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गौरीशंकर राजहंस का लेख: मुस्तैदी से लड़नी होगी कोरोना की जंग

ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होगा। परन्तु स्थिति तो तेजी से बिगड़ती ही जा रही है। ऐसा सोचा जा रहा था कि प्लाज्मा थैरेपी से शायद इस बीमारी पर नियंत्रण पा लिया जाएगा। परन्तु भारत के जाने माने डाक्टरों ने कहा कि प्लाज्मा थैरेपी कोई प्रमाणिक ईलाज नहीं है।

गौरीशंकर राजहंस का लेख: मुस्तैदी से लड़नी होगी कोरोना की जंग

कोरोना के कारण पूरे संसार में उत्थल पुथल मची हुई है। लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे हैं। सबसे बुरा हाल तो अमेरिका का है जहां हजारों लोग कोरोना से मर गए हैं। भारत की स्थिति भी अत्यन्त ही गंभीर है। सरकारी अनुमान के अनुसार 31 हजार से ज्यादा लोग इस वायरस के शिकार हो गए हैं और अनगिनत लोग प्रतिदिन मौत के मुंह में समा रहे हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होगा। परन्तु स्थिति तो तेजी से बिगड़ती ही जा रही है। ऐसा सोचा जा रहा था कि प्लाज्मा थैरेपी से शायद इस बीमारी पर नियंत्रण पा लिया जाएगा। परन्तु भारत के जाने माने डाक्टरों ने कहा कि प्लाज्मा थैरेपी कोई प्रमाणिक ईलाज नहीं है। सारे संसार में इस बीमारी की दवा खोजी जा रही है। परन्तु अभी तक उसमें सफलता नहीं मिल पाई है।

जानकार लोगों का कहना है कि कई वर्ष पहले हांगकांग फ्ल्यू भी इस तरह सारे संसार में फैल गया था। हांगकांग फ्ल्यू 1968-69 और 1969-70 में फैल गया था जिसमें अकेले अमेरिका में एक लाख लोग मौत के मुंह में समा गए थे। बाद में उस बीमारी का इलाज भी निकल गया। इसीलिए उम्मीद की जा रही है कि शायद एक वर्ष के अंदर कोरोना जैसी बीमारी का भी कोई न कोई इलाज निकल जाएगा।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि लाखों देहाड़ी मजदूर बिहार और उत्तर प्रदेश में अपने घर जाने के लिए बेचैन हैं। वे जानते हैं कि वहां उन्हें कोई जीविका का साधन नहीं मिलेगा। परन्तु दिल्ली और महाराष्ट् में रहकर भूखों मरने से अच्छा है अपने लोगों के बीच में रहनाइ ही ठीक है। लाखों मजदूर पैदल ही दिल्ली आदि से बिहार अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। बीच-बीच में कुछ गैर सरकारी संस्थाएं उनके खाने पीने का प्रबंध कर देते हैं। परन्तु कुल मिलाकर स्थिति अत्यन्त ही चिन्ताजनक है। कोरोना के कारण दिल्ली में सारे उद्योग-धंधे बन्द पड़े हैं और अभी दूर-दूर तक इस बात की कोई उम्मीद नहीं है कि निकट भविष्य में ये कारखाने दोबारा से खुल जाएंगे या इनमें काम श्ाुरू हो पाएगा। दिल्ली में जो कारखाने बंद हुए हैं उनमें वे मजदूर काम करते थे, जिन्हें कोई हुनर प्राप्त नहीं था। सरकार और जानकार लोगों को यह चिंता सता रही है कि एक तो ये मजदूर लौटकर दिल्ली, पंजाब और हरियाणा वापस नहीं आएंगे और यदि आए भी तो इन्हें जीविका का साधन कहां मिलेगा। कुल मिलाकर स्थिति अत्यंत ही भयावह है और किसी को यह समझ में नहीं आ रहा है कि यह विपदा कब खत्म होगी।

