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प्रमोद भार्गव का लेख : आत्मविश्वास से हारेगा कोरोना

ब्रिटेन से नए रूप में अवतरित कोरोना भारत में भले ही आ गया हो, लेकिन भारतीय जनता का आत्मविश्वास उसे हरा देगा। इससे लड़ने का आत्मविश्वास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना काल के शुरुआत में ही जगा दिया था। भारत में कोविशील्ड और कोवैक्सीन को इमरजेंसी अप्रूवल मिल गया है। अब जल्द ही कोरोना वैक्सीनेशन शुरू होगा। इससे सरकार द्वारा कोरोना को नियंत्रित करने के प्रयासों को मजबूती मिलेगी। हालांकि मानव इतिहास में भारत समेत ऐसा पहली बार हुआ कि दुनिया इस अदृश्य विषाणु की चपेट में आई और जानलेवा भय का वातावरण बन गया। विश्व को लंबे समय तक लॉकडाउन का संकट झेलना पड़ा।

कोरोना महामारी को लेकर देशवासियों के लिए अच्छी खबर, इस वैक्सीन को मिल सकती है मंजूरी, बैठक जारी
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प्रमोद भार्गव

ब्रिटेन से नए रूप में अवतरित कोरोना विषाणु भारत में भले ही आ गया हो, लेकिन भारतीय जनता का आत्मविश्वास उसे हरा देगा। इससे लड़ने का आत्मविश्वास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना काल के शुरुआत में ही जगा दिया था। भारत में कोविशील्ड और कोवैक्सीन को इमरजेंसी अप्रूवल मिल गया है। अब जल्द ही कोरोना वैक्सीनेशन शुरू होगा। इससे सरकार द्वारा कोरोना को नियंत्रित करने के प्रयासों को मजबूती मिलेगी। हालांकि मानव इतिहास में भारत समेत ऐसा पहली बार हुआ कि दुनिया इस अदृश्य विषाणु की चपेट में आई और जानलेवा भय का वातावरण बन गया। विश्व को लंबे समय तक लॉकडाउन का संकट झेलना पड़ा। इसके बावजूद यही वह समय था, जब चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नए शोध हुए और चिकित्सा उपकरणों में भारत ने आत्मनिर्भरता हासिल की। वैक्सीन निर्माण के क्षेत्र में भी भारत अग्रिम पंक्ति में है। आयुर्वेद पद्धति से दवाओं का पहली बार कोविड-19 पर परीक्षण किया गया, जो उपचार में खरी उतरीं। भारत में बनी हाड्रोक्सी क्लोरोक्वीन दवा पूरी दुनिया में भेजी गई। यही वह आत्मविश्वास था, जिसके फलस्वरूप कोरोना के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित किया गया। साफ है, कोरोना के नए रूप में संक्रमण ब्रिटेन में भले ही 70 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ा हो, लेकिन इस अनुपात में यह भारत में फैलने वाला नहीं है। इससे ज्यादा डरने की जरूरत इसलिए ये भी नहीं है, क्योंकि मौतें नहीं बढ़ी हैं। वैसे भी अब तक इसके परिवर्तित रूप पर वैज्ञानिक जो वैक्सीन लगाई जाने वाली हैं, उन्हें असरकारी बता रहे हैं।

वैज्ञानिक इस वायरस को संक्रामक तो अधिक बता रहे हैं, किंतु उस अनुपात में घातक नहीं बता रहे हैं। इसके बदलते स्वरूप के साथ यह तथ्य यदि सही है तो संतोषप्रद है। इस बिना पर वायोएनटेक के सीईओ उगुर साहीन का कहना है, 'इससे घबराने की जरूरत नहीं है। जहां तक इसे विज्ञान के स्तर पर समझा गया है, उस आधार पर कहा जा सकता है कि टीका कोरोना के नए स्वरूप पर भी असरकारी होगा।' बायोएनटेक अमेरिकी कंपनी फाइजर के साथ मिलकर कोविड-19 का टीका विकसित कर रही है। हालांकि राष्ट्रीय कोविड-19 टास्क फोर्स के निदेशक डॉ वीके पाल का कहना है कि 'देश के कुल मरीजों में पांच फीसदी की जीनोम सीक्वेसिंग की जाएगी। इससे पता चलेगा कि वायरस कितना बदल रहा है।' इस महामारी से पहले तक जीनोम सीक्वेसिंग के बार-बार परीक्षण पर वैज्ञानिकों की रुचि नहीं होती थी। लेकिन इसके रूप परिवर्तन ने वैज्ञानिकों को जताया कि जब कोई नया वायरस अस्तित्व में आता है तो उसकी केवल शरीर में उपस्थिति की पहचान नहीं होनी चाहिए, बल्कि जीनोम सीक्वेसिंग भी आवश्यक है, क्योंकि इससे इसके बदलते रूप का पता चलने के साथ, इसकी घातकता का भी पता चल जाता है। इस आधार पर टीके को आध्यतंत करने में भी सुविधा होती है।

