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अवधेश कुमार का लेख : कोरोना पर विजय का संकल्प

सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन का लाभ देश को मिला है। इसकी देश को आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है। सारी वैश्विक संस्थाएं भारत की विकास दर में भारी गिरावट का आंकड़ा दे रही हैं, लेकिन किसी देश की पहली प्राथमिकता वहां के नागरिकों की जीवन रक्षा है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों के लिए सप्तपदी के रूप में जो सूत्र दिया वह पूरे संबोधन की आत्मा थी। उसका पूरी तरह पालन किया जाए जो संभव है, हम निश्चय ही कोरोना पर विजय प्राप्त करेंगे।

अवधेश कुमार का लेख : कोरोना पर विजय का संकल्प

निस्संदेह, पूरा देश प्रधानमंत्री के संबोधन की प्रतीक्षा कर रहा था। हालांकि लॉकडाउन का विस्तार होगा इसे लेकर किसी को भी संदेह नहीं था। सात राज्यों ने तो पहले ही 30 अप्रैल तक लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। जैसा प्रधानमंत्री ने कहा कि नागरिकों की तरफ से भी यही सुझाव आ रहा था। तमाम पूर्वोपाय एवं प्रयासों के बावजूद कोरोना जिस तरह फैल रहा है उसने पूरे विश्व को पहले से कहीं ज्यादा चिंतित और सतर्क कर दिया है। वास्तव में आज विश्व की भयावहता को देखते हुए हमारे सामने प्रश्न यही था कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई अब आगे कैसे बढ़ें और हम इसको कैसे नियंत्रण में लाएं? विश्व का अनुभव यही है कि कोरोना से बचाव ही विकल्प है और उसके लिए लॉकडाउन एकमात्र अस्त्र है। हालांकि भारत की स्थिति आज भी दुनिया के प्रमुख देशों की तुलना में काफी बेहतर है। किंतु संक्रमितों एवं मृतकों की संख्या बढ़ रही है। 24 मार्च को लॉकडाउन लागू होने के समय संक्रमण के केवल 492 मामले थे। 14 अप्रैल की सुबह 8 बजे तक देश में संक्रमितों की संख्या थी, 10 हजार 363 और 339 लोग प्राण गंवा चुके हैं। हालांकि 1035 ठीक भी हुए हैं।

इन आंकड़ों को देखते हुए कोई भी जोखिम मोल नहीं लिया जा सकता था। प्रधानमंत्री मोदी की विचार करने, कदम उठाने तथा लोगों से संवाद करने की अपनी शैली है। वे कोई कदम उठाने के पहले लोगों के साथ अपने को जोड़ते हैं, उनको सामान्य भाषा में समझाते हैं कि ऐसा करना क्यों अपरिहार्य है तथा कैसे देश के हित में है, फिर बिन्दूवार लोगों के लिए कुछ कर्तव्य, इसके साथ वो निराशा की स्थिति में भी आशाजनक तथ्यों के साथ लोगों के आत्मविश्वास बनाए रखने की भी कोशिश करते हैं। यही उन्होंने कोरोना से संबंधित अपने चारों संबोधनों में किया है। आम आदमी की कठिनाइयों तथा पर्व त्यौहारों की चर्चा करके उन्होंने यही बताया कि उनके अंदर इन सबकी चिंता है, पर उपाय कोई दूसरा नहीं है। महामारी के बीच देश में पैदा हुई भय और चिंता को दूर करने के लिए उन्होंने वो सारे तथ्य बताए कि कैसे समय रहते कदम उठाकर अपने देश को संभाल कर रखा है। महीना डेढ़ महीना पहले कई देश कोरोना संक्रमण के मामले में भारत के बराबर खड़े थे। आज उन देशों में भारत की तुलना में कोरोना के मामले 25 से 30 गुणा ज्यादा हैं तथा हजारों की दुखद मृत्यु हो चुकी है। विश्व के आंकड़ों को देखते हुए उनका यह कहना बिल्कुल सच है कि इंटिग्रेटेड एप्रोच न अपनाया होता, समय पर तेज फैसले न लिए होते तो आज भारत की स्थिति क्या होती। इसका मतलब हुआ कि सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन का लाभ देश को मिला है। इसकी देश को आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है। सारी वैश्विक संस्थाएं भारत की विकास दर में भारी गिरावट का आंकड़ा दे रही हैं, लेकिन किसी देश की पहली प्राथमिकता वहां के नागरिकों की जीवन रक्षा है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों के लिए सप्तपदी के रूप में जो सूत्र दिया वह पूरे संबोधन की आत्मा थी। उसका पूरी तरह पालन किया जाए जो संभव है तो हम निश्चय ही कोरोना पर विजय प्राप्त करेंगे।

