Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

निरंकार सिंह का लेख : चीन पर उठ रहे सवाल

ऐसे में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या करोना वायरस महामारी है, चीन के जैविक युद्ध का भाग है या प्रयोगशाला से निकला जैविक हथियार है? अभी इस बारे मेें निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता पर चीन ने वुहान में हुई मौतों के बारे में जिस तरह से आंकड़ों को छिपाया गया और उसके दूसरे शहरों में इस वायरस का न फैलना संदेह पैदा करता है। अमेरिका की एक कंपनी ने चीन सरकार पर 20 ट्रिलियन डॉलर का मुकदमा ठोका है।

शी जिनपिंग के शाही डिनर में शामिल होंगी ये चीजेंचीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल)

चीन में करोना वायरस का संकट अब समाप्ति की ओर है, लेकिन अमेरिका, इटली और ईरान सहित कई देशों मंे इसका प्रकोप बढ़ रहा है। ऐसे में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या करोना वायरस महामारी है, चीन के जैविक युद्ध का भाग है या प्रयोगशाला से निकला जैविक हथियार है? अभी इस बारे मेें निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता पर चीन ने करोनो वायरस से वुहान में हुई मौतों के बारे में जिस तरह से आंकड़ों को छिपाया गया और उसके दूसरे शहरों में इस वायरस का न फैलना संदेह पैदा करता है। दुनिया भर में कोरोना वायरस के प्रकोप को देखते हुए अमेरिका की एक कंपनी ने चीन सरकार पर 20 ट्रिलियन डॉलर का मुकदमा ठोका है।

मुकदमा करने वाले ने दावा किया है कि चीनी प्रशासन जैविक हथियार तैयार कर रहा था। जिसकी वजह से यह वायरस फैला है और इसीलिए उन्होंने 20 ट्रिलियन डॉलर का हर्जाना मांगा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि चीन ने वास्तव में अमेरिकी नागरिकों को मारने और बीमार करने की साजिश रची है। उनका आरोप है कि वुहान वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट द्वारा यह वायरस जानबूझकर छोड़ा गया है। मुकदमे में कहा गया है कि जैविक हथियारों को 1925 में ही गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है और इन्हें जनसंहार के आतंकी हथियार के रूप में देखा जा सकता है। अमेरिकी कंपनी ने इस बारे में मीडिया में आई कई खबरों का भी हवाला देते हुए कहा है कि चीन में केवल एक माइक्रोबायोलॉजी लैब वुहान में है जो नोवेल कोरोना जैसे अत्याधुनिक वायरस से निपट सकती है। चीन ने कोरोना वायरस के बारे में अपने बयानों को राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल का बहाना बनाकर छिपाया है। उधर चीन में वायरस के संक्रमण के बारे में चेतावनी देने वाले आठ व्हिसलब्लोअर में एक डॉक्टर ली वेनलियांग की पिछले दिनों इस महामारी में मौत हो गई। वेनलियांग ने महामारी की जानकारी जब दी थी तब पुलिस ने उनका उत्पीड़न किया था।

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने बताया कि 34 वर्षीय वेनलियांग ने अन्य डॉक्टरों को महामारी के बारे में चेतावनी देने की कोशिश की थी। वेनलियांग ने अपने चिकित्सा महाविद्यालय के साथियों को चीनी मैसेजिंग ऐप वीचैट पर बताया था कि स्थानीय सी फूड बाजार से आए सात मरीजों का सार्स जैसे संक्रमण का इलाज किया जा रहा है और उन्हें अस्पताल के पृथक वार्ड में रखा गया है। उन्होंने बताया कि परीक्षण में साफ हुआ है कि यह विषाणु कोरोना वायरस समूह का है। इसी समूह के सीवियर एक्यूट रेस्पीरेटरी सिंड्रोम विषाणु भी है जिसकी वजह से 2003 में चीन एवं पूरी दुनिया में 800 लोगों की मौत हुई थी। यह संदेश कुछ घंटे में ही वायरल हो गया और पुलिस ने उन्हें अफवाह फैलाने वाला करार देकर प्रताड़ित किया था। दुनिया में आज युद्ध का तरीका जिस तरह से बदल रहा है, उसमें कुछ भी हो सकता है। जिस तरह से कुछ देशों ने आतंकवाद को अपनी युद्ध नीति का हथियार बना लिया है, उसी तरह से जैविक हथियार बनाने के प्रयास भी कुछ देशों में हो रहे है। जीवाणु युद्ध में मकानों या मशीनों को क्षति नहीं पहुंचती। इसका प्रभाव केवल मनुष्यों, उनके खाद्य पदार्थों और अन्य युद्ध साधनों पर पड़ता है। युद्ध और रोगों का संबंध नया नहीं है। इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जिनमें बड़े-बड़े युद्धों के बाद कोई न कोई रोग महामारी के रूप में फैला हुआ पाया गया है। शत्रुओं को क्षति पहुंचाकर उन पर विजय पाने के लिए रोगाणुओं का उपयोग भी नया नहीं है। इतिहास में अनेक उल्लेख मिलते हैं, जिनसे पता लगता है कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए रोग फैलाने के प्रयास हुए हैं। चेचक और हैंजे से मरे व्यक्तियों के शवों को पेयजल के जलाशयों में डालकर पानी को विषैला बनाने के उल्लेख मिलते हैं।

