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चेतनादित्य आलोक का लेख : 'आपातकाल' से गुजरती कांग्रेस

वर्तमान में कांग्रेस का देश में जो हाल है उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस खुद आपातकाल के दौर से गुजर रही है। का्ंग्रेस ज्वाइन करने के बाद कन्हैया कुमार ने भी कहा कि कांग्रेस खतरे में है... अगर पार्टी नहीं बची तो...’ जैसे बयानों के माध्यम से पार्टी की डूबती नाव को बचाने का अभिमान रखने वाले बड़बोले कन्हैया कांग्रेस जैसी बड़ी किन्तु बिखरी हुई पार्टी में आकर बड़ी जिमम्ेदारियों को संभालने या कहें कि झपटने की इच्छा रखते हैं। बहरहाल, ऐसा मानना आधारहीन नहीं होगा कि नवजोत सिंह सिद्धू की भांति बड़बोलेपन के कारण ही शायद कन्हैया कांग्रेस आलाकमान की पसंद बने।

चेतनादित्य आलोक का लेख : आपातकाल से गुजरती कांग्रेस
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चेतनादित्य आलोक

कभी देश में आपातकाल थोपने वाली कांग्रेस आज स्वयं ही आपातकाल के दौर से गुजर रही है। हाल ही में वामपंथी से कांग्रेसी बने कन्हैया कुमार भी मानते हैं कि कांग्रेस पार्टी की नाव डूबने वाली है। 28 सितंबर को पार्टी में शामिल होने के बाद प्रेसवार्ता में 'कांग्रेस खतरे में है... अगर पार्टी नहीं बची तो...' जैसे बयानों के माध्यम से पार्टी की डूबती नाव को बचाने का अभिमान रखने वाले बड़बोले कन्हैया कांग्रेस जैसी बड़ी किन्तु बिखरी हुई पार्टी में आकर बड़ी जिमम्ेदारियों को संभालने या कहें कि झपटने की इच्छा रखते हैं। बहरहाल, ऐसा मानना आधारहीन नहीं होगा कि नवजोत सिंह सिद्धू की भांति बड़बोलेपन के कारण ही शायद कन्हैया कांग्रेस आलाकमान की पसंद बने। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि बड़बोलापन अब कांग्रेस में तेज-तर्रार होने की गारंटी है, लेकिन यदि यह सत्य है तो 'जी 23' जैसे पुराने नेताओं पर यह बात क्यों लागू नहीं होती? राजद नेता शिवानंद तिवारी ने तो कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा है कि कांग्रेस आलाकमान को कन्हैया को ही पार्टी की कमान सौंप देनी चाहिए।

वैसे किसी ने अब तक यह पूछने का कष्ट नहीं उठाया कि कन्हैया कांग्रेस को कैसे बचाएंगे, क्योंकि स्वयं कन्हैया कितने योग्य और क्षमतावान हैं, यह भी किसी से छिपा नहीं है। देश की राजनीति में कन्हैया की अब तक की सबसे बड़ी पहचान अथवा उपलब्धि यह रही है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वे गिरिराज सिंह से 04 लाख 20 हजार मतों से पराजित हुए थे। साथ ही बेगुसराय सीट पर राजद के प्रत्याशी को हराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसके परिणामस्वरूप फिलहाल बिहार में विधानसभा के कुशेश्वरस्थान एवं तारापुर सीटों पर हो रहे उपचुनाव में कांग्रेस तथा राजद एक दूसरे के विरुद्ध प्रत्याशी उतारने के लिए मजबूर हो रहे हैं। वस्तुतः राजद नेता तेजस्वी प्रताप यादव 2019 के लोकसभा चुनाव से ही कन्हैया को लेकर असहज रहते आए हैं। अब जबकि कन्हैया कांग्रेस नेतृत्व की पसंद बन चुके हैं तो राजद और कांग्रेस में खटपट शुरू हो गई। बहरहाल, कांग्रेस का संकट यह है कि पिछले साढ़े सात वर्षों में उसके लगभग 100 नेता पार्टी छोड़कर भाजपा या किसी दूसरी पार्टी का दामन थाम चुके हैं। इसी प्रकार लगभग 150 विधायक एवं सांसद भी पार्टी को छोड़कर जा चुके हैं। कांग्रेस का आपातकाल यहीं नहीं थमा, बल्कि पार्टी में बचे हुए नेता-कार्यकर्ता, सांसद, विधायक इत्यादि अब भी या तो पूर्व की भांति निष्िक्रय ही रहने पर मजबूर हैं अथवा बोलने के कारण दरकिनार किए जा रहे हैं। इसके बावजूद कई बड़े और प्रