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चिंतन: संसद में हंगामा छोड़कर सार्थक चर्चा करे कांग्रेस

उत्तराखंड मसले पर सवाल उठाकर कांग्रेस पहले ही दे चुकी थी सदन में हंगामे का संकेत

चिंतन: संसद में हंगामा छोड़कर सार्थक चर्चा करे कांग्रेस

लगभग 39 दिन के अवकाश के बाद जब संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरूआत हुई, तो पहले ही दिन दोनों सदन हंगामे की भेंट चढ़ गए। सत्र शुरू होने से पहले लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में ही कांग्रेस ने उत्तराखंड मसले पर सवाल उठाकर सदन में हंगामे का संकेत दे दिया था। सरकार की हमेशा कोशिश रहती है कि सदन शांति से चले और विधायी कामकाज हो। सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद दोनों सदनों में कामकाज की उम्मीद जताई। पीएम ने कहा कि उन्हें आशा है कि सभी दल लोकतंत्र की भावना के अनुरूप चर्चा करेंगे और अच्छे फैसले करेंगे।

उन्होंने उम्मीद व्यक्त की कि संसद सदस्य पिछली बार की तरह खुलकर चर्चा करेंगे और महत्वपूर्ण निर्णय किए जाएंगे। लेकिन संसद के दोनों सदनों के शुरू होते ही प्रधानमंत्री की शांति से सत्र के चलने उम्मीद पर पानी फिरता दिखा। कांग्रेस जैसे सदन नहीं चलने देने का मन बना रखी हो। पार्टी ने उत्तराखंड पर लोकसभा और राज्यसभा में एक साथ सरकार पर हमला बोल दिया। लोकसभा में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के शून्यकाल में मामला उठाने को कहने के बावजूद प्रश्नकाल में ही हंगामा करना शुरू कर दिया। यहां तक कि वे सदन में ही धरने पर बैठ गए। राज्यसभा में कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा ने इतना हंगामा किया कि रास को दिन भर के लिए स्थगित ही करना पड़ा।
कांग्रेस को इतने वर्षों का सरकार चलाने का अनुभव है और यह जानते हुए कि प्रश्नकाल के मसले पहले ही तय होते हैं, उसमें सरकार को प्रश्नों को उत्तर देना होता है, तो भी प्रश्नकाल में कांग्रेसी सांसद का अपने उठाए मसले पर सरकार से जवाब की जिद करना और हंगामा खड़ा कर सदन के कामकाज को बाधित करना निहायत ही संसदीय गरिमा का भंजन है। जबकि देश जानता है कि उत्तराखंड का मसला कांग्रेस की ही अंदरूनी बगावत का परिणाम है। लेकिन कांग्रेस अपनी नाकामी के लिए भी केंद्र सरकार को दोषी ठहरा रही है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा भी कि यह कांग्रेस का ही मामला है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सरकार धारा 356 को लेकर चर्चा को तैयार है। फिर भी कांग्रेस ने संसद नहीं चलने दी। दरअसल वह इशरत जहां केस पर घिर रही है।
लोकसभा में भाजपा सांसद किरीट सोमैया ने शून्यकाल में जानना चाहा कि यूपीए सरकार के दौरान इशरतजहां को पहले आतंकवादी बताए जाने और बाद में 'शहीद' बताए जाने के क्या कारण थे और इस बारे में बनाई गई समिति ने क्या रिपोर्ट दी है। इशरत जहां का जब एनकाउंटर हुआ था उस समय देश के गृहमंत्री कांग्रेस नेता पी चिदंबरम थे। उन पर आरोप लगा कि गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी को फंसाने के लिए उन्होंने इशरत जहां केस के तथ्य बदलवाए। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने पहली रिपोर्ट में इशरत को आतंकी बताया था, जबकि चिदंबरम के कथित शह पर दूसरी रिपोर्ट में उसे आतंकी नहीं बताया।
अब कांग्रेस को जवाद देते नहीं बन रही है। पहले के दो सत्रों के हंगामे में धुल जाने के बाद बजट सत्र के पहले चरण में काफी कामकाज हुए थे। अब दूसरे चरण के लिए भी सरकार का व्यस्त एजेंडा है। लोकसभा में 13 और राज्यसभा में 11 विधेयक पारित होने के लिए रखे जाने हैं। इनमें जीएसटी बिल महत्वपूर्ण है। कांग्रेस को चाहिए कि वह हंगामा का रास्ता छोड़ कर सदन में उचित तरीके से अपना मुद्दा भी उठाए, और सरकार के साथ सार्थक बहस में हिस्से भी ले। सदन शांति चले, यही देशहित में है।
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