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आलोक पुराणिक का लेख : सिर्फ शब्द नहीं है सहकारिता

सहकारी बैंकों की कारगुजारियाें का खामियाजा करदाता पर क्यों पड़ना चाहिए। रिजर्व बैंक के सीधे नियंत्रण में हर सहकारी बैंक को आना चाहिए। बैंकिंग का मतलब आम जनता का डिपाजिट होता है, इसलिए रिजर्व बैंक की जिम्मेदारी बनती ही है। सहकारिता सिर्फ लूट खाने का औजार नहीं है, बल्कि सर्वजन सुखाय का मंत्र भी है, इस बात को सच में साबित होना चाहिए।

आलोक पुराणिक का लेख : सिर्फ शब्द नहीं है सहकारिता
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आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

बैंकिंग नियंत्रण संशोधन विधेयक चर्चा में है। इसे सहकारी बैंकों के प्रबंधन की बेहतरी की दिशा में कदम माना जा सकता है। पहले 26 जून 2020 को एक अध्यादेश लाया गया था, जिसमें 1540 सहकारी बैंकों को रिजर्व बैंक के सीधे नियंत्रण में लाया गया था। इसे लेकर विवाद खड़ा हुआ था।

गौरतलब है कि सहकारी बैंकों पर राज्य सरकारों का भी नियंत्रण होता है। आंकड़े बताते हैं कि सहकारी बैंकों के हाल बहुत अच्छे नहीं है। राजनेताओं के दखल के कारण बहुत पैसा डूबा है उनमें। आंकडों के अनुसार मार्च 2019 में सहकारी बैंकों में डूबत कर्ज का अनुपात 7.27 प्रतिशत था, मार्च 2020 तक यह बढ़कर 10 फीसदी हो गया। इसके अलावा नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के समय भी कई सहकारी बैंकों की भूमिका संदिग्ध ही रही थी।

बैंकिंग जगत में तरह-तरह के बैंक हैं, सरकारी बैंक, निजी बैंक, सहकारी बैंक। सहकारी बैंकों को तमाम समस्याएं घेरे रहती हैं। गत वर्ष पीएमसी बैंक का मसला बहुत चर्चा में आया था। मूल समस्या यह थी कि बैंक ने जो कुल कर्ज दिए, 8880 करोड़ रुपये के, उनमें से 6500 करोड़ रुपये यानी करीब 73 प्रतिशत एक ऐसी कंपनी एचडीआईएल को दिए, जो विकट समस्याओं में थी। रिजर्व बैंक आफ इंडिया के पूर्व डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने इस मसले पर दिए एक साक्षात्कार में कहा कि कोआपरेटिव बैंकों के बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स में हितों का टकराव होता है। जो लोग कर्ज लेते हैं वही बतौर अंशधारक कोआपरेटिव बैंकों का प्रबंधन चुनते हैं। देने वाले भी वही, लेने वाले भी वही तो समस्याएं पैदा होंगी। रिजर्व बैंक की पूर्व डिप्टी गवर्नर रहीं ऊषा थोराट ने इस विषय पर एक साक्षात्कार में बताया कि एच मालेगाम समिति ने यह सिफारिश की थी कि कोआपरेटिव बैंकों में बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स की नियुक्ति के अलावा बोर्ड आफ मैनेजमेंट बनाया जाना चाहिए। तर्क यह था कि बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स में तो कर्ज लेने वाले अपने बंदों को नियुक्त करवा लेते हैं, डिपाजिट धारकों का हित देखने वाले कोई नहीं होता। पर इस सुझाव को लागू नहीं किया गया। राज्य सरकारों का हित इस बात में होता है कि उनके अधिकार क्षेत्रों में कोई कटौती न हो। रिजर्व बैंक सहकारी बैंकों पर किस हद तक दखल कर सकता था, इसे लेकर भी अस्पष्टता थी। अब कई बातें बहुत साफ साफ होंगी। एक ही संस्थान पर दोहरा नियंत्रण होता है तो बातें साफ नहीं हो पाती हैं। रिजर्व बैंक के सीधे नियंत्रण में आने से कई सहकारी बैंकों का कामकाज सुधरेगा, ऐसी उम्मीद की ही जा सकती है।

