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प्रमोद भार्गव का लेख : कोरोना के नए रूप ने बढ़ाई चिंता

कोविड-19 की वैक्सीन अभी पूरी दुनिया में आई भी नहीं है कि ब्रिटेन में कोरोना (Corona) का जो बदला रूप मिला है, उसका प्रसार नीदरलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया, इटली और दक्षिण अफ्रीका में भी पाया गया है। कोरोना विषाणु कोविड-19 का नया रूप सामने आने से भारत समेत दुनिया का चिंतित होना स्वाभाविक है, क्योंकि इसके फैलने की रफ्तार सामान्य वायरस से 70 फीसदी ज्यादा है। नतीजतन यह वायरस जिस क्षेत्र में फैलेगा उस क्षेत्र के कोरोना संक्रमितांे पर टीका असरकारी नहीं होगा, ऐसी शंकाएं जताई जाने लगी हैं। हालांकि वैज्ञानिक इस वायरस को संक्रामक (Contagious) तो अधिक बता रहे हैं, किंतु उस अनुपात में घातक नहीं बता रहे हैं।

प्रमोद भार्गव का लेख : कोरोना के नए रूप ने बढ़ाई चिंता
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ब्रिटेन में कोरोना विषाणु कोविड-19 का नया रूप सामने आने से भारत समेत दुनिया (world) का चिंतित होना स्वाभाविक है, क्योंकि इसके फैलने की रफ्तार सामान्य वायरस से 70 फीसदी ज्यादा है। नतीजतन यह वायरस जिस क्षेत्र में फैलेगा उस क्षेत्र के कोरोना संक्रमितांे पर टीका असरकारी नहीं होगा, ऐसी शंकाएं जताई जाने लगी हैं।

हालांकि वैज्ञानिक इस वायरस को संक्रामक तो अधिक बता रहे हैं, किंतु उस अनुपात में घातक नहीं बता रहे हैं। इसके बदलते स्वरूप के साथ यह तथ्य यदि सही है तो संतोषप्रद है। इस बिनाह पर वायोएनटेक के सीईओ उगुर साहीन का कहना है, 'इससे घबराने की जरूरत नहीं है। जहां तक इसे विज्ञान के स्तर पर समझा गया है, उस आधार पर कहा जा सकता है कि टीका कोरोना के नए स्वरूप पर भी असरकारी होगा।' बायोएनटेक अमेरिकी (American) कंपनी फाइजर के साथ मिलकर कोविड-19 का टीका विकसित कर रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने भी जनता को भरोसा जताया है कि सरकार सतर्क है और ब्रिटेन से हवाई संपर्क बंद किए जा रहे हैं।

ब्रिटेन में कोरोना का जो बदला रूप मिला है, उसका प्रसार नीदरलैंड, डेनमार्क, आस्ट्रेलिया, इटली और दक्षिण अफ्रीका में भी पाया गया है। वैज्ञानिकों की ऐसी धारणा है कि वायरस जब परिवर्तित रूप में सामने आता है तो इसके पहले रूप अपने आप समाप्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि अपवाद स्वरूप नया रूप खतरनाक अवतार में भी पेश आया है। इसी कारण अब तक एड्स के वायरस का टीका नहीं बन पाया है। दरअसल स्वरूप परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि प्रयोगशाला में वैज्ञानिक एक रूप की संरचना को ठीक से समझ भी नहीं पाते और इसका नया रूप सामने आ जाता है। भारत में कोरोना के वर्तमान में छह प्रकार के रूप प्रसार में हैं, ब्रिटेन में नए अवतार में जो कोरोना आया है, वह हवाई उड़ानों के जरिए भारत आ गया तो यह सातवां अवतार होगा। ब्रिटेन में इसकी पहचान सितंबर 2020 में ही हो चुकी थी, इसलिए यह आशंका की जा रही है कि यह अब तक दुनिया में पहुंच चुका होगा क्योंकि तब से उड़ानें निरंतर जारी हैं।

ब्रिटेन में बदले रूप में जो कोरोना मिला है उसे वीयूआई-202012-01 नाम दिया गया है। कोरोना सबसे पहले चीन के वुहान में मिला था। यहीं से दुनिया में सबसे अधिक फैला है। इसे ही चीन के वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित कृत्रिम वायरस भी कहा गया है, लेकिन अभी तक इसकी सच्चाई सामने नहीं आई है। इसके बाद 614 जी और ए-222 वायरस हैं, जो यूरोप में कहर ढा रहे हैं। ब्रिटेन में वायरस ने नया अवतार कैसे लिया, यह अभी स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन इसकी संरचना पूर्व के वायरसों से बहुत ज्यादा भिन्न है, इसीलिए इसके फैलने की क्षमता भी ज्यादा है। दरअसल वायरस अपनी मूल प्रकृति से परजीवी होता है, इसलिए यह जब मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाता है तो कोशिका (सेल) पर अनाधिकृत अधिकार जमाकर विकसित होने लगता है। इसकी संख्या में तब और ज्यादा गुणात्मक वृद्धि होती है, जब इसे न्यूनतम प्रतिरोधी क्षमता वाला शरीर मिल जाता है। ऐसे रोगियों के शरीर से शक्ति ग्रहण कर यह अधिक ताकतवर होकर बाहर निकलता है, इसीलिए वैज्ञानिक यह कह रहे हैं कि अधिक शक्तिशाली वायरस के आ जाने से इसी किस्म के पूर्व वायरसों की किस्में अपने आप खत्म होती चलती हैं। फिलहाल यह मांग भी उठ रही है कि जब तक नए वायरस की संरचना ठीक से समझी नहीं जाती, तब तक टीके को न लगाया जाए। मसलन हड़बड़ी में वैक्सीन नहीं लगाई जाए।

