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डॉ. चंद्र त्रिखा का लेख: कोरोना वायरस को लेकर अंधेरे में चल रहे हाथ-पांव

अभी कुछ भी तय नहीं है। सारी दुनिया के शोधकर्ता, विशेषज्ञ एवं चिकित्सक अंधेरे में ही हाथ-पांव मार रहे हैं? क्या यह महामारी छींक, ज़ुकाम व ज्वर के मिश्रित स्वरूप से फैलती है? यह निश्चित नहीं है। नए 'पाजिटिव' परिणाम बता रहे हैं कि ऐसे भी संक्रमित मामले मिले हैं जिनमें ये लक्षण कतई मौजूद नहीं थे।

डॉ. चंद्र त्रिखा का लेख: कोरोना वायरस को लेकर अंधेरे में चल रहे हाथ-पांव

यकीन रखें कि देर-सवेर कोरोना-आतंक से मुक्ति मिल चुकी होगी। फिलहात अंतिम सीमा समय जून का महीना है। प्रथम मई के आसपास सीमित छूट शुरू हो जाने की संभावना है। मगर जि़ंदगी जीने की शैली यकीनन आज वाली नहीं होगी। अगर रेलें शुरू होंगी तो चार वाली बेंच पर चार यात्री नहीं बैठ सकेंगे। दो से ज्यादा की अनुमति शायद नहीं होगी। गाड़ी में प्रवेश के लिए धक्कमपेल पर कड़ा जुर्माना होगा। आप पहले की तरह 'टायलेट' में पान वगैरह थूक नहीं पाएंगे, न ही वहां पर ऊल-जुलूल बातें लिखने की इजाज़त होगी। यही विमान यात्रा में होगा। अब आपको कम से कम दो घंटे पहले हवाई अड्डे पर पहुंचना होगा। वहां भी निरीक्षण होगा। यह कई स्तरों पर होगा। विमानों में खाना शायद लंबे समय तक नहीं मिलेगा। सिर्फ जल और सीलबंद स्नैक्स मिलेंगे। बसोंं में भी यही होगा। एक सीट पर सिर्फ एक यात्री ही बैठ पाएगा। ऐसे ढेरों बदलाव फिलहाल कई महीनों तक चल सकते हैं, इसलिए इन सबके लिए तैयार रहें और धीरे-धीरे आदतें बदल लें।

अभी कुछ भी तय नहीं है। सारी दुनिया के शोधकर्ता, विशेषज्ञ एवं चिकित्सक अंधेरे में ही हाथ-पांव मार रहे हैं? क्या यह महामारी छींक, ज़ुकाम व ज्वर के मिश्रित स्वरूप से फैलती है? यह निश्चित नहीं है। नए 'पाजिटिव' परिणाम बता रहे हैं कि ऐसे भी संक्रमित मामले मिले हैं जिनमें ये लक्षण कतई मौजूद नहीं थे।

चीनी अध्ययनों व विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार 80 प्रतिशत मामलों में ऐसे लक्षण नहीं मिलते। अब न्यू इंगलैंड जर्नल आॅफ मेडिसिन में प्रकाशित एक अमेरिकी अध्ययन के अनुसार यह वायरस हवा में भी रह सकता है। वैज्ञानिकों को यह नहीं पता कि क्या उस स्तर पर भी यह बीमारी फैल सकती है। इस सवाल पर कि क्या कोविड-19 उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी आने से रुक सकता है, इस पर विशेषज्ञों ने कहा कि यह संभव है, लेकिन इस बारे में पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता है। फ्लू जैसे श्वसन संबंधी विषाणु ठंडे और शुष्क मौसम में अधिक स्थिर होते हैं, इसलिए ये सर्दियों में अधिक तेजी से फैलते हैं। हांगकांग के शोधकर्ताओं ने पाया कि एशिया में 2002-03 का सार्स विषाणु उस समय अधिक फैला जब नमी और तापमान कम था। यह विषाणु कोरोना वायरस से निकटता से जुड़ा है। अमेरिका में हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के अध्ययन में आगाह किया गया कि केवल मौसम में बदलाव से कोविड-19 के मामले कम नहीं होंगे जब तक कि बड़े पैमाने पर जन स्वास्थ्य संबंधी उपाय न किए जाएं।

चीन में जब यह महामारी चरम पर थी तो हांगकांग विश्वविद्यालय और स्कूल आॅफ पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर लियो पून तथा नान्चांग विश्वविद्यालय की टीम ने बीमारी के हल्के और गंभीर लक्षणों वाले मरीजों की तुलना की। ब्रिटिश पत्रिका 'द लांसेट' में प्रकाशित उनके अध्ययन में पाया गया कि इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित लोग बुजुर्ग थे और उनमें नाक तथा गले में विषाणु का जमाव इससे हल्के रूप में प्रभावित लोगों के मुकाबले 60 फीसदी अधिक था। सवाल अब भी बरकरार है कि क्या उम्र के कारण प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण वे इसकी ज्यादा चपेट में आए या विषाणु के अधिक संपर्क में आने से। खसरे के विषाणु पर अनुसंधान से पता चलता है कि बीमारी की गंभीरता उनके संपर्क में आने से भी संबंधित होती है। विशेषज्ञों को अभी मालूम नहीं है कि क्या कोविड-19 के मामले में भी ऐसा ही है।

सवाल यह भी है कि क्या किशोरों के मुकाबले में बच्चों को कोविड-19 से कम खतरा है? एक चीनी अध्ययन के अनुसार कोविड-19 से संक्रमित 10 में कोई बच्चा बहुत अधिक बीमार नहीं पड़ा। उन्हें गले में सूजन, खांसी और हल्के बुखार के ही लक्षण थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि विषाणु से संक्रमित लोगों के साथ रह रहे बच्चों में किशोरों के मुकाबले इसकी चपेट में आने की आशंका दो से तीन गुना कम रहती है।

क्या 'कुनीन' इसकी संजीवनी है? यह भी अनुमान मात्र ही है। मलेरिया के लिए बनी यह दवा कोरोना वायरस पर कितनी प्रभावी सिद्ध होती है, कुछ निश्चित नहीं है। यदि प्रभावी है तो इसके प्रयोग के बाद लक्षणों के बारे में भी जागरूकता ज़रूरी है। होम्योपैथी में भी कुछ विकल्प हैं। मेरे अपने लम्बे निजी अनुभव व प्रशिक्षित होम्यो चिकित्सकों के अनुसार इसके बचाव के लिए न्यूमोकाक्सिन नामक दवा 200 शक्ति में एक बार और 24 घंटे बाद ब्रायोनिया 30 व आर्स एल्ब 30 दिन में दो-दो बार सप्ताह भर लेना लाभप्रद रहता है। घरेलू उपचार के रूप में नीम, गिलोय, कच्ची हल्दी व तुलसी के पत्तों को उबालकर 30 एमएल रोज़ लेने से भी प्रतिरोधिक क्षमता बढ़ती है।ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि स्वच्छता व शारीरिक दूरी बनाए रखें और जब तक कुछ प्रामाणिक निष्कर्ष अंतिम रूप में सामने न आएं तब तक मिथ्या प्रचार से पूरा बचाव रखें।


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