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कश्मीर पर कांग्रेस की अनीति

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और सैफुद्दीन सोज़ ने ऐसे विकट अल्फ़ाज़ फरमा दिए कि सारे मुल्क में राजनीतिक तूफान बरपा हो गया। बेहद गैर जिम्मेदाराना और तथ्यहीन तौर पर गुलाम नबी आजाद ने कहा कि कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा एक आतंकवादी की तुलना में 20 नागरिकों का कत्ल किया जा रहा है।

कश्मीर पर कांग्रेस की अनीति

उधर रशिया में फुटबॉल विश्व कप के लिए जोरदार मुकाबले चल रहे हैं और इधर भारत विहंगम राजनीतिक पटल पर चल रहे कड़े राजनीतिक मुकाबले में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता अपने ही गोलपोस्ट पर खुद ही गोल दागने में जुट गए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और सैफुद्दीन सोज़ ने ऐसे विकट अल्फ़ाज़ फरमा दिए कि सारे मुल्क में राजनीतिक तूफान बरपा हो गया। बेहद गैर जिम्मेदाराना और तथ्यहीन तौर पर गुलाम नबी आजाद ने कहा कि कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा एक आतंकवादी की तुलना में 20 नागरिकों का कत्ल किया जा रहा है।

गुलाम नबी आजाद ने आगे फरमाया कि हाल ही में कश्मीर के पुलवामा इलाके में भारतीय सेना द्वारा केवल एक आतंकवादी मार गिराया गया, जबकि 13 नागरिकों को भारतीय सेना ने मार गिराया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके गुलाम नबी आज़ाद राज्यसभा में विपक्ष के लीडर भी हैं। कांग्रेस में आजाद का कद काफी बड़ा समझा जाता है, क्योंकि गुलाम नबी आज़ाद कांग्रेस लीडर सोनिया गांधी और अध्यक्ष राहुल गांधी के अत्यंत निकट हैं।

यूपीए सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके सैफुद्दीन सोज़ ने ‘कश्मीर- गिल्म्स ऑफ हिस्टरी एंड दि स्टोरी ऑफ स्ट्रगल' शीर्षक से एक किताब लिखी है। सैफुद्दीन सोज़ अपनी किताब में परवेज मुशर्रफ़ के हवाले से लिखा कि कश्मीर के आवाम को यदि स्वतंत्र तौर पर चुनाव करने का मौका दिया जाए तो फिर वो अपनी राजनीतिक आज़ादी को प्राथमिकता देंगे। साथ ही जनरल मुशर्रफ यह भी कहते हैं कि कश्मीरियों के लिए आजादी हासिल करना नामुमकिन है।

सैफुद्दीन सोज अपनी नई किताब में लिखते हैं कि कश्मीर के आवाम के लिए विषय में मुशर्रफ का कथन आज भी एकदम सही सिद्ध हो रहा है कि कश्मीरी आवाम आजादी चाहते हैं। कांग्रेस के दो नेताओं द्वारा दिए कथन दरअसल कांग्रेस पार्टी के लिए गले की फांस बन गए हैं, क्योंकि अभी तक अपने दोनों नेताओं के बयानों से कांग्रेस पार्टी द्वारा स्वयं को बाकायदा अलग नहीं किया गया है।

अतः यही समझा जा रहा है कि गुलाम नबी आजाद के और सैफुद्दीन सोज़ के बयान से कांग्रेस पार्टी आधिकारिक तौर पर सहमत है और इन दोनों ही बयानों का समर्थन कर रही है। ये दोनों ही बयान इनके द्वारा पहले दिए गए उन दो बयानों की तरह ही हैं, जो अतीत में कांग्रेस के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए। पहला बयान जिसमें कि सोनिया गांधी द्वारा गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर निरुपित किया गया और दूसरा बयान राहुल गांधी द्वारा उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी को खून की दलाली करने वाला करार दिया गया।

इतिहास गवाह है कि कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं के बयान से कांग्रेस का इन चुनावों में भट्ठा बैठ गया था और नरेंद्र मोदी नायक बनकर उभरे थे। कोई विस्मयकारी तथ्य नहीं कि गुलाम नबी आजाद के भारतीय सेना को बेहद बदनाम करने वाले बयान का लश्कर-ए-तैय्यबा के सरगना आतंकवादी के हवाले से लश्कर के प्रवक्ता अब्दुल्ला गज़नवी द्वारा जोरदार समर्थन किया गया है। भारत के विरुद्ध दिए गए प्रत्येक बयान की भारत के दुश्मन धर्मान्ध ज़ेहादी दिल ओ जान से हिमायत करते हैं।

