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कांग्रेस का महाधिवेशन हुआ बेपटरी, भाजपा पर हमले करने तक रही सीमित

कांग्रेस महाधिवेशन में कांग्रेस ने सिर्फ भाजपा पर जुबानी हमला किया जबकि किसी भी पार्टी के महाधिवेशन का मकसद अपनी उपलब्धियों पर चर्चा, अपनी कमियों पर मंथन और अपने भविष्य के लिए विजन का निर्धारण करना होता है।

कांग्रेस का महाधिवेशन हुआ बेपटरी, भाजपा पर हमले करने तक रही सीमित
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किसी भी पार्टी के महाधिवेशन का मकसद अपनी उपलब्धियों पर चर्चा, अपनी कमियों पर मंथन और अपने भविष्य के लिए विजन का निर्धारण करना होता है। उस समय यह मंथन और महत्वपूर्ण होता है, जब पार्टी खत्म होने की कगार पर हो। लेकिन, कांग्रेस का 84वां महाधिवेशन ऐसा कुछ करता नहीं दिखा। चाहे उदघाटन भाषण हो या पार्टी अध्यक्ष का समापन भाषण, दोनों में कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी सत्तासीन भाजपा नीत राजग सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला ही करते दिखे।

वे कहीं से भी कांग्रेस की हालत पर चिंतन करते नहीं दिखे, जबकि उन्हें देश भर से आए कांग्रेस कार्यकर्ताओं के समक्ष ईमानदारी से बताना चाहिए कि कांग्रेस चुनाव दर चुनाव क्यों हार रही है? उन्हें पार्टी के लोगों को बताना चाहिए था कि आने वाले वक्त के लिए कांग्रेस का नया विजन क्या है? इस महाधिवेशन में इस बात पर चर्चा होनी चाहिए थी कि कांग्रेस को फिर से खड़ा कैसा किया जा सकता है? मरणासन्न पार्टी में जान फूंकने के लिए कांग्रेस नया क्या करने वाली है? आवाम का भरोसा जीतने के लिए पार्टी के पास क्या रणनीति है?

2004 से 2014 तक कांग्रेस के दस साल के शासन में जिस तरह देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा, अर्थव्यवस्था सुस्ती से ग्रस्त रही, प्रशासनिक अव्यवस्था रही, उसके चलते कांग्रेस को जनता ने पूरी तरह नकार दिया। राहुल के नेतृत्व (उपाध्यक्ष व अध्यक्ष) में कांग्रेस को पिछले 28 चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। 2014 के लोकसभा में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई थी। उसे विपक्ष का दर्जा तक नहीं मिला। 2014 के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के हाथों से एक-एक कर राज्य भी निकलते गए।

आज कांग्रेस देश के 29 में से तीन राज्यों तक सिमट गई है, जबकि भाजपा व राजग की सरकार 2014 से पहले सात राज्यों में भी और चार साल बाद 2018 में 21 राज्यों में है। कर्नाटक में भी कांग्रेस की वापसी की राह मुश्किल ही लग रही है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर युवाओं को रोजगार, किसानों की समस्या, कश्मीर समस्या, जीडीपी, विमुद्रीकरण, जीएसटी, स्किल इंडिया, स्वच्छ भारत आदि को लेकर कई सवाल उठाए। लेकिन देश में ये समस्याएं किसकी देन है। कांग्रेस को 50 से अधिक वर्ष तक शासन करने का अवसर मिला, वह देश में सुधार क्यों नहीं ला पाई?

रोजगार के अवसर क्यों नहीं पैदा कर सकी, किसानों की समस्या हल क्यों नहीं हुई? कश्मीर समस्या क्यों बनी रही? कांग्रेस की नीतियां अच्छी तो वह सिमट क्यों रही है? और भाजपा नीत राजग सरकार की नीतियां खराब हैं ही तो भाजपा चुनाव दर चुनाव क्यों जीत रही है। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा कि मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था को बर्बाद किया तो उनके शासनकाल में जीडीपी दर पांच फीसदी पर क्यों आ गई थी? पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि कांग्रेस ने 14 करोड़ लोगों को गरीबी से निकाला, फिर कांग्रेस को हार क्यों मिली?

कांग्रेस शासन में रोजाना गांवों में 28 रुपये व शहरों में 32 रुपये की आय सीमा गरीबी निर्धारण के लिए तय की गई थी, जिसका दुनियाभर में मजाक उड़ा था। विमुद्रीकरण व जीएसटी की विश्व में तारीफ हुई है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद विश्व में भारत की छवि मजबूत राष्ट्र की बनी है, अर्थव्यवस्था में सुधार आया है, सुधारों की गति तेज हुई है। कश्मीर से बाहर एक भी आतंकी हमला नहीं हुआ, सरकार पर एक भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। लगता है कांग्रेस केवल आलोचना के लिए आलोचना करती है।

कांग्रेस खुद आठ साल बाद महाधिवेशन कर रही है, इससे पता लगता है कि देश के प्रति वह कितना गंभीर है। 2010 में उसका पिछला महाधिवेशन हुआ था। राहुल गांधी के संबोधन को सुनकर ऐसा लगा कि वे किसी चुनावी सभा में भाषण दे रहे हों और भाजपा पर हमला कर रहे हों। कांग्रेस का यह महाधिवेशन भाजपा व संघ पर हमले तक सीमित रहा,

जबकि जिस तरह कांग्रेस देश की सत्ता से हाशिये पर पहुंच चुकी है, उसमें नेतृत्व से एक ऐसे संबोधन की जरूरत थी, जिससे कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ता। महाधिवेशन में कांग्रेस को नए रूप में प्रस्तुत करना जरूरी था, मगर राहुल ऐसा नहीं कर सके।

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