ब्रिटेन में कोरोना का जो बदला रूप मिला है, वह भारत में दस्तक दे चुका है। अब तक वैज्ञानिकों की ऐसी धारणा है कि वायरस जब परिवर्तित रूप में सामने आता है तो इसके पहले रूप आप से आप समाप्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि अपवाद स्वरूप नया रूप खतरनाक अवतार में भी पेश आता है। इसी कारण अब तक एड्स के वायरस का टीका नहीं बन पाया है। दरअसल स्वरूप परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि प्रयोगशाला में वैज्ञानिक एक रूप की संरचना को ठीक से समझ भी नहीं पाते और इसका नया रूप सामने आ जाता है।

ब्रिटेन में बदले रूप में जो कोरोना मिला है उसे वीयूआई-202012-01 नाम दिया गया है। कोरोना सबसे पहले चीन के वुहान में मिला था। यहीं से दुनिया में सबसे अधिक फैला है। ब्रिटेन में वायरस ने नया अवतार कैसे लिया, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसकी संरचना पूर्व के वायरसों से बहुत ज्यादा भिन्न है, इसीलिए इसके फैलने की क्षमता भी ज्यादा है। फिलहाल यह वायरस तेजी से फैल तो रहा है, लेकिन उसी अनुपात में घातक भी है, ऐसे कोई वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं हंै, इसलिए यह मांग भी उठ रही है कि जब तक नए वायरस की संरचना ठीक से समझी नहीं जाती, तब तक टीके को न लगाया जाए। मसलन हड़बड़ी में वैक्सीन नहीं लगाई जाए। ब्रिटेन में अभी तीन प्रकार की वैक्सीन लगभग टीकाकरण की स्थिति में हैं। ये शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सक्षम हैं। लिहाजा वायरस नए रूप में भले ही आ गया हो, टीका उस पर प्रभावी होगा। हालांकि धारणा के विपरीत ग्लास्गो विश्व विद्यालय के प्रोफेसर डेविड का कहना है, 'हो सकता है वायरस ऐसा परिवर्तन कर ले, जो टीके के असर से बच जाए। यदि ऐसा हुआ तो फिर हालात फ्लू जैसे हो सकते हैं। नतीजतन वैक्सीन को अपडेट करना जरूरी हो जाएगा।' कोरोना की जो वैक्सीन बन रही हैं, वे इतनी लचीली हैं कि उनमें कोरोना के बदलते स्वरूप के आधार पर बदलाव आसानी से किए जा सकते हैं। कोरोना संक्रमण के साथ परेशानी व समस्या यह रही है कि इसने देखते देखते दुनिया में अपने पैर पसार लिए। चूंकि इसका तत्काल कोई उपचार नहीं था, इसलिए कोरोना संक्रमित से दूरी बनाए रखते हुए इम्यूनिटी बढ़ाने की बात चिकित्सक और राजनेता करते रहे हैं। शरीर में यह नहीं बढ़े इस हेतु एलोपैथी, आयुर्वेद और होम्योपैथी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की दवाएं रोगियों को दी गईं। भारत ही नहीं दुनिया में व्यक्तिगत स्तर पर तो इम्युनिटी बढ़ाने की बात की जा रही है लेकिन सामुदायिक स्तर पर प्रतिरोधकता बढ़ाने की बात नहीं की जा रही। इसे हर्ड इम्युनिटी कहा जाता है।

अब सवाल उठता है कि हर्ड इम्युनिटी बढ़ाने की सलाह चिकित्सा विज्ञानी क्यों नहीं दे रहे हैं। दरअसल टीकाकरण का कारोबार सैकड़ों अरब का होने के साथ, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है। इसलिए सामुदायिक प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने की बात नहीं की जा रही है। हालांकि भारत और अन्य एशियाई देशों में प्राकृतिक रूप से हर्ड इम्युनिटी है। इसीलिए ग्रामों की बजाय कोरोना का असर शहरी आबादी में ज्यादा है। इसे हम दिल्ली सीमा पर आंदोलनरत किसानों में भी अनुभव कर सकते हैं। शहरों और अन्य इलाकों में कोरोना संक्रमण का फैलना पर्यावरणीय क्षति के कारण भी है। दरअसल कोरोना के संदर्भ में पर्यावरणीय क्षति को रेखांकित किया जाता है तो औद्योगिक प्रौद्योगिक विकास के साथ शहरीकरण भी प्रभावित होगा। इन पर अंकुश की पहल सरकारें करती हैं तो दवा कंपनियों के हित भी प्रभावित होंगे, इसलिए पर्यावरणीय क्षति को अकसर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

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