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जी. वी. अंशुमान राव का लेख : मंत्रिमंडल विस्तार में भविष्य की आधारशिला

मंत्रिमंडल विस्तार के जरिये प्रधानमंत्री ने भविष्य की राजनीति के लिए स्पष्ट संदेश दिया है। पीएम मोदी ने इस विस्तार के जरिये सरकार में गृहमंत्री अमित शाह का कद ऊंचा किया है और गृहमंत्री की राजनीति को मजबूती दी है। शाह को गृह मंत्रालय के साथ नवगठित सहकारिता या समन्वय मंत्रालय की भी जिम्मेदारी दी गई है। समन्वय मंत्रालय का काम बेहद महत्वपूर्ण है। इस विस्तार से स्पष्ट संदेश है कि संघ, भाजपा व पीएम मोदी नए नेतृत्व को मजबूत कर रहे हैं, जिसमें अमित शाह का अहम स्थान हो सकता है। इस विस्तार में ताजगी है, नए चेहरे हैं, अनुभव हैं, युवा छवि है, योग्यता को तरजीह दी गई है।

जी. वी. अंशुमान राव का लेख : मंत्रिमंडल विस्तार में भविष्य की आधारशिला
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जी. वी. अंशुमान राव

जी. वी. अंशुमान राव

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सत्ता सियासत के गलियारों कई तरह की व्याख्या हो रही है। विस्तार के संदेश को अलग-अलग अंदाज में समझाया जा रहा है। कहीं वजनदार मंत्रियों की विदाई की चर्चा है तो कहीं पूर्व नौकरशाहों को मंत्रिमंडल में अहम जिम्मेदारी दिए जाने की। कई विश्लेषक जंबो मंत्रिमंडल बनाने पर आश्चर्य जता रहे हैं। इसके अलावा विस्तार में चुनावी राज्यों को विशेष तरजीह दिए जाने की भी चर्चा हो रही।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति को करीब से समझने वाले जानते हैं कि इन विश्लेषणों में कुछ भी नया नहीं है। पहले बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री और अब बतौर प्रधानमंत्री वह हमेशा से अपने फैसलों से लोगों को अचंभित करते रहे हैं। मसलन जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे जब सरकार के गठन और विस्तार में कई चौंकाने वाले तथ्य होते थे। बड़ा संदेश देने के लिए कद्दावर मंत्रियों को किनारे करना उनकी राजनीतिक कार्यशैली का अभिन्न हिस्सा रहा है। बतौर सीएम और बतौर पीएम मोदी तकनीकी रूप से दक्ष, तेजतर्रार नौकरशाह और जमीन से जुड़े गुमनाम लोगों को अपनी टीम में जगह देते रहे हैं। तो अब सवाल है कि इस विस्तार में ऐसा क्या नया है, जिसका विश्लेषण अब तक नहीं हुआ है? विस्तार में ऐसा कौन सा राजनीतिक संदेश छिपा है? जिसे विश्लेषक पढ़ नहीं पाए हैं? क्या इस विस्तार के जरिये प्रधानमंत्री ने भविष्य की राजनीति के लिए कोई अहम संदेश दिया है? अगर हां तो क्या? विस्तार का सबसे अहम संदेश महज एक पंक्ति का है। वह संदेश है कि पीएम मोदी ने इस विस्तार के जरिये सरकार में गृहमंत्री अमित शाह का कद ऊंचा किया गया है और उनकी राजनीति को मजबूती दी है।

मंत्रिमंडल विस्तार के निहितार्थ को समझने से पहले इस पर चर्चा करते हैं कि अमित शाह को प्रत्यक्ष तौर पर क्या हासिल हुआ। प्रधानमंत्री के बाद सरकार के तीन अहम चेहरों में से दो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सड़क-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की स्थिति ज्यों की त्यों है। दोनों के पास पहले की तरह ही पुराने मंत्रालयों की ही जिम्मेदारी है, मगर प्रधानमंत्री ने इन दोनों वरिष्ठ नेताओं की समान स्थिति को बरकरार रखते हुए अमित शाह के कद को ऊंचा किया है। वैसे भी संघ के आशीर्वाद के कारण राजनाथ या गडकरी की इच्छा के विरुद्ध उनके मंत्रालयों में छेड़छाड़ आसान नहीं था। इस स्थिति को भांपते हुए पीएम ने शाह को अहम मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी दे कर राजनीतिक संदेश दे दिया। शाह को गृह मंत्रालय के साथ नवगठित सहकारिता या समन्वय मंत्रालय की भी जिम्मेदारी दी गई है। समन्वय मंत्रालय का काम बेहद महत्वपूर्ण है। यह मंत्रालय विभिन्न मंत्रालयों के बीच सेतु का काम करेगा। इस अहम मंत्रालय के जरिये शाह की अन्य सभी मंत्रालयों में पहुंच आसान बना दी गई है। इसके अलावा पदोन्नति पाने वालों में किरेन रिजिजू, अनुराग ठाकुर, जी किशन रेड्डी आदि विशुद्ध रूप से शाह खेमे के माने जाते हैं। कैबिनेट मंत्रियों में शामिल भूपेंद्र यादव, नारायण राणे, डॉ. वीरेंद्र कुमार को हमेशा ही शाह का आशीर्वाद प्राप्त रहा है। राज्य मंत्रियों में भी शाह कैंप के चेहरों की भरमार है। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश से जिन सात चेहरों को शामिल किया गया है, उनमें से पांच सीधे-सीधे शाह के करीबी माने जाते हैं।