ब्रिटेन में अभी तीन प्रकार की वैक्सीन लगभग टीकाकरण की स्थिति में हैं। ये शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सक्षम हैं। लिहाजा वायरस नए रूप में भले ही आ गया हो, टीका उसे प्रभावित करेगा, ऐसी उम्मीद वैज्ञानिकों को है। हालांकि धारणा के विपरीत ग्लास्गो विश्व विद्यालय के प्रोफेसर डेविड का कहना है, 'हो सकता है वायरस ऐसा परिवर्तन कर ले, जो टीके के असर से बच जाए। यदि ऐसा हुआ तो फिर हालात फ्लू जैसे हो सकते हैं। नतीजतन वैक्सीन को अपडेट करना जरूरी हो जाएगा।' कोरोना की जो वैक्सीन बन रही हैं, वे इतनी लचीली हैं कि उन्हें कोरोना के बदलते स्वरूप के आधार पर बदलाव आसानी से किए जा सकते हैं।

कोरोना संक्रमण के साथ समस्या यह रही है कि इसने देखते-देखते दुनिया में पैर पसार लिए। चूंकि इसका तत्काल कोई उपचार नहीं था, इसलिए कोरोना संक्रमित से दूरी बनाए रखते हुए इम्यूनिटी बढ़ाने की बात चिकित्सक करते रहे हैं। शरीर में यह नहीं बढ़े इस हेतु एलोपैथी, आयुर्वेद और होम्योपैथी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की दवाएं रोगियों को दी गईं। यदि वायरस का हल्का रूप होता है तो प्रतिरोधकता बढ़ जाती है, यदि वायरस भारी हुआ तो जानलेवा साबित होता है। भारत ही नहीं दुनिया में व्यक्तिगत स्तर पर तो इम्युनिटी बढ़ाने की बात की जा रही है लेकिन सामुदायिक स्तर पर प्रतिरोधकता बढ़ाने की बात नहीं की जा रही है। इसे हर्ड इम्युनिटी कहा जाता है। यदि किसी एक बड़े समुदाय में 70 से 90 फीसदी लोगों में कोरोना वायरस से लड़ने की क्षमता विकसित कर दी जाए तो उस समूह में वायरस से लड़ने की शक्ति पैदा हो जाएगी।

अब सवाल उठता है कि हर्ड इम्युनिटी बढ़ाने की सलाह चिकित्सा विज्ञानी क्यों नहीं दे रहे हैं। दरअसल टीकाकरण का कारोबार सैंकड़ों अरब का होने के साथ, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है। इसलिए सामुदायिक प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने की बात नहीं की जा रही है। हालांकि भारत और अन्य एशियाई देशों में प्राकृतिक रूप से हर्ड इम्युनिटी है। इसीलिए ग्रामों की बजाय कोरोना का असर शहरी आबादी में ज्यादा है। यह इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि करीब दो माह पहले बिहार में विधानसभा चुनाव और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में कुछ सीटों पर उपचुनाव हुए थे। चुनावी सभाओं में हजारों लोग इकटठे हुए। बावजूद कोरोना का संक्रमण नहीं फैला तो इसका एक मात्र कारण सामुदायिक प्रतिरोधकता का विकसित होना ही है। इसे हम दिल्ली सीमा पर आंदोलनरत किसानों में भी अनुभव कर सकते हैं। शहरों और अन्य इलाकों में कोरोना संक्रमण का फैलना पर्यावरणीय क्षति के साथ वायु और जल को दूषित कर देना भी है। दरअसल कोरोना के संदर्भ में पर्यावरणीय क्षति को रेखांकित किया जाता है तो औद्योगिक प्रौद्योगिक विकास के साथ शहरीकरण भी प्रभावित होगा। इन पर अंकुश की पहल सरकारें करती हैं तो दवा कंपनियों के हित भी प्रभावित होंगे। आज दुनिया में उद्योगपतियों, नौकरशाहों और राजनेताओं के ऐसे गठजोड़ बन गए हैं जो एक दूसरे के हित साधक बन गए हैं, इसीलिए नेता और चिकित्सा विज्ञानी कह रहे हैं कि वैक्सीन कोरोना के बदले रूप पर भी प्रभावी होगी। लिहाजा टीकाकरण की प्रक्रिया पूर्ववत ही रहेगी। आखिर यह जल्दबाजी किसलिए और क्यों की जा रही है। इस प्रश्न का उत्तर जिम्मेदारों को देना चाहिए।

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