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भारत का संविधान: कॉलेजों और विश्वविद्यालय में बहुत आसानी से पढ़ाया जा सकता

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Jan 5 2019 1:42PM IST
भारत का संविधान: कॉलेजों और विश्वविद्यालय में बहुत आसानी से पढ़ाया जा सकता

भारत का संविधान दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए अद्भूत ज्ञान की त्रिपिटिका है। संविधान की इबारतों को कॉलेजों अौर विश्वविद्यालय में बहुत आसानी से पढ़ाया जा सकता है। व्यवस्थाओं और अधिकारों को लेकर सब कुछ साफ साफ और भाषा की पारदर्शिता के साथ लिखा गया है। कोई सरसरी तौर पर पढ़ें तो उसे लगेगा की राजकाज का संचालन करने में काहे की कठिनाई है। 

झील या नदी के पानी की ठंडक या समुद्र का उन्माद पानी में डूबने के बाद मालूम होती है। संविधान की फितरत भी ऐसी ही है। कई ऐसे पेंच है जो एक दूसरे से उलझते हुए बेहतर परिणामों की ओर ले जाते हैं। यदि उनमें पारस्परिकता और दिखने वाले अंतर्विरोध नहीं तो संविधान एक सपाटबयानी का दस्तावेज बनकर रह जाता है।

एटार्नी जनरली या महान्यायवादी और एडवोकेट जनरल याने महाधिवक्ता के दो पदों का निर्माण और क्षेत्राधिकार मौजूदा परिस्िथतियों में नए तरह की बहस मांगता है। लगभग एक जैसी भाषाओं में लिखा है कि वे दोनों संवैधानिक पदािधकारी हैं। सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह देंगे और ऐसे अन्य विधिक कर्तव्यों का पालन करेंगे जो उन्हे समय-समय पर निर्देशित किए जाएं।

इसके अतिरिक्त आवश्यकतानुसार संविधान की मर्यादा कायम रखने के लिए उन्हें आचरण करना होगा। एटार्नी जनरल पद पर नियुिक्त की योग्यता का उल्लेख नहीं है। अपेक्षित है कि राष्ट्रपति सक्षम व्यक्ति की ही नियुिक्त करेंगे। एडवोकेट जनरल उसे ही नियुक्त किया जा सकेगा जो किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने की योग्यता रखता हो।

अलग से यह प्रावधान भी कर दिया गया है कि राज्य के महावधिवक्ता को अधिकार होगा कि विधानसभा में बोले और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेंगे और किसी समिति में जिसमें उसका नामांकन किया गया हो वहां भी भागीदारी करेंगे। अमूनन निजी व्यवसाय करते वकीलों को एटार्नी जनरल या एडवोकेट जनरल या हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश किया जा सकता है।

जिला न्यायालय से पदोन्न्त होकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने का रास्ता तरक्की के नियमों के कारण बहुत लंबा होता है। इसलिए जिला न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट की ड्योढ़ी चढ़ने में बहुधा असफल भी होते हैं। न्यायमूिर्त हंसराज खन्ना अलबत्ता एेसे अपवाद हुए। यदि विवादस्पद परिस्थितियों में उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया हाेता तो वे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बन सकते थे।

संविधान की आत्मा उसका मकसद है। मकसद में साफ लिखा है कि यह संविधान भारत के हम लोगों ने बनाया है। धार्मिक ग्रंथों के उलट संविधान देववाणी या खुद के आदेश की तरह अन्य लोक से नहीं आया है। देश के किसी भी लेखक की सबसे अच्छी किताब के मुकाबले भी संविधान जनता के 300 से अधिक चुने गए प्रतिनिधियों की तीन बरस की बौध्दिक कसरत के बाद सामूहिक लेखक की किताब के रूप में नए भारत के संरक्षक के रूप में उपस्थित है।