आधुनिक काल में प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी ने घोड़ों को ग्लैंडर्स रोग से आक्रांत कराकर उन्हें युद्ध में भेजने में बाधा डालने का प्रयास किया था। जीवाणु युद्ध में प्रयुक्त होने वाले साधनों में कुछ विशेषताएं होनी चाहिए। उनमें संक्रमण-क्षमता ऊंची, उष्मा, धूप और शोषण के प्रति प्रतिरोध ऊंचा, जल्द फैलने तथा मार डालने या निकम्मा बना देने की क्षमता ऊंची होनी चाहिए। ऐसा भी होना चाहिए कि उनके प्रति शत्रुओं में प्राकृतिक प्रतिरक्षण न उत्पन्न हुआ हो। जीवाणु युद्ध में रोगाणु का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसके प्रयोग के उद्देश्य क्या हैं। यदि शत्रुओं को मार डालने का उद्देश्य है तो प्लेग, टाइफाइड, हैजा, चेचक या इसी प्रकार के अन्य रोगों के जीवाणुओं का प्रयोग किया जा सकता है। रोग उन पशुओं में भी फैलाया जा सकता है, जिनका मांस खाया जाता अथवा जिनका ऊन वस्त्रों के निर्माण में प्रयुक्त होता है। ऐसे पशुओं में भेड़, बकरी, सुअर और मुर्गे विशेष उल्लेखनीय हैं, जिनसे शत्रुओं को क्षति पहुँचाई जा सकती है। फसलों को नष्ट कर अर्थात खाद्यान्न की कमी करके भी क्षति पहुंचाई जा सकती है।

जीवाणु युद्ध में जो साधन प्रयुक्त होते हैं उन्हें दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है, एक वे जीवित पदार्थ जो मनुष्यों, पशुओं या पौधों में रोग उत्पन्न करते हैं। ये रोगाणु, पौधा नाशक कीड़े, बैक्टीरिया, वायरस, कवक और रिकेटसियाई होते हैं। दूसरी श्रेणी में कुछ विशेष प्रकार के श्हारमोन या वृद्धिनियंत्रक आते हैं, जो सामान्यतः घासपात को नष्ट करते हैं। रोगाक्रांत व्यक्तियों द्वारा अथवा रोगवाहक कीड़ों के संपर्क से रोग फैलाए जा सकते हैं। वायु द्वारा सांस लेकर या चमड़े अथवा श्लैष्मिक झिल्ली द्वारा अवशेषित होकर अथवा रोगाणुयुक्त आहार करने से भी रोग फैलते हैं। रोगाणुओं को वायुयान या गुब्बारों द्वारा वायु में फैलाकर वायु को दूषित बनाया और रोग फैलाया जा सकता है। खाद्य-पशुओं, विशेषकर सुअर, कुक्कुट, भेड़ आदि को रोगी बनाकर पशुओं में रोग फैलाए जा सकते हैं। अन्न या फलवाली फसलों में पौधों के प्लेग, चित्ती, मारी आदि रोग फैलाकर भी क्षति पहुंचाई जा सकती है।

जीवाणु युद्ध में संरक्षण का सर्वोत्कृष्ट उपाय सैनिकों को सचेत और सजग रखना है। उनका स्वास्थ्य भी सर्वदा उत्तम रहना चाहिए। कृषि-व्यवस्था सुव्यवस्थित रहनी चाहिए। संरक्षण के लिए यह नितांत आवश्यक है कि शत्रुपक्ष द्वारा फैलाए गए जीवाणुओं का पता जल्द से जल्द लग जाय। इसके लिए प्रयोगशाला होनी चाहिए जिसमें उनकी जांच जल्द से जल्द कर ली जाए। पता लग जाने पर परिरक्षण और संगरोधन की व्यवस्था तत्काल करनी चाहिए। यद्यपि रोग जल्द फैलते हैं, पर महामारी के रूप में उनका फैलना धीरे धीरे ही होता है। यदि उन्हें रोकने के लिए समय पर व्यवस्था कर ली जाए तो महामारी का फैलना निश्चित रूप से रोका जा सकता है। जीवाणु युद्ध में यांत्रिक सरंक्षण प्रायः उसी प्रकार के होते हैं जैसे रासायनिक युद्ध में होते हैं। गैसत्राण द्वारा वायु की सफाई की जा सकती है और वायुरोधक वस्त्रों के व्यवहार से दूषित वायु को शरीर के संपर्क में आने से रोका जा सकता है।

Next Story
Top