सप्तपदी का हमारे यहां कई तरह का शास्त्रीय महत्व है। इसमें शरीर और मन पर नियंत्रण के लिए योग भी है। उसमें अनुशासन की सीख है तो बुजुर्गों की देखभाल एवं घर के बनाए मास्क पहनने की अपील भी। उसमें यदि व्यवसायों एवं उद्योगों में काम करने वालों के प्रति नियोजकों से संवेदनशीलत बरतने का आग्रह है तो गरीबों का ध्यान रखने के लिए संपूर्ण देश को प्रेरित करने का भाव। इसका सीधा संदेश यही है कि सरकारों को जो करना है वो करेंगी, लेकिन बगैर समाज के सहयोग के कोरोना महामारी से लड़ाई तथा इससे उत्पादन सामाजिक-आर्थिक समस्याओं और चुनौतियों से निपटना संभव नहीं होगा। क्या इसी तरह लॉकडाउन लागू रहेगा? इसमें कुछ छूट मिलने की संभावना है? तीन मई को यह खत्म हो जाएगा या फिर इसे बढ़ाने की नौबत आ जाएगी? वास्तव में इन तीनों प्रश्नों का उत्तर भविष्य की स्थिति पर निर्भर करेगा। पहले 21 दिन और अब 19 दिन यानी कुल मिलाकर 40 दिन होते हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन से यह संकेत मिलता है कि जिन क्षेत्रों में स्थिति नियंत्रण में दिखेगी वहां कुछ गतिविधियों की सीमित छूट मिल सकती है। यानी जो क्षेत्र अपने यहां लॉकडाउन का पूरी तरह पालन करते हुए कोरोना से बचने में सफल दिखेंगे, हॉटस्पॉट नहीं बढ़ने देंगे, वहां पर कुछ जरूरी गतिविधियों की सशर्त छूट मिल सकती है, लेकिन अगर उसमें फिर से लॉकडाउन के नियमों का पालन नहीं होता ये छूट वापस ली जाएगी।

भविष्य की एक तस्वीर साफ हो गई है। इसमें हर भारतवासी का दायित्व बढ़ गया है कि संयम और सतर्कता से लॉकडाउन तथा सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। हालांकि लोगों में आत्मविश्वास बनाए रखने के लिए कुछ प्रगतियों की चर्चा करनी होती है। उदाहरण के लिए देश में राशन और दवा के भंडार पर्याप्त हैं। इससे दुकानों पर भीड़ को रोकने में सहयोग मिलता है। वैसे कोरोना कोविड 19 से संघर्ष में भारत ने आरंभ से अभी तक कई सोपान लांघे हैं। जैसे आज टेस्ट लैब की संख्या बढ़ते हुए 200 हो गई है, एक लाख से अधिक बिस्तरों की व्यवस्था हो गई है तथा 600 से अधिक अस्पताल हैं जो केवल कोविड 19 के लिए काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने जिस विजय की उम्मीद की बात की उसके कुछ अन्य संकेत भी हैं। संक्रमण 27 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में अवश्य फैला है, लेकिन इनमें से शीर्ष 4 राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडु और राजस्थान में ही कुल संक्रमितों के 60 प्रतिशत हैं। 15 राज्यों के 25 जिलों में पिछले दो सप्ताह से ज्यादा समय से कोरोना के नए मामले सामने नहीं आए हैं। नए मामले नहीं से यह आशा बलवती होती है कि ये जिले कोरोना के खिलाफ संघर्ष में विजय की ओर अग्रसर हो रहे हैं। कोरोना प्रसार एवं मृत्यु के बीच ऐसे कई संकेतक हैं जो भविष्य के लिए उम्मीद पैदा करते हैं। लेकिन भारत का चरित्र केवल अपने देश त सीमित नहीं हो सकता। भारत ने इस पूरे संकट के दौरान यह दिखाया है कि देश की चिंता तो उसकी प्राथमिकता में है, लेकिन वह वहीं तक सीमित नहीं है। उसमें विश्व की चिंता सन्निहित है। स्वयं सार्क की बैठक बुलाने से लेकर जी 20 की बैठक बुलाने की पहल तथा उसमें प्रधानमंत्री की ओर से रखी गई बातों तथा लिए गए निर्णयों से भारत का वैश्विक सरोकार सबके सामने आया है। युवा वैज्ञानिकों से कोरोना वैक्सिन बनाने की दिशा में काम करने का जो अनुरोध किया उसके पीछे केवल भारत नहीं पूरे विश्व मानवता की चिंता झलकती है। संकट के बाद से भारत में जांच किट से लेकर, वेंटिलेटर, पीपीई आदि के क्षेत्र में काम हुए हैं वो उदाहरण हैं कि प्रधानमंत्री की इस अपील का असर अवश्य होगा। तो हम अपने यहां कारोना पर विजय के साथ विश्व के लिए भी कुछ कर पाएं यही प्रधानमंत्री के संबोधन का सारतत्व था।

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