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डाॅ. रहीस सिंह का लेख : एशिया की एकजुटता में बाधाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंतव्यपूर्ण संदेश पर किसी को कोई संदेह तो हो नहीं सकता, लेकिन यह प्रश्न तो अहम है कि आखिर एशिया जैसा समृद्ध महाद्वीप बाहरी आक्रांताओं, उपनिवेशवादियों और नवउपनिवेशवादियों की महत्वाकांक्षाओं का कुरुक्षेत्र क्यों बनता रहा? शायद इसलिए कि ‘एकता के बाद भी एकता के अभाव’ से एशिया हमेशा ही गुजरता रहा है और आज भी गुजर रहा है। आखिर वह कौन सी वजह है कि साझी संस्कृति और विरासत से समृद्ध यह महाद्वीप परम्परागत संघर्षों से गुजरता रहता है? जबकि एशिया में वैश्विक नेतृत्व की भरपूर क्षमता है।

डाॅ. रहीस सिंह का लेख : एशिया की एकजुटता में बाधाएं
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डाॅ. रहीस सिंह।  

डाॅ. रहीस सिंह

अठारह फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोविड प्रबंधन पर पड़ोसी देशों की कार्यशाला को संबोधित करते हुए जो बात कही, उस पर वास्तव में विचार करने की जरूरत है। ऐसा नहीं दक्षिण एशिया और हिन्द महासागर के देश इस सत्य से परिचित नहीं होंगे लेकिन शायद वे इस सत्य के साथ आगे बढ़ने में प्रायः परहेज करते रहे हैं। सवाल उठता है कि क्यों? इस स्थिति में भी क्या इन देशों से अपेक्षा की जा सकती है कि ये प्रधानमंत्री मोदी के मंतव्य पर गम्भीरता से विचार कर पाएंगे कि यदि 21 वीं सदी एशिया की है तो यह दक्षिण एशिया और हिंद महासागर के देशों समेत सभी एशियाई राष्ट्रों की एकजुटता के बिना संभव नहीं हो सकती है? प्रधानमंत्री के मंतव्यपूर्ण संदेश पर किसी को कोई संदेह तो हो नहीं सकता लेकिन यह प्रश्न तो अहम है कि आखिर एशिया जैसा समृद्ध महाद्वीप बाहरी आक्रांताओं, उपनिवेशवादियों और नवउपनिवेशवादियों की महत्वाकांक्षाओं का कुरुक्षेत्र क्यों बनता रहा? शायद इसलिए कि 'एकता के बाद भी एकता के अभाव' से एशिया हमेशा ही गुजरता रहा है और आज भी गुजर रहा है।

आखिर वह कौन सी वजह है कि साझी संस्कृति और विरासत से समृद्ध यह महाद्वीप परम्परागत संघर्षों से गुजरता रहता है? सवाल यह भी उठता है कि यदि ब्रिटेन के उपनिवेश रहे संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन में साझा रणनीति बन सकती है और दुनिया के भौतिक व प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की साझा रणनीति अपना सकते हैं, लम्बे समय तक दुश्मन रहे जर्मनी और फ्रांस मिलकर यूरोपीय संघ को नया आयाम दे सकते हैं, अमेरिका द्वारा सबसे ज्यादा बर्बाद किए गये जापान और अमेरिका के बीच दोस्ती हो सकती है और दोनों मिलकर प्रशांत क्षेत्र का नक्शा बदल सकते हैं, तो आखिर एशिया के देश अपने मतभेदों व दुश्मनी को त्याग कर एकजुट क्यों नहीं हो सकते?

भरपूर सामर्थ्य

वैश्विक परिदृश्य में मौजूद मानवीय, आर्थिक व अन्य पक्षों को देखने से जो विशेष बात नजर आती है वह प्रायः कई सवाल पैदा करती है। अर्थात एशिया ग्लोब का सबसे बड़े भू-भाग के साथ-साथ दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला महाद्वीप है, इसके पास दुनिया का 30 प्रतिशत भू-भाग और 4.299 बिलियन यानि दुनिया की 60 प्रतिशत आबादी है। यह दुनिया को सबसे तेज दर से आर्थिक विकास करने वाला क्षेत्र है और जीडीपी (पीपीपी) के आधार पर दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक महाद्वीप है। यही नहीं दुनिया की दूसरी, तीसरी और पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एशिया के पास ही हैं। एशिया दुनिया का सबसे तेज गति से उभरने वाला आर्थिक क्षेत्र और सबसे अधिक संभाव्यता (पोटेंशियल) वाला बाजार, जो पूरी दुनिया के साथ निर्णायक सौदेबाजी कर सकता है। कहने का तात्पर्य एशिया में डेमोग्राफी भी है, प्रचूर प्राकृतिक संसाधन भी है, सबसे बड़ा बाजार भी है और अपार क्षमता भी है। स्वाभाविक है, यदि एशिया के देश एकजुट हो जाएं तो न्यू वर्ल्ड आॅर्डर में निर्णायक भूमिका ही नहीं निभा सकते बल्कि विश्वव्यवस्था का नेतृत्व भी कर सकते हैं। इस सत्य को जानने और समझने के बाद भी एशियाई देश एक साथ आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं तो इसलिए क्योंकि कुछ बाधाएं हैं।

