Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

सुशील राजेश का लेख : जारी रही हैं साजिशें

सवाल यह नहीं है कि ट्वीट की साजिशें भारत जैसे संप्रभु और ताकतवर देश को कमजोर कर सकती हैं या नहीं, देश में सामाजिक विभाजन के हालात पैदा हो सकते हैं अथवा नहीं, सवाल यह है कि इस दुष्प्रचार का मुंहतोड़ जवाब कैसे दिया जाए और उग्रवादियों के साज़िशाना चक्रव्यूह कैसे तोड़े जाएं?

Farmers Protest:
X

सुशील राजेश

खालिस्तान की मांग के वित्तीय और नैतिक समर्थक कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी और पाकिस्तान में लगातार सक्रिय रहे हैं। मंसूबे अब भी हैं कि पंजाब को 'खालिस्तान' बनाया जाए। मौजूदा किसान आंदोलन की आड़ में ऐसी साज़िशें तेज और व्यापक हुई हैं। साइबर भाषा में जिसे 'टूलकिट' कहते हैं, ट्विटर के जरिए वह बेनकाब हुआ है। इसे गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी और उससे पहले के घटनाक्रम की 'प्रतिलिपि' (काॅपीकैट) भी करार दिया जा रहा है, क्योंकि साज़िशें,उपद्रव और हिंसा तय कार्यक्रमों के मुताबिक ही किए गए। लालकिले पर राष्ट्रीय ध्वज 'तिरंगा' उतार कर खालिस्तान का कथित झंडा लगाने तक की कोशिश की गई। पुलिसवालों को एके-47 से ही भून देने के हुंकारे दर्ज किए गए थे। अब उनकी जांच की जा रही है। अभी तो 13-14 फरवरी को दूतावासों के बाहर प्रदर्शन,कुछ मीडिया हाउस, कुछ उद्योगपतियों और सरकारी दफ्तरों पर 'ज़मीनी कार्रवाई' शेष है। इस 'ज़मीनी कार्रवाई' के मायने क्या हैं?

साज़िश बहुत बड़ी थी और 'टूलकिट' में 3,8,10,13,17,20 और 23 जनवरी की तारीखों का ज़िक्र भी है कि इस दिन क्या करना है और क्या किया जा चुका है। किसान आंदोलन और ट्रैक्टर परेड में किस तरह शामिल होना है, उसके तरीके भी सुझाए गए थे। विभिन्न चक्रव्यूहों के लिए अभिमन्यु तैयार किए जा रहे थे। साज़िशें सिर्फ रिहाना, ग्रेटा, मिया खलीफा और कुछ खिलाड़ियों तक ही सीमित नहीं थीं। उनकी लोकप्रियता और शख्सियत का इस्तेमाल किया गया। साज़िशें व्यापक थीं और उनके सूत्रधार संगठन थे-सिख्स फाॅर जस्टिस, पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन और उनके पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई। बाकायदा एक वेबसाइट तैयार की गई-'आस्क इंडिया व्हाई डाॅट काॅम।' यह वेबसाइट कनाडा में तैयार की गई और वहीं पंजीकृत है। हंगरी के बड़े उद्योगपति जाॅर्ज सोरोस ने इन साज़िशों के लिए 10 करोड़ डाॅलर का योगदान दिया है। उन पर भारत और इजरायल विरोधी अभियान चलाने के गंभीर आरोप हैं। सोशल मीडिया पर जमकर झूठ प्रचारित किया गया कि भारत सरकार बर्बरता कर रही है। लोगों को मार रही है। राजनीतिक विरोधियों को जेल में कैद किया जा रहा है। 26 जनवरी को पुलिस ने पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया। साज़िशों के पिटारे में यह भी स्पष्ट किया गया था कि आपको संसाधन मुहैया कराए जाएंगे। यूपीए के सांसदों और नेताओं से भी बात हो चुकी है। संसाधन का अर्थ है-पैसा। तो पैसा कौन जुटा रहा था और फंडिंग किस-किस ने की?

भारत के संदर्भ में यह साफ़ होना भी बेहद जरूरी है। बेशक 26 जनवरी को दिल्ली पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और आंसू गैस आदि के इस्तेमाल की बात कबूल की जा सकती है, लेकिन 400 से ज्यादा पुलिसवाले ही घायल हुए थे। कथित किसानों और दंगाइयों की बेलगाम अराजकता देश ने देखी है। 'टूलकिट' में साज़िशों के अंबार हैं। 'पोएटिक जस्टिस' के सह-संस्थापक एम.धालीवाल ने खालिस्तान के आंदोलन को जारी रखने का ऐलान किया है, बेशक सरकार विवादास्पद् कानूनों को वापस ले ले और एमएसपी को कानूनी दर्जा दे दे। सवाल यह है कि भारत का विरोध करने,उसे बदनाम करने और मोदी सरकार को अस्थिर करने या संसद में हंगामा बरपाने की साज़िशें क्यों रची गईं और किसान आंदोलन को उनसे क्या फायदा होगा? दिलचस्प है कि राकेश टिकैत सरीखे किसान नेताओं को विदेशी हस्तियों के दुष्प्रचार की जानकारी तक नहीं है। वह यह भी नहीं जानते अथवा असलियत छिपा रहे हैं कि किसानों के समर्थन में तमाम साज़िशें रची गईं! चूंकि इस षड्यंत्र में 'सिख्स फाॅर जस्टिस' और 'पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन' आदि संगठनों के नाम उभर कर सामने आए हैं और दोनों को खालिस्तान-समर्थक माना जाता है, तो क्या रिहाना, ग्रेटा,मिया और मीना हैरिस सरीखी अंतरराष्ट्रीय हस्तियां भी खालिस्तान की हमदर्द हैं और उनके एजेंडे का समर्थन करती हैं? क्या वे जानती हैं कि भारत के संदर्भ में खालिस्तान के मायने क्या हैं?

बहरहाल ये दोनों संगठन भारत में प्रतिबंधित हैं। गुरमीत सिंह पन्नू और परमजीत सिंह पम्मा जैसे खालिस्तानी खाड़कुओं पर हमारी एजेंसियों की लगातार निगाहें हैं। पाकिस्तान में गोपाल चावला खालिस्तान का अहं सरगना है। इन सभी खाड़कुओं के खिलाफ आतंकवाद के तहत केस भारत में दर्ज हैं। वैसे दिल्ली पुलिस ने आईपीसी की धाराओं-153, 153-ए, 120-बी और 124-ए आदि-के तहत 26 जनवरी से जुड़ी साज़िशों के गिरोह के खिलाफ भी केस दर्ज किए हैं। बेशक एफआईआर में किसी भी हस्ती का नाम नहीं है। सवाल है कि अंतरराष्ट्रीय लड़ाई के लिए क्या इतना ही पर्याप्त होगा? सवाल यह नहीं है कि ट्वीट की साजिशें भारत जैसे संप्रभु और ताकतवर देश को कमजोर कर सकती हैं या नहीं, देश में सामाजिक विभाजन के हालात पैदा हो सकते हैं अथवा नहीं, सवाल यह है कि इस दुष्प्रचार का मुंहतोड़ जवाब कैसे दिया जाए और उग्रवादियों के साज़िशाना चक्रव्यूह कैसे तोड़े जाएं? कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में राजनयिक पहल के बिना किसी को भी कटघरे तक लाना नामुमकिन है।

Next Story