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डा. ओमप्रभात अग्रवाल का लेख : शल्य चिकित्सा के फैसले पर हो विचार

यह ठीक है कि शल्य चिकित्सा सुश्रुत जैसे विद्वानों के कारण सदैव से आयुर्वेद (Ayurveda) का अंग रही है, परंतु यह भी सत्य है कि वर्तमान युग में यह विधा कहीं आगे बढ़ चुकी है। इसी कारण अब शल्य क्रिया अत्यंत विशेष प्रकार की ट्रेनिंग मांगती है और इसी कारण विश्व में प्रत्येक देश में सर्जन कहलाने का अधिकार पाने के लिए दीर्घकाल विद्यार्थी जीवन व्यतीत करना पड़ता है। केवल यही नहीं, सर्जरी की विशेष ट्रेनिंग के पूर्व बरसों की ट्रेनिंग शरीर की संरचना को समझने तथा सामान्य आधुनिक औषधीय चिकित्सा अच्छी तरह समझने की भी व्यवस्था की जाती है। सर्जरी का स्कोप आज इतना बढ़ चुका है कि किसी पुरानी विधा में पारंगत होकर उससे निपट पाना आसान नहीं रह गया। और अब तो उसके साथ एनेस्थीसिया का बिलकुल ही आधुनिक शास्त्र भी जुड़ चुका है। उसके बिना सर्जरी की कल्पना असंभव हो चुकी है।

डा. ओमप्रभात अग्रवाल का लेख :  शल्य चिकित्सा के फैसले पर हो विचार
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उच्चतर एवं तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र शोधकर्ताओं, कुशल चिकित्सकों, इंजीनियरों (engineers) एवं प्रबंधन विशेषज्ञों आदि को जन्म देते हैं। अंततः ये ही नागरिक देश की प्रगति का आधार बनते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि की आभा को द्विगुणित, त्रिगुणित करते हैं। इसीलिये इन क्षेत्रों का महत्त्व निर्विवाद समझा जाता है और उनकी व्यवस्था अत्यंत सोच समझ कर की जाती हैं। ऐसे ही क्षेत्रों से प्रशिक्षित छात्रों के कारण इस वर्ष भारत को प्रदर्शन के आधार पर किए गए विश्वविद्यालयों के अंतररराष्ट्रीय सर्वेक्षण में 15वां स्थान प्राप्त हो सका जबकि दस वर्ष पहले यह 23वां था। इस उन्नति और छवि-सुधार का श्रेय स्पष्ट रूप से उच्चतर एवं तकनीकी शिक्षण के प्रबंधकों को जाता है। परंतु अभी कुछ ऐसे निर्णय लिए गए हैं जो इस प्रगति को उलट सकते हैं।

कुछ दिन पूर्व समाचार प्राप्त हुआ कि कुरुक्षेत्र के आयुष विश्वविद्यालय ने उन आचार्यों को भी पीएचडी (PHD) गाइड बनाने का निर्णय लिया है जिन्हें पांच वर्ष का स्नातकोत्तर शिक्षण का तो अनुभव है परंतु जिनके पास स्वयं भी यह डिग्री नहीं है। दूसरे शब्दों में, जिन्हें शोध का अनुभव नहीं है। यह अवश्य ही अत्यंत विवादास्पद निर्णय है। शोध करवाने के लिए अत्यधिक अनुभव की आवश्यकता पड़ती है। यह अनुभव ही व्यक्ति को शोध की प्रक्रिया से गहन रूप से परिचित कराता है और उसमें एक विशिष्ट प्रकार की शोध-दृष्टि एवं कल्पना शक्ति उत्पन्न करता है जो उसे प्रकृति के किसी रहस्यमय पक्ष को उद्घाटित करने की सामर्थ्य प्रदान करते हैं। इनके अभाव में शोधकत्र्ता केवल सतही कार्य कर सकता है और शोध प्रबंध लेखन में नकल का आश्रय लेता है।

एक दो उदाहरण इस बिंदु को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक हैं। लेखक एक शोध प्रबंध जांच रहा था। उसने पाया कि विषय के पुराने शोध साहित्य का सर्वेक्षण अधूरा था और इसी कारण रिपोर्ट की जा रही शोध वह थी जो काफी पहले एक रूसी शोध जर्नल में प्रकाशित हो चुकी थी। साक्षात्कार में यह प्रश्न पूछे जाने पर शोध छात्र ने अज्ञानता प्रकट की। स्पष्ट था कि अनुभवहीनता के कारण निरीक्षक अपने छात्र को बता नहीं पाए थे कि साहित्य का युक्तियुक्त सर्वेक्षण कैसे किया जाता है। वस्तुतः वे स्वयं भी इस पुरानी शोध से पूर्ण अनभिज्ञ थे।

एक अन्य उदाहरण। लेखक ने एक छात्र के माध्यम से पारा धातु के एक यौगिक के अत्यंत तनु घोल की सांद्रता एक सर्वथा नई, अत्यधिक परिष्कृत विधि से ज्ञात करने में सफलता प्राप्त की और अत्यंत गर्व तथा आत्मविश्वास के साथ एक सेमिनार में उसे प्रस्तुत किया। परंतु तब जब वह अत्यधिक प्रशंसा की प्रतीक्षा कर रहा था, तभी भाभा परमाणु केन्द्र के एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक उठ खड़े हुए और बोले कि महोदय परिणाम तो उच्च कोटि के अवश्य हैं परंतु प्रयोग में सैद्धांतिक त्रुटि होने के कारण नवीन विधि स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने त्रुटि स्पष्ट भी की जो अत्यंत विचित्र थी। उनकी बात सुनते ही लेखक भौंचक रह गया और उसके समझ में न आया कि अब त्रुटि को किस प्रकार दूर किया जाय। अंततः वह स्वयं अपने गुरू जी के पास समस्या ले कर पहुंचा जिनके साथ उसने बरसों पहले पीएचडी की थी और जो एक अतिप्रतिष्ठित शोध निरीक्षक थे। वे हंसे और एक अत्यंत सामान्य सा हल उन्होंने बता दिया। उस नवीन प्रयोग को अंततः अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई।