पश्चिम बंगाल की जो नई टीम तैयार की गई है, उसमें भी शाह की छाप साफ तौर पर नजर आती है। अमित शाह की मजबूती और सरकार में हुए अहम बदलावों को दूसरी दृष्टि भी पढ़ने और समझने की जरूरत है। खासतौर से प्रधानमंत्री की विरासत की दृष्टि के हिसाब से देखा जाए तो यह चर्चा तो सियासी गलियारे में होती ही है कि भविष्य में मोदी की विरासत कौन संभालेगा। यह सवाल इसलिए भी जरूरी है कि अगले लोकसभा के चुनाव के तत्काल बाद प्रधानमंत्री मोदी के सामने अपने ही बनाए 75 वर्ष की उम्रसीमा के नियम का पालन करने की चुनौती होगी। इसे ही आधार बनाकर बीते सात सालों में कई मंत्रियों की छुट्टी हुई तो आडवाणी, जोशी जैसे कई दिग्गज नेता सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले विरासत के मामले में प्रधानमंत्री इतनी हड़बड़ी में नहीं थे, मगर बंगाल के नतीजे के बाद देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में अचानक राजनीतिक उबाल आना शुरू हो गया। बहाना कोरोना की दूसरी लहर के दौरान राज्य सरकार की कमजोर भूमिका और पंचायत चुनाव में पार्टी का औसत प्रदर्शन था। हालांकि हकीकत में यह लड़ाई जोर आजमाइश की थी। प्रधानमंत्री के करीबी नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा के प्रति मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लगातार उदासीन रवैये के बाद पर्दे के पीछे चल रहा तनाव अचानक सतह पर आ गया। एक वर्ग भले इसे अफवाह बताए, मगर सच्चाई तो यही है कि पीएम के करीबी एक वरिष्ठ नौकरशाह ने महज एमएलसी बनने के लिए तो वीआरएस नहीं लिया होगा।

बहरहाल इस सियासी बवाल में संघ ने निर्णायक भूमिका निभाई। आश्चर्यजनक रूप से संघ ने न सिर्फ योगी का बचाव किया बल्कि नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं को भी खत्म कर दिया। संघ नहीं चाहता कि नेतृत्व के स्तर पर आने वाले दशकों में भाजपा में शून्यता की स्थिति पैदा हो। वह भी तब जब साल 2025 में उसे अपना सौवां स्थापना वर्ष मनाना है। इसी उद्देश्य से संघ पीएम मोदी की विरासत को समय रहते तैयार कर लेना चाहता है। सवाल है कि संघ कैसी विरासत चाहता है। संघ को समझने वालों को पता है कि यह संस्था व्यक्ति केंद्रित नहीं बल्कि उद्देश्य केंद्रित है। संघ चाहता है कि हिंदुत्व के संदर्भ में मोदी सरकार के कार्यकाल में जैसा आभामंडल बना है, उसे कम से कम एक दशक बरकरार रखना जरूरी है। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि मोदी के सात साल के कार्यकाल में राजनीति में एक आम समझ विकसित हुई है कि देश में सबके हित की बात करने वालोंं की ही राजनीति की गाड़ी आगे बढ़ेगी। संघ को लगता है कि मोदी के द्वारा तैयार आभामंडल को योगी में आगे बढ़ाने की क्षमता है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव से पूर्व संघ योगी के पक्ष में पूरी ताकत से खड़ा लगता है।

संघ से लेकर भाजपा तक पीएम नरेंद्र मोदी के बाद नए नेतृत्व तैयार करने पर मंथन चल रहा है। मोदी 2.0 सरकार में अमित शाह को जिस तरह गृहमंत्री बनाया गया और उन्होंने पूरी तैयारी के साथ धारा 370 के अधिकांश प्रावधान हटाने की संसद से घोषणा की, उससे लगा है कि संघ व भाजपा अमित शाह में नए नेतृत्व का अक्स देख रहे हों। शाह पीएम मोदी की भी पसंद हैं। इस विस्तार में भी शाह के करीबियों को अधिक मौका मिला है। विस्तार से पहले प्रधानमंत्री ने सहयोगी दलों से बातचीत की जिम्मेदारी अकेले शाह को दी थी। इस विस्तार में बेशक नई टीम पीएम की हो, पर उसमें चेहरे शाह की सियासत को मजबूती देने वाले हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)


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