आखिर किनसे उम्मीद की जा सकती है। कदाचार के हमाम में राव अकेले नहीं हैं, उन जैसे सैकड़ों अफसर हैं, जो भ्रष्ट हैं ओर पकड़े भी गए हैं। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है।
आजादी के समय से यह अमरबेल बना हुआ है। सरकार किसी की भी रही, लेकिन भ्रष्टाचार में कमी नहीं आई। कांग्रेस शासन ने तो जैसे भ्रष्ट तंत्र को खादपानी ही दिया। इसने हमारे पूरे तंत्र को खोखला बना दिया है। सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ लक्षित व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाता है।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भ्रष्टाचार के भयावह रूप पर एक बार कहा था कि सरकार से भेजा गया एक रुपया जनता तक 15 पैसा पहुंचता है। बाकी 85 पैसा बीच में मौजूद भ्रष्ट तंत्र निगल लेता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि राजीव गांधी ने इस तथ्य को जानते हुए भी भ्रष्ट तंत्र की सफाई नहीं की। यूं ही उसे सड़ते रहने दिया। आज जब मोदी सरकार ने भ्रष्ट धन के खात्मे के लिए बड़े नोटों की बंदी की है और उसके बाद छापे में जिस तरह अवैध धन की जखीरा मिल रहा है, उससे लगता है कि अभी देश में और सफाई की जरूरत है।
अच्छी बात यह दिख रही है कि मोदी सरकार किसी को बख्श नहीं रही है। चाहे रिजर्व बैंक के अधिकारी हों, चाहे बैंकों के अधिकारी हों, चाहे सरकारी अफसर हो या फिर भाजपा के ही नेता क्यों न हो, सभी सरकार के राडार पर हैं और छापे में पकड़े जा रहे हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रधानमंत्री के विमुद्रीकरण के फैसले के समर्थक रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में एक मीडिया समूह के कार्यक्रम में कहा था कि आखिर किसी को जीवन में इतना पैसा किसलिए चाहिए? उनका इशारा लोगों के धनपशु बनने व नैतिक रूप से गिर कर पद के दुरुपयोग करने की तरफ था। चाहे व्यापार हो या सरकारी तंत्र, कुछ लोगों की सिस्टम का दुरुपयोग कर अवैध कमाई करना प्रवृत्ति बन गई है। इसके पीछे दोष हमारे तंत्र का भी है कि हमने बेहतर और पारदर्शी शासन व्यवस्था नहीं बनाई है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि मोदी सरकार शासन तंत्र में मौजूद सड़ांध को दूर करने का प्रयास कर रही है। लेकिन नौकरशाही की भी जिम्मेदारी है कि वह खुद को ईमानदार बनाएं, जनता के प्रति अपनी जवाबदेही तय करें। सरकार में उच्च पदों पर होने का मतलब उन्हें कदाचार का लाइसेंस नहीं है।
विडबंना देखिए कि आइएएस जैसी शीर्ष परीक्षा पास करके अफसर बनने वाले देश के श्रेष्ठ मेधावी लोगों में से अनेक अपना दायित्व निभाते हुए भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं, जबकि उनका चयन देश में बेहतर शासन व्यवस्था बनाने और राष्टÑ को हर क्षेत्र में शिखर पर ले जाने में योगदान के लिए होता है। क्या हर चीज कठोरता से ही सुधरेगी? सरकार को चाहिए कि व्यवस्था को दुरुस्त बनाने तक सफाई अभियान जारी रखे व लगे हाथ लंबित पड़े प्रशासनिक सुधार भी करे।
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