यह सच है कि लाॅकडाउन से लोगों को कोरोना से राहत मिली है, लेकिन यह लाॅकडाउन लंबे अरसे तक नहीं चलाया जा सकेगा। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि अलग-अलग राज्यों ने अपनी सीमाएं सील कर दी हैं। अभी हाल में हरियाणा और उत्तर प्रदेश ने अपनी सारी सीमाएं सील कर दी हैं। हरियाणा सरकार का कहना है कि फरीदाबाद, गुरूग्राम आदि शहरों में लोग काम करने के लिए दिल्ली से जाते और आते थे। वे अपने साथ कोरोना संक्रमण वायरस ले जाते थे। पूरे देश में इस बात का विरोध हो रहा है कि यदि इस तरह विभिन्न राज्य अपनी सीमाएं सील कर देंगे तो भारत का भविष्य क्या होगा? स्ाबसे अधिक चिंता की एक बात और है कि दिल्ली जैसे महानगर में यह वायरस तेजी से अपने पैर पसार रहा है और सरकार के लाख प्रयासेां के बाजवूद भी इस पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है।

गांव लौटने की चाहत में हजारों मजदूर बस अड्डों पर पड़े हुए हैं। उन्हें लाॅकडाउन की फिक्र नहीं है और वे यह नहीं समझ पा रहेे हैं कि अपने साथ अपने गांव में इस बीमारी को भी ले जाएंगे। इस बीमारी में सबसे खराब बात यह है कि यदि एक भी व्यक्ति संक्रमित हुआ तो उससे पूरा परिवार, पूरा मोहल्ला और गांव संक्रमित हो जाएगा। इस तरह की बीमारी संसार में पहले कभी नहीं देखी गई थी। ऐसा लग रहा है कि आम आदमी इस बीमारी की गंभीरता को समझ नहीं पा रहा है। यह सच है कि इस बीमारी के वायरस का पता लगाने के किट भारत में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। चीन से जो किट मंगाए गए उन पर बेतहाशा खर्च भी हुआ और वे अधिकतर नकली निकले।

प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा है कि लाॅकडाउन बढ़ाना या नहीं बढ़ाना अब राज्य के मुख्यमत्रियों पर छोड़ दिया गया है। अपने अपने राज्यों के हालात देखकर वे इसे बढ़ाने या नहीं बढ़ाने का निर्णय लेंगे। परन्तु अधिकतर मुख्यमंत्री लाॅकडाउन की अवधि कम से कम एक महीने आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। सवाल यह है कि यदि लाॅकडाउन बढ़ाया गया तो हजारों लोग बेरोजगार हो जाएंगे और उनकी आजीविका का कोई जरिया नहीं रहेगा। यह तो वही बात हुई कि एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई है। फिर भी इस त्रासदी में सारे भारत के लोग एक होकर खड़े हो गए हैं और लगता है कि वे मिलजुल मजबूती से कोरोना महामारी का मुकाबला करेंगे। सारे देश के लोग अत्यंत ही चिन्तित होकर कोरोना की त्रासदी से मुकाबला कर रहे हैं। वे ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि इस महामारी से जल्दी मुक्ति मिल जाए। कहना मुश्किल है कि उनकी प्रार्थना का कोई असर होगा या नहीं। प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा है कि जब तक स्थिति में सुधार नहीं हो जाता है, लोग घर से बाहर न आएं और यदि कार्यालय या फैक्टरी में जाना हो तो कम से दो गज की दूरी बनाए रखें। भारत की जनसंख्या बहुत अधिक है और अधिकतर लोग अनपढ़ हैं। पता नहीं वे प्रधानमंत्री के सुझाव को मानेंगे अथवा नहीं। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि सारी दुनिया के साथ साथ भारत भी भयानक संकट में पड़ गया है। देखना यह है कि भारत और दुनिया इस संकट से कब उभर पाते हंै।

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