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मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से भाजपा ही नहीं कांग्रेस को भी सबक लेना चाहिए

पांच विधानसभाओं ने कई दिग्गजों का भाग्य संवार या बिगाड़ दिया है। हिन्दीभाषी मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ राजनीति और भूगोल में लगभग जुड़े हैं।

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से भाजपा ही नहीं कांग्रेस को भी सबक लेना चाहिए

पांच विधानसभाओं ने कई दिग्गजों का भाग्य संवार या बिगाड़ दिया है। हिन्दीभाषी मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ राजनीति और भूगोल में लगभग जुड़े हैं। तेलंगाना और मिजोरम की अलग पहचान और राजनीतिक स्थिति है। मध्यप्रदेश की 230 सीटों में कांग्रेस ने बमुश्किल 114 और भाजपा ने 109 सीटें हासिल कीं। बसपा, सपा और निर्दलियों का आंकड़ा मिलाकर 121 हुआ। 199 सीटों के चुनाव में कांग्रेस राजस्थान में बार बार 99 के फेर से 100 तक पहुंची। उसे बागी विजेताओं और अन्य का सहारा लेना है। केवल छत्तीसगढ़ है जहां 90 सीटों में कांग्रेस ने भाजपाध्यक्ष अमित शाह के 65 सीटों के पार वाले नारे को ही हड़पकर 68 सीटें जीत लीं। तथाकथित तीसरी ताकत बनते अजित जोगी मायावती के संयुक्त पराक्रम को जनता ने भोथरा कर दिया।

कांग्रेसी जीत कई महत्वपूर्ण और दूरगामी परिणामों से भरी हुई है। सतह के नीचे की स्थितियों पर सपाटबयानी के तर्को की इस्तरी नहीं चलाई जाती। भारतीय लोकतंत्र का अभिशाप है कि राजे रजवाड़ों की धमक की अनुगूंज बहरे साक्षरों तक को सुनाई पड़ती है। राजस्थान में कई जगह और मध्यप्रदेश में सिंधिया और होल्कर रजवाड़ों के इलाकों में लोकतंत्र का बिरवा मरा नहीं है लेकिन गमलों में बोनसाई बना हुआ है।

राजशाही के साथ काॅरपोरेटी जुगलबंदी होने पर संविधान के मकसद समाजवाद का मखौल उड़ता है। मंदसौर के किसानों की हत्याओं, आत्महत्याओं और दुर्घटनाओं की शिकायतों के जख्मों पर राहुल गांधी कांग्रेसी घोषणाओं का मलहम लाए। जख्म सूखने के पहले विधानसभा चुनाव आ गए। किसानों ने जख्म सहलाते उन्हें वोट दिया मानो तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना।

ग्वालियर के रियासती इलाके में हुजूर, महाराज और साहब शब्द जनता की जुबान पर चस्पा हैं। राजस्थान और मध्यप्रदेश में प्रथाओं के तहखाने की रियासतों में तीज त्यौहार में जनता द्वारा नज़राना देने का दस्तूर पूरा मरा नहीं है। राजशाही और पूंजीवाद की गलबहियों ने लोकतंत्र के स्वाभाविक विकास को रोकने सैकड़ों कुचक्र भारतीय इतिहास में किए हैं। छत्तीसगढ़ अपवाद है।

यहां कथित छोटी छत्तीस जमींदारियां रहने पर भी कांग्रेसी जड़ें आजादी के आंदोलन के गर्भगृह से पुख्ता होती रही हैं। कई संलिष्ट कारणों से कांग्रेस की लगातार पराजय छत्तीसगढ़ में होती भी रही है।

शहरी पूंजीवाद, सांप्रदायिकता, गैरछत्तीसगढ़ियों का वर्चस्व और नौकरशाही के घालमेल के कारण बेहद मासूम, समर्पित और दब्बू किस्म के आदिवासियों और दलितों के बहुल प्रदेश में राजनीतिक मुहावरा गढ़ने में लोकतंत्र को प्रतीक्षा की असुविधाओं में जीना पड़ा।

प्रदेश को भूगोल और इतिहास ने परस्पर सहारा दिया। गरीबी, मुफलिसी और अधिकारविहीनता के छत्तीसगढ़ी किसानों के सामने करो या मरो का माहौल बनने लगा।

मध्यप्रदेश और राजस्थान में कमलनाथ, दिग्विजयसिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट, अशोक गहलोत जैसे राष्ट्रीय पहचान के नेता हैं। यह झंझट छत्तीसगढ़ में नहीं होने से शुभ संकेत हुआ।

राज्यस्तरीय नेताओं भूपेश बघेल, चरणदास महंत, टी. एस. सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू आदि की अगुवाई में कार्यकर्ताओं ने खुलकर पसीना बहाया। आधी से ज्यादा जनसंख्या में किसान आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग गरीबी के सूचनांक पर उछाले जाते रहे हैं।

