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चिंतन : एक सीमा में रहकर हो विरोध प्रदर्शन

यह और कुछ नहीं, आम लोगों को बंधक बनाने वाला कृत्य है। कई बार तो ऐसे कृत्यों के कारण लाखों लोगों की दिनचर्या प्रभावित होती है। ऐसा ही शाहीन बाग में हो रहा है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम 15 दिसंबर 2019 से कालिंदी कुंज मुख्य मार्ग को बंद कर रखा है।

शाहीन बाग: वार्ताकार कल दोबारा जाएंगे शाहीन बाग, वार्ताकार ने कहा एक दिन में सभी बाते पूरी करना असंभवशाहीन बाग प्रदर्शनकारियों से बात करने के बाद जानकारी देता सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित दल

लोकतंत्र हमें विरोध करने का अधिकार देता है, लेकिन इसकी सीमा वहीं तक है, जहां किसी अन्य के अधिकार का हनन न हो। हर अधिकार की अपनी सीमाएं होती हैं, कोई अधिकार असीमित नहीं हो सकता। विरोध, हड़ताल अथवा आंदोलन के अधिकार के नाम पर लोग सड़क अथवा रेल मार्ग बाधित नहीं कर सकते, लेकिन दुर्भाग्य से अपने देश में अधिकतर ऐसा ही होता है। यह और कुछ नहीं, आम लोगों को बंधक बनाने वाला कृत्य है।

कई बार तो ऐसे कृत्यों के कारण लाखों लोगों की दिनचर्या प्रभावित होती है। ऐसा ही शाहीन बाग में हो रहा है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम 15 दिसंबर 2019 से कालिंदी कुंज मुख्य मार्ग को बंद कर रखा है।इससे दिल्ली से नोएडा जाने वालों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। काम पर जाने वाले लोगों को चंद मिनटों की दूरी घंटों में तय करनी पड़ रही है। मुख्य सड़क बंद होने से स्थानीय लोगों को भी परेशानी हो रही है। दुकानें बंद होने कारण व्यापारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। सबसे ज्यादा दिक्कत स्कूली बच्चों को हो रही है और अब तो बोर्ड एग्जाम भी शुरू हो चुके हैं, लेकिन उन्हें स्कूल पहुंचने में ही घंटों का सफर तय करना पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट तक ने कहा कि लोगों को विरोध-प्रदर्शन का तो हक है, लेकिन इस तरह लंबे वक्त तक रास्ता बंद करके नहीं। रास्ता खुलवाने के लिए रास्ता निकले, इसके लिए कोर्ट ने वार्ताकारों की टीम बनाई जो बुधवार को प्रदर्शनकारियों को समझाने के लिए गई, लेकिन प्रदर्शनकारी अभी भी अड़े हुए हैं। वार्ताकार साधना रामचंद्रन और संजय हेगड़े ने प्रदर्शनकारियों से कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन करने के उनके अधिकार को बरकरार रखा है, लेकिन इससे अन्य नागरिकों के अधिकारों पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। हम सब मिलकर समस्या का हल ढूंढना चाहते हैं। हम सबकी बात सुनेंगे, लेकिन प्रदर्शनकारी नहीं माने। यह विरोध के नाम पर मनमानी तथा धरने के प्रति नरमी दिखाना कानून के शासन के साथ-साथ शांतिप्रिय लोगों के अधिकारों की अनदेखी भी है। यह ठीक नहीं। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जिस तरह बड़े पैमाने पर आगजनी और तोड़फोड़ हुई। अब जबकि सब कुछ शांत हो चुका है तो शाहीन बाग क्यों।

प्रदर्शन के नाम पर सड़क पर कब्जा जमाकर बैठ जाना गलत है। बीते दिनों इसके खिलाफ वहां के दुकानदारों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। उनका कहना था कि लगातार धरना चलने के कारण उनका काम-धंधा चौपट हो गया है। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने वार्ताकारों की नियुक्ति कर दी है तो प्रदर्शनकारियों को भी इस फैसले का सम्मान करते हुए अपने रुख में नरमी दिखानी चाहिए। सर्वोच्च अदालत द्वारा नियुक्त वार्ताकारों ने धरना या विरोध खत्म करने को नहीं कहा है, वे केवल अदालत के आदेश पर धरने का स्थान बदलने के लिए वहां पहुंचे हैं। आज के हालात को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि धरने पर बैठे लोग अपना अड़ियल रवैया आसानी से नहीं छोड़ेंगे। पहले वे कानून वापस लेने पर अड़े हैं, फिर यह मांग करने लगे कि सरकार को उनसे बात करने धरनास्थल आना चाहिए। इसके बाद उन्होंने हजारों की संख्या में एकत्रित होकर गृहमंत्री से कथित तौर पर वार्ता करने की ठानी, लेकिन मिलने का समय तक नहीं लिया। अब वार्ताकार पहुंचे तो वे जिद पर अड़ गए, इससे यही समझा जाएगा कि धरना आम जनता के सब्र का इम्तिहान ले रहा है?

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