पेचीदगी यही है कि संविधान की मर्यादा का पालन और उसके हुक्मनामे के मुकाबले देश कैसे चले। बहुत सोच विचार के बाद हमारे पुरखों ने तय किया कि देश में राष्ट्रपति और प्रदेशों में राज्यपाल के नाम से संवैधानिक सरकारें स्थापित हों। लगता है कि संवैधानिक सोच को भारत की प्राचीन राजव्यवस्था में गुरूकुल के प्राधानाचार्याें आदि की याद आ रही होगी।

वे राजदरबार में शासक को निर्णय लेने के लिए नीर-क्षीर विक्के की तजुबाई ज्ञानशास्त्र पढ़ाते रहते थे। राजा के आचरण पर उनकी निगाह और टोकाटाकी इस तरह हाेती थी मानों राजा अब भी उनके गुरूकुल में हों। कार्यसंचालन के लिए तब विधिकाएं नहीं थी। शासक या मंत्रिमंडल भी बराएनाम सलाह देने के लिए होता था। उसे संविधान में संशोधित किया गया है।

राष्ट्रपति और राज्यपाल की सलाह के लिए बने मंत्रिमंडल के सदस्यों को लगभग समान अधिकार होते हैं। यह जरूर है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री में विशेषािधकार होता है कि कब और किसे मंत्रिपरिषद में रखें या हटाएं। राजा का यह तेवर संवैधानिक मर्यादाओं में घुलमिल गया है। जनता के पक्ष की नुमाइंदगी के लिए पुरानी हुकूमत प्रणालियों में बहुत कुछ देखने को नहीं मिलता।

यूरोपीय नस्ल के आधुनिक लोकतंत्र में भारत में भी सहकार िकया है। यह तय पाया गया है कि जनता को राजा के संरक्षक के रूप में इस तरह प्रतिष्ठित किया जाए कि हर पांच बरस के शासन की समीक्षा हो। जनमत राजा अर्थात मंत्रिपरिषद को रखे या हटाए। यह नायाब नुस्खा चुनाव के जरिए कारगर होता है। लोकतंत्र में जनमत सबसे ऊपर है।

यह अब भी मृगमरीचिका या आकाश में धुंधलाते तारों की तरह उतनी रोशनी देता है जो सूरज के ऊगने के और डूबने के पहले और बाद में रात के अंधेरे से बचने के लिए आंखों में रोशनी भरती है। राजपक्ष के फैसलों के खिलाफ पहले जांच या अपील का कोई अधिकार किसी को नहीं था। भले ही राजा अत्याचारी हो। संविधान में न्यायपालिका को नया कौतुक महल खड़ा किया गया है।

उसमें एक साथ मंदिर, मस्जिद, गुरूद्धारे के संयुक्त मिलन का आध्यात्मिक अहसास है। वहां मुसीबतजदा लोग जाकर बेखौफ अपनी शिकायतें करते हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि संविधान कोई आकस्मिक या आतताई नस्ल की किताब नहीं है। उसका कोई भी कलपुर्जा ढीला हुआ तो समय के समुद्र में तैरता यह जहाज डूबने उतराने की मुद्रा में हिचकोले भी खाने लगता है।

ऐसा नहीं है कि सब कुछ ठीक चल रहा है। आजादी के 70 बरस बाद भी मशीनों के कलपुर्जे तो वही है लेकिन उनमें जंग भी लगी हुई है। जंग को मिट्टी या जल से धाेया जाता है। सियासी जंग को मिट्टी के सौंधेपन से पाक साफ किया जाता है। राष्ट्रपति और राज्यपालों का विवेक भी कई बार संदिग्ध होता रहता है।

प्रधानमंत्री और मंत्रीपरिषद के कंधो पर हुकूमत का महल अपनी खैर और सुरक्षा मांगता है वे कंधे भी भीष्मप्रतिज्ञा की तरह एकलक्षी और इतिहास को आवाज देने की शक्ल में कई बार नहीं भी होते हैं। न्यायपालिका भी बल्कि सुप्रीमकोर्ट तो दूर के ढोल सुहावने की तरह इतना महंगा होता जा रहा है कि संविधान बनाने वाले भारत के 125, 130 करोड़ लोग हतप्रभ हैं कि चारों ओर क्या हो रहा है।


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