एक अन्य निर्णय चिकित्सा शास्त्र शिक्षण से संबंधित है। सेन्ट्रल काउंसिल आॅफ इंडियन मेडिसिन के ताजे आदेश के अनुसार अब आयुर्वेद चिकित्सक भी सर्जरी कर सकेंगे। अब छात्र आयुर्वेद चिकित्सा का स्नातक कोर्स 5-5 वर्षों का करने के बाद, जिसकी अवधि में वे आधुनिक चिकित्सा शास्त्र का भी सतही अध्ययन करते हैं, तीन वर्षों का स्नातकोत्तर कोर्स करने की अवधि में शल्य चिकित्सा की पढ़ाई मुख्यतः प्राचीन भारतीय थोड़ी बहुत आधुनिक भी, कर सकते हैं और उन्हें दो प्रकार की डिग्री मिल सकेगी। शल्य तंत्र अथवा सामान्य सर्जरी तथा, शालक्य तंत्र अथवा आंख, कान, नाक, गला, सामान्य अस्थि पंजर तथा दंत मंडल की सर्जरी। कुल मिलाकर वे 58 प्रकार की सर्जरी के लिए अधिकृत होंगे। अभी तक यह अधिकार केवल आधुनिक चिकित्सकों को था, वह भी तीन वर्षों का सर्जरी का गहन कोर्स करने के बाद। अत्यधिक विशिष्ट प्रकार की शल्य चिकित्सा की ट्रेनिंग तो इस कोर्स के भी बाद ही हो पाती है। स्मरणीय है कि अमेरिका और इंग्लैंड के कुछ प्रकार के गैर चिकित्सकीय कार्यकर्ताओं को भी विशेष ट्रेनिंग के उपरांत इस प्रकार का अधिकार है। परंतु केवल नितांत सामान्य सा। स्पष्टतः उनकी तुलना भविष्य के इन आयुर्वेदिक सर्जनों से कदापि नहीं की जा सकेगी।

यह ठीक है कि शल्य चिकित्सा सुश्रुत जैसे विद्वानों के कारण सदैव से आयुर्वेद का अंग रही है, परंतु यह भी सत्य है कि वर्तमान युग में यह विधा कहीं आगे बढ़ चुकी है। इसी कारण अब शल्य क्रिया अत्यंत विशेष प्रकार की ट्रेनिंग मांगती है और इसी कारण विश्व में प्रत्येक देश में सर्जन कहलाने का अधिकार पाने के लिए दीर्घकाल का विद्यार्थी जीवन व्यतीत करना पड़ता है। केवल यही नहीं, सर्जरी की विशेष ट्रेनिंग के पूर्व बरसों की ट्रेनिंग शरीर की संरचना को समझने तथा सामान्य आधुनिक औषधीय चिकित्सा अच्छी तरह समझने की भी व्यवस्था की जाती है। सर्जरी का स्कोप आज इतना बढ़ चुका है कि किसी पुरानी विधा में पारंगत होकर उससे निपट पाना आसान नहीं रह गया। और अब तो उसके साथ एनेस्थीसिया का बिलकुल ही आधुनिक शास्त्र भी जुड़ चुका है। उसके बिना सर्जरी की कल्पना असंभव हो चुकी है।

इसीलिए आयुर्वेद विशेषज्ञ इसके लिए रोगी में विश्वास जगा पाएगा, इसमें संदेह है। यदि अज्ञानतावश रोगी ने अपने को ऐसे किसी व्यक्ति के हाथों में सौंप भी दिया तो भी उसकी सफल चिकित्सा की गारंटी नहीं होगी। मुख्य समस्या यह है कि जैसे आजकल की आयुर्वेद डिग्री प्राप्त स्नातक अधिकांश में रोगी के कष्ट निवारण के लिए आधुनिक चिकित्सा पद्धति का सहारा लेते हैं, उसी प्रकार सर्जरी भी इसी प्रकार करने से नहीं कतराएंगे। यही कारण है कि इंडियन मेडिकल काउंसिल ने इस निर्णय का पुरजोर विरोध किया है तथा दिसंबर में एक दिन की हड़ताल तक के लिए अपने सदस्यों का आह्वान किया। जागरूक समाज के मन में भी निराशा ही है जबकि सर्जरी, पूर्ण रूप से विश्वास का खेल है।

अच्छा होगा कि आयुर्वेद जैसी अत्यंत प्राचीन एंव सक्षम चिकित्सा पद्धति को केवल औषधीय चिकित्सा तक सीमित रखा जए ताकि उसकी छवि सदैव सदैव निष्कलंक और प्रभायुक्त बनी रहे। इस संबंध में वर्तमान में इस शास्त्र की ट्रेनिंग पाकर साथ में दिए जाने वाले सीमित से आधुनिक चिकित्सा शास्त्र के ज्ञान के आधार पर आधुनिक चिकित्सा की प्रैक्टिस करने के आकर्षण पर भी नियंत्रण आवश्यक है। ऐसा न किए जाने की दशा में जनता को असीमित हानि हो सकती है। कहना न होगा कि दोनों ही नई घोषणाएं अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की छवि धूमिल कर सकती हैं।

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