एकजुटता में प्रमुख बाधाएं

पहली बाधा तो पश्चिम है। इसे हम कई तरीके से विश्लेषित कर सकते हैं। प्रथम-पश्चिमी दुनिया यह कदापि नहीं चाहती कि एशियाई देश एकजुट हों इसलिए वे आधुनिक इतिहास के बड़े कालखण्ड में इन देशों में विभाजनकारी नीतियों को प्रश्रय देते रहे हैं ताकि ये कभी मजबूत न हो पाएं। द्वितीय- पश्चिमी श्रेष्ठता जैसे मिथक को वास्तविक मानने की प्रवृत्ति। अधिकांश एशियाई देश, उनके बुद्धिजीवी पश्चिम को श्रेष्ठ मानते रहे हैं इसलिए वे पश्चिमी नेतृत्व को स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन वे किसी भी स्थिति में एशिया के किसी देश को अपने से श्रेष्ठ मानना नहीं चाहते इसलिए वे उसके नेतृत्व को भी स्वीकार नहीं कर सकते। तीसरी बाधा एशियाई देशों की आपसी प्रतिस्पर्धा है। एशिया के अधिकांश देश स्वयं को बेहतर बनाने की बजाए दूसरे आगे बढ़ते या उभरते हुए देश की राह में निरंतर बाधा उत्पन्न करना चाहते हैं। उनकी सम्पूर्ण ऊर्जा इसी में खर्च होती है। यहां पाकिस्तान का उदाहरण लिया जा सकता है। चैथी बाधा चीन जैसे महत्वाकांक्षी पीपल्स रिपब्लिक की साम्राज्यवादी-विस्तारवादी नीतियां है। वह अपनी आर्थिक और सैनिक ताकत के बल पर दक्षिण चीन सागर पर अपना आधिपत्य जमाता है और इस क्षेत्र के देशों के साथ उपनिवेशों की तरह से व्यवहार करता है।

जापान-चीन के कटु संबंध

एक अन्य बाधा चीन और जापान के मध्य भू-क्षेत्रीय विवाद है जिसमें सेंकाकू द्वीप समूह तथा तेल क्षेत्र शामिल है। यह विवाद जापान और चीन के 'एक्सक्ल्यूसिव इकोनाॅमिक सी जोन' को आच्छादित करता है। इसके लिए जापान चीन को दोषी मानता है और चीन जापान को। जापान चीन का एक विवाद इतिहास का भी है जिसमें खासतौर पर जापान के पूर्व एशिया में किए गये सैनिक अभियान हैं जो उसने सैन्यवादी काल में किए थे।

भारत को लेकर चीन का भय

भारत और चीन के मध्य भू-क्षेत्रीय विवाद लगातार तनाव की स्थिति बनाए रख रहा है। दरअसल चीन इस बात डरता है कि भारत एक उदार लोकतंत्र और उभरती अर्थव्यवस्था के साथ पुनः एशिया को लीड न करने लगे। वह इस बात से भी चिंतित रहता है कि भारत जिस प्रकार से इंडो-पैसिफिक में मिनिलैटरल्स अथवा ग्रेट लैटरल्स का निर्माण कर रहा है वे चीन की महत्वाकांक्षाओं पर विराम लगा सकते हैं। इसलिए वह निरंतर भारत-चीन सीमा पर ऐसी चुनौतियों को निर्माण पैदा करता रहता है ताकि भारत उनमें उलझा रहे। चीन का पाकिस्तान प्रेम भी भारत के प्रति उसकी कटुता का ही एक हिस्सा है। वह निरंतर पाकिस्तान सहित अन्य भारतीय पड़ोसियों का भारत के खिलाफ उकसाता रहता है और अपनी चेकबुक डिप्लोमैसी के जरिए एशियाई देशों के प्राकृतिक संसाधानों और निर्माण योजनाओं में घुसकर उनकी राजनीतिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने की शक्ति अर्जित कर चुका है।

चीन का विस्तारवादी रवैया

चीन का यह रवैया एशिया की एकता और इस एकता की एशियाई शक्ति के रूप में अभिव्यक्ति के लिए अत्यधिक घातक है। कारण यह कि इससे एक तरफ तो चीन दूसरे देशों के आर्थिक संसाधनों पर कब्जा कर अपनी राष्ट्रीय आर्थिक ताकत को बढ़ाती है जिसके चलते चीन और अधिक शोषक एवं विस्तारवादी होता है। फलतः एशियाई देशों को शोषण बढ़ता है और उनमें चीन का लेकर भय पैदा होता है। चीन पाकिस्तान जैसे देश को भारत के लिए निरंतर उकसाता है, उसे आर्थिक सहायता देता है यहां तक कि उसके आतंकी सरगनाओं को संरक्षण प्रदान करता है। ये स्थितियां ऐसे अंतर्द्वन्द्वों का अनुरेखण करती हैं जो एशियाई एकता की तस्वीर को धुंधला बनाते हैं।

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