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सिद्धू के इस्तीफे से कांग्रेस को झटका

उस वक्त माना गया कि 32 फीसदी दलित आबादी वाले पंजाब में पहली बार किसी दलित को सीएम बनाकर कांग्रेस ने मास्टर स्ट्रोक खेला है, शायद कैप्टन अमरिंदर की नाराजगी की भरपाई दलित-सिख कंबिनेशन से हो सकती है। पर अब सिद्धू पर इतना विश्वास करने के कांग्रेस के फैसले को राहुल गांधी के राजनीतिक अपरिपक्वता के तौर पर देखा जाएगा।

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नवजोत सिंह सिद्धू

Haribhoomi Editorial : नवजोत सिंह सिद्धू की अस्थिर राजनीति कांग्रेस के लिए मुसीबत बनती दिख रही है। चुनावी राजनीति के सबसे कठिन दौर से गुजर रही कांग्रेस के लिए ऐसे नेता ताकत बनने की बजाय पार्टी को कमजोर ही करेंगे। खुद मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे अति महत्वाकांक्षी सिद्धू के लिए कैप्टन अमरिंदर के राह से हटने के बाद भी सबकुछ ठीक नहीं हो सका था।

चरणजीत सिंह चन्नी के सीएम बनने के बाद सिद्धू को अपने आगे की सियासी राह कांटों भरा दिख रहा था। पंजाब में कांग्रेस के लिए सबकुछ ठीक था, कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ठीक चल रही थी, पंजाब में विभाजित विपक्ष और किसान आंदोलन के प्रभाव के चलते 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए राह आसान दिख रही थी। लेकिन चुनाव से करीब पांच महीने पहले पंजाब कांग्रेस की अचानक हवा बदली, कैप्टन के न चाहते हुए भी पंजाब कांग्रेस की कमान कांग्रेस में चार साल पहले पार्टी में आए नवजोत सिंह सिद्धू की दी गई। कैप्टन अमरिंदर ने इसे अपना अपमान मानते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस ने अपनी पार्टी के दलित चेहरे चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का नया सीएम बनाया।

उस वक्त माना गया कि 32 फीसदी दलित आबादी वाले पंजाब में पहली बार किसी दलित को सीएम बनाकर कांग्रेस ने मास्टर स्ट्रोक खेला है, शायद कैप्टन अमरिंदर की नाराजगी की भरपाई दलित-सिख कंबिनेशन से हो सकती है। पर अब सिद्धू पर इतना विश्वास करने के कांग्रेस के फैसले को राहुल गांधी के राजनीतिक अपरिपक्वता के तौर पर देखा जाएगा। सिद्धू के इस्तीफे से कांग्रेस को झटका ही लगा है। कैप्टन अमरिंदर ने अपने अगले कदम के बारे में समय पर पत्ता खोलने की बात कही थी, पर उनके कदम से पहले ही नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा ठीक उसी दिन आया, जब युवा राजनीति के दो चेहरे कन्हैया कुमार व जिग्नेश मेवाणी ने कांग्रेस ज्वाइन की। मौजूदा समय में विपक्ष के रूप में कांग्रेस को जिस वैचारिक धार की जरूरत है, उसे कन्हैया व जिग्नेश जैसे नेता आसानी से पूरा कर सकते हैं, लेकिन सिद्धू जैसे अस्थिर मन के अति महत्वाकांक्षी नेता पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर देते हैं।

कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए कि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर पर सिद्धू को तरजीह देना क्या विधानसभा चुनाव से पहले ही आत्मघाती कदम साबित हुआ? सिद्धू रणछोड़ साबित हुए, केवल 72 दिन ही पद पर रहे। कांग्रेस नेतृत्व ने जिस तरह सिद्धू को पंजाब में पार्टी की कमान देकर पर भी दलित को सीएम बनाकर उन पर नकेल रखी, उससे शायद उन्हें आभास हो गया कि अगले विधानसभा चुनाव में अगर कांग्रेस की वापसी नहीं होती है तो सारा ठीकरा उन्हीं पर फूटेगा, राजनीतिक किरकिरी अलग से होगी। अमरिंदर की नाराजगी के बाद पंजाब में सिद्धू के लिए अपने दम पर कांग्रेस की वापसी कराना 'असंभव' कार्य जैसा है। सिद्धू ने बेशक आलाकमान पर दबाव के लिए इस्तीफा दिया हो, पर उनकी राजनीति के लिए उनका यह फैसला नकारात्मक ही साबित होगा। आगे किसी भी शीर्ष नेतृत्व के लिए उनपर भरोसा करना मुश्किल होगा। सिद्धू को समझना होगा कि केवल तात्कालिक फायदे के लिए राजनीति नहीं की जाती है, भविष्य की बुनियाद रखना भी एक राजनीतिक कौशल ही है। इसके लिए धैर्य बहुत जरूरी है। कांग्रेस नेतृत्व को सिद्धू से सबक लेते हुए आगे किसी नेता के दबाव में आकर फैसला नहीं करना चाहिए। कांग्रेस नेतृत्व को दूरदर्शी और लौह फैसला लेने की कला सीखनी होगी। अभी कांग्रेस के सामने राजस्थान, छत्तीसगढ़ के असंतोष भी हैं, एमपी व कर्नाटक वह पहले ही गंवा चुकी है। पंजाब कांग्रेस के लिए प्रयोगशाला साबित हो रहा है।

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