इस बार अभिमन्यु शैली में लोकतंत्र के रथ का पहिया पकड़ लिया। घोषणापत्र अमूमन बंद लिफाफे का मजमून होते हैं। दीपावली, ईद या क्रिस्मस के बधाई कार्डों को जैसे खोलकर लोग पढ़ते भी नहीं। कांग्रेस ने जनघोषणापत्रों का नायाब फार्मूला ढूंढ़ा।

पता नहीं जनता ने क्या सुझाया लेकिन किसानों की कर्जमाफी और समर्थन मूल्य देने का ऐलान तथा नवयुवकों की बेरोजगोरी दूर करने जैसे आश्वासन कागज पर लिखे काले अक्षरों से उछलकर लोगों के दिलोदिमाग की इबारत बना दिए गए।

यह पहला अनोखा प्रयोग जीत का ट्रंपकार्ड बना। पता नहीं भाजपा ने कथित तौर पर मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह के ऐसे सुझावों पर दिल्ली या अहमदाबाद से हरी झंडी क्यों नहीं दी। किसानों के संवैधानिक अधिकारों को दिए बिना ही सब कुछ हरा हरा दीखता रहा होगा।

तो सावन के अंधे का हरा हरा हो गया। राजनीति में बड़बोलापन, अशिष्टता, हिंसक भाषा और आततायी तेवरों को लोकतंत्र ने विचार परिसर के बाहर रखा है। तैश में आने से राजनीतिक आत्महत्याओं का इतिहास खुद ब खुद वाचाल हो उठता है।

कोई माने, न माने, भाषा की शाइस्तगी, लचीलापन और आक्रमक मुद्राओं के बावजूद जुबान पर लगाम जैसे यत्न राहुल गांधी के खाते में जाते हैं। पिता राजीव गांधी के सभी पार्टियों से सहकार करने की नैसर्गिक आदतों का उत्तराधिकार भी है।

राजीव चाहते तो दलबदल कानून बहुमत से पारित करते। तीन चौथाई बहुमत के बावजूद सबका साथ सबका विचार बनाना लोकतंत्र के लिए उन्हें मुफीद लगा। सभ्य शिष्ट भाषा नेहरूनुमा, अहिंसा गांधीनुमा, लोकतांत्रिक साझा वाजपेयीनुमा राजनीति के पायदान हैं।

वे ही सफलता की मंजिल तक जाते हैं। वर्णवाद, जातिवाद, उपजातिवाद, स्थानीय बोलीवाद, मजहबपरस्ती, भाषायी विसंगतियां कुछ नहीं कर पाईं। सामान्य मतदाताओं और उसके बड़े धड़े किसान ने अंदर ही अंदर तय कर लिया।

हो रहे अन्याय का मुकाबला जम्हूरियत के नायाब तरीकों से करना होगा। अंदरूनी कौंध थी जिसने अंगरेजी के मुहावरे कि चेहरा ही मनुष्य के मनोभावों का दर्पण होता है को झुठला दिया।

कई बार सत्तामहल में आंखों का चुंधियाना और बहरेपन की बीमारियां घर कर लेती हैं। साथ ही कुछ ज्यादा बोलने की भी। इसीलिए गांधी के तीन बंदरों ने कहा था, बुरा मत बोलो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो।

राम मंदिर, कश्मीर, पाकिस्तान, रोहिंग्या मुसलमान, रथयात्रा, सबरीमला जैसे मुद्दों को आत्महत्या करते किसानों की बार बार की जा रही बड़ी रैलियों ने इतिहास का समीकरण नहीं बनने दिया।

अतीत और भविष्य अपनी दाढ़ीजार ऐंठ में रहे। ताज़ातरीन वर्तमान उन पर भारी पड़ता रहा। भारतीय किसान और मतदाता का यह महत्वपूर्ण जागरणकाल है। वह जुमला था कि भारत कृषि प्रधान देश है।

सिंचाई मैनुअल ने खेती की प्राथमिकता को बदलकर पहले नंबर से धकियाकर उद्योग को रख दिया। देश खतरे में था तब शास्त्री जी ने कहा था जय जवान जय किसान। काॅमरेड लेनिन के पास भारतीय कम्युनिस्टों ने जाकर गांधी की शिकायत की।

कालजयी लेनिन ने पलटकर पूछा किसान किसके साथ हैं। जवाब मिला गांधी के। लेनिन ने फटकार लगाई। जाओ किसानों के साथ जुड़ो। हो सके गांधी को आंदोलन से बेदखल करो, लेकिन किसानों को नहीं छोड़ो।

सच है भारत को किसान क्रांति का देश बनना है। जरूरत है एक किसान कोड या किसान इकाॅनामी बनाने की। बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी, स्टार्ट अप, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, काॅरपोरेटीकरण जैसी यूरो अमेरिकी अवधारणाओं का कचूमर निकालने का वक्त भी इतिहास मतदाताओें के विवेक की दहलीज पर रख रहा है।

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