इस मसले पर ज्ञान-चिंतन की कोई कमी नहीं है। 1991 में सतीश मराठे समिति, 1999 में माधव राव समिति, 2005 में एनएस विश्वनाथन वर्किंग ग्रुप, 2011 में वाईएच मालेगाम समिति, 2015 में आर गांधी समिति यानी करीब तीस सालों ने कोआपरेटिव बैंकिंग को बेहतर बनाने के सुझाव दिए जा रहे हैं, फिर भी स्थितियां बहुत नहीं सुधरी हैं। कई बार ज्ञान से ज्यादा जरुरी बात इच्छाशक्ति होती है। इच्छाशक्ति हो, तो कई मसलों को सुलझाया जा सकता है। सहकारिता का जिक्र जहां आता है वहां पालिटिक्स आ जाती है। अच्छी पालिटिक्स हो तो कोआपरेटिव अमूल भी हो सकता है, लुटेरी पालिटिक्स हो, तो पीएमसी बैंक हो सकता है। यानी इच्छाशक्ति और मंशाओं की बात महत्वपूर्ण है।

सहकारी बैंकों पर दोहरा नियंत्रण ही मूल मसला है। राज्य सरकारों को रिजर्व बैंक का दखल ठीक नहीं लगता। इससे उनके मनमाने तरीके से काम करने पर चोट पहुंचती है। दूसरी तरफ राज्य सरकारें यह भी सुनिश्चित नहीं कर सकतीं कि सहकारी बैंक बेहतरीन तरीके से काम करें। यानी कुशलता की जिम्मेदारी राज्य सरकारें नहीं लेना चाहेंगी पर अपने हक को वो जरुर हासिल करना चाहेंगी। यह बात ठीक नहीं है। ऐसी सूरत में अगर रिजर्व बैंक हस्तक्षेप करता है तो इसे संघवाद पर चोट नहीं माना जाना चाहिए। संघवाद का मतलब यह नहीं है कि राज्य सरकारें मनमानी करती रहें, असावधानी और लापरवाहियां करती रहें पर केंद्र सरकार या संबंधित संस्थान आंखें बंद किए रहें।

समस्याएं कई बार संगठन में नहीं होती है। सहकारी संगठन अपने आप में बहुत सार्थक संगठन है, इससे बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की साधना हो सकती है। अमूल ने गुजरात में यह करके दिखाया है। पर सहकारी संगठनों को राजनीति का औजार बनाकर कुछ नेता अपनी साधना भी कर सकते हैं, उत्तर प्रदेश और बिहार के तमाम सहकारी संगठनों ने यह करके दिखाया है। रिजर्व बैंक के अधीन बैंकिंग को होना ही चाहिए, वह चाहे सहकारी बैंकिंग हो या निजी बैंकिंग। बैंकिंग से जमाधारकों के हित जुड़े होते हैं। जमाधारक की वित्तीय साक्षरता भारत में आम तौर पर बहुत कम है। उसके लिए सारे बैंक एक जैसे होते है। आम जमाधारक यह नहीं समझता कि सहकारी बैंकों पर रिजर्व बैंक का वैसा दखल नहीं हैं जैसा निजी बैंकों और सरकारी बैंकों पर है। इसलिए रिजर्व बैंक का जिम्मा हो जाता है कि वह सुनिश्चित करे कि आम जमाधारक की रकम सुरक्षित रहे। इसलिए केंद्र सरकार संसद में कुछ ऐसे कदम उठाती है जिनसे रिजर्व बैंक का दखल सुनिश्चित हो तो इसका स्वागत ही होना चाहिए। संघवाद की आड़ में नेताओं को अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। यह लगातार देखने में आया कि सहकारी बैंकों के प्रबंधन के आचरण संदेह से घिरे रहे हैं। सहकारी बैंकों द्वारा दिए गए कर्जों के डूबने का अनुपात भी लगातार बढ़ा है। आखिर में पैसा तो आम डिपाजिटर का ही डूब रहा है। केंद्र सरकार या राज्य सरकार अगर किसी बैंक को बचाने में रकम दे तो भी करदाता का ही पैसा जा रहा है। सहकारी बैंकों के प्रबंधन की कारगुजारियां का खामियाजा करदाता पर क्यों पड़ना चाहिए। रिजर्व बैंक के सीधे नियंत्रण में हर सहकारी बैंक को आना चाहिए। बैंकिंग का मतलब आम जनता का डिपाजिट होता है। इसलिए रिजर्व बैंक की और केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बनती ही है। सहकारिता सिर्फ लूट खाने का औजार नहीं है, बल्कि सर्वजन सुखाय का मंत्र भी है, इस बात को सच में साबित होना चाहिए।

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