यकायक यकीन नहीं होता कि कांग्रेस के कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद आखिर क्यों एकाएक ज़ेहादी आतंकवादियों के अल्फाज बोलने लगे। कश्मीर और भारत की हिफाजत की खातिर तो भारतीय सेना के जवानों और अफसरों द्वारा सबसे अधिक सर्वोच्च बलिदान दिए गए हैं। भारतीय सेना ने सदैव ही एक पेशेवर सेना की तरह से आचरण और व्यवहार किया है। राजनीति से भारतीय सेना को कदापि कोई सरोकार नहीं रहा है।

सेना का कोई अफसर अथवा जवान अपनी सैन्य मर्यादा का कभी कोई उल्लंघन करता है तो फिर सैन्य कोर्ट मार्शल द्वारा उसे बाकायदा कड़ी सजा प्रदान की जाती है। वस्तुतः समस्त भारत के लिए संपूर्ण कश्मीर भावनात्मक तौर पर उसके अस्तित्व और उसकी अस्मिता का प्रबल प्रश्न बना रहा है। 22 अक्तूबर को जब कबायली हमले की आड़ में पाक फौज द्वारा कश्मीर घाटी पर बड़ा हमला किया गया और 26 अक्तूबर 1947 को जब जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने भारत के साथ संपूर्ण जम्मू-कश्मीर के संविलियन करार पर दस्तखत कर दिए थे, तभी उसी वक्त से वैधानिक तौर पर संपूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया था।

27 अक्तूबर 1947 को कश्मीर की सरजमीन पर भारतीय फौज ने पाक फौज को बुरी तरह पराजित किया और अपनी शानदार फतह का परचम लहराती हुए उरी तक जा पहुंच थी। अपनी फतह के झंडे गाड़ती भारतीय फौज के लिए मुजफ्फराबाद महज कुछ मीलों की दूरी पर रह गया था, कि दुर्भाग्य से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू भारत-पाक जंग से उत्पन्न कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र में ले गए। अविवेकपूर्ण जल्दबाजी में कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर पं. जवाहरलाल नेहरू भारत के वर्तमान इतिहास में कलंकित हो गए। कश्मीर की खातिर पाक और भारत चार बड़ी जंग लड़ चुके हैं।

कश्मीर घाटी में 1989 से निरंतर पाक प्रायोजित प्रॉक्सीवार जारी रही है, जो अभी तक एक लाख से अधिक इंसानी कुर्बानियां ले चुकी है। जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस शासनकाल के दौर में एक के बाद एक भयंकर गलतियां की गई। वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फारुख अब्दुल्ला की निर्वाचित सरकार को केवल इसलिए बर्खास्त कर दिया, क्योंकि अब्दुल्ला ने विपक्षी दलों एक सम्मेलन में शिरकत की थी। इंदिरा गांधी द्वारा शेख अब्दुल्ला के दामाद गुलाम मोहम्मद शाह को जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया।

वर्ष 1987 में कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए फारुख अब्दुल्ला और राजीव गांधी के मध्य समझौता हुआ और यह सर्वविदित तथ्य है कि फिर चुनाव में जबरदस्त धांधली अंजाम देकर मो. यूसुफ शाह के नेतृत्व वाली मुस्लिम कॉन्फ्रेंस को शिकस्त दी गई। इसी ऐतिहासिक गलती से आगाज हुआ था, वर्तमान में जारी ज़ेहादी विद्रोह का, जिसका पाकिस्तान द्वारा भरपूर फायदा उठाया गया। ऐतिहासिक नज़रिए से देखें को कश्मीर विवाद कांग्रेस नेताओं द्वारा की गई भयंकर भूलों का परिणाम है।

क्या कांग्रेस के वर्तमान नेता इन ऐतिहासिक भूलों से कोई सबक हासिल नहीं करेंगे और क्या गलतियों से गंभीर सबक हासिल किए बिना ही अपना राजनीतिक भविष्य निर्मित कर सकेंगे। लोकसभा की 44 सीटों पर सिमट चुकी कांग्रेस अपने अध्यक्ष राहुल गांधी की कयादत में अपने रहे सहे वजूद को भी गवां देने पर क्यों आमादा हो गई है। जंग-ए-आजादी का नेतृत्व करने वाली महान्ा ऐतिहासिक पार्टी कांग्रेस का यह कैसा दुर्भाग्यपूर्ण अधोपतन है कि उसके बड़े नेता राजनीतिक मौकापरस्ती के तहत राष्ट्र की एकता और अखंडता की सबसे जबरदस्त प्रहरी भारतीय सेना को भी बेवजह बदनाम करने पर तुल गए हैं।

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