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कोरोना ने दिया करुणा और कारोबार का मौका

अपने घर में जमीनी स्थितियों की समीक्षा करने के बाद भारत की सरकारी मशीनरी इस निष्कर्ष पर पहुंच गई कि कल तक सस्ती और सहज सुलभ दिखने वाली जो दवा आज एकाएक दवाओं की क्वीन बनने की कगार पर आ खड़ी हुई है, भारत में संप्रति उसकी स्वदेशी खपत के साथ-साथ वैश्विक मांग को पूरा करने का भी सामर्थ्य है।

कोरोना वायरस

वीरेंद्र सिंह चौहान

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दशकों पहले खोजी गई साधारण और प्रचुर मात्रा में सुलभ दवा है जिसका इस्तेमाल हाल ही तक मलेरिया सहित कुछ अन्य रोगों में हो रहा था। मगर समूचे भूमंडल पर मंडरा रहे कोरोना रूपी दैत्य ने इस दवा को यकायक दवाओं की क्वीन या कहिए कि महारानी बना दिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने दो बार इस दवा के सबसे बड़े वैश्विक उत्पादक भारत के प्रधानमंत्री को फोन कर इस दवा के निर्यात के दरवाजे खोलने के लिए अनुरोध कर डाला। इस अनुरोध को भारत में सहजता से स्वीकार भी कर लिया। उधर, ब्राजील के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन कर इस दवा को संजीवनी बूटी का नाम दे डाला। कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन जिसे संक्षेप में एचसीक्यू कहकर पुकारा जा रहा है, फिलहाल कोरोनारोधी संग्राम में एक बड़ी भूमिका में खड़ी है।

जब यह सब हो रहा था ठीक उसी समय सरकारी एजेंसियां भारत में इस दवा की उत्पादन क्षमता, उसके उत्पादन में काम आने वाले एक्टिव फार्माक्यूटिकल इनग्रेडिएंट की उपलब्धता और वर्तमान में इसकी आवश्यकता के साथ-साथ भविष्य में संभावित मांग से निपटने की तैयारी की समीक्षा भी कर रही थी। अपने घर में जमीनी स्थितियों की समीक्षा करने के बाद भारत की सरकारी मशीनरी इस निष्कर्ष पर पहुंच गई कि कल तक सस्ती और सहज सुलभ दिखने वाली जो दवा आज एकाएक दवाओं की क्वीन बनने की कगार पर आ खड़ी हुई है, भारत में संप्रति उसकी स्वदेशी खपत के साथ-साथ वैश्विक मांग को पूरा करने का भी सामर्थ्य है।

इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस के सेक्रेटरी जनरल सुदर्शन जैन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि भारत विश्व में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के उत्पादन का लगभग 70 फीसदी अकेला तैयार करता है। अमेरिका में इस दवा की सहज सामान्य खपत का करीब 47 प्रतिशत भारत उपलब्ध करवाता रहा है।

मगर जैसे ही केंद्र सरकार ने अमेरिका, ब्राजील और श्रीलंका सहित विभिन्न देशों की जरूरतों के मद्देनजर इसके निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध में छूट दी तो तथ्यों की पड़ताल किए बिना नकारात्मक सियासत करने वाले नरेंद्र मोदी के 56 इंच वाले सीने का नाप लेने निकल पड़े। किसी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश के साथ तो किसी ने कहा देश की कोरोनावायरस मरीजों के साथ धोखा किया है। सब कुछ जानते हुए भी कांग्रेस ने अपने ट्विटर हैंडल से इस आशय के हैश टैग के साथ सोशल मीडिया पर खूब शोरगुल किया।

प्रजातंत्र में सवाल खड़े करने का सबको अधिकार है परंतु बेतुके सवाल उछाल कर इन लोगों ने खुद अपनी किरकिरी करवाई है। भारत में इस दवा का उत्पादन एवं विपणन करने वाली कंपनियों के आला अधिकारियों को मीडिया में आकर यह स्पष्ट करना पड़ा कि दुनिया हमसे हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन मांग रही है तो यह रूदन-क्रंदन का विषय नहीं। अनुमान के अनुसार भारतीय कंपनियां इस माह के अंत तक माह में इस दवाई का उत्पादन मौजूदा दस मीट्रिक टन से बढ़ाकर चालीस मीट्रिक टन करने में समर्थ हैं और उससे अगले माह उसे उसका सत्तर मीट्रिक टन तक भी कर सकती हैं। यह कहना बिलकुल अतिश्योक्ति नहीं होगा कि संकट ने भारत के उद्योग को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन जैसी साधारण दवाई के बहाने विश्व में अपनी पैठ को और प्रभावी बनाने का अवसर प्रदान किया है।

यहां यह उल्लेख करना भी उपयोगी रहेगा कि विश्व में जेनेरिक दवाइयों की आपूर्ति में बड़ा खिलाड़ी होने के कारण भारत को विश्व का औषधालय फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड भी कहा जाता है। जब संसार संकट में है और उस संकट से निपटने में मदद करने का सामर्थ्य हमारे फार्मा उद्योग के पास है तो सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया की कामना करने वाले राष्ट्र से वैसे भी आत्म केंद्रित और स्वार्थी होने की उम्मीद नहीं की जाती। आने वाले दिनों में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन अपना गेम-चेंजर, औषधियों की क्वीन या संजीवनी बूटी वाला दर्जा कायम रख सके अथवा न रख पाए, भारत बेवजह विश्व कल्याण के पुरोधा होने के अपने जगजाहिर सिद्धांत से मुख क्यों मोड़े? आलोचकों का क्या, उनमें अधिकांश वही हैं जिन्हें भारत के अंतर्निहित सामर्थ्य पर रत्ती भर भरोसा नहीं है। यह वही जमात है जो आंख मूंदकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार विरोध करती आई है और जिसने बारंबार अपने अंध विरोध के कारण तथ्यों वह आंकड़ों के तीखे तीरों से अपनी छाती छलनी करवाई है। इस बार भ्ज्ञी ऐसा ही हुआ, किसी भी भारतवासी ने उनके इन आरोपों को गंभीरता से लिया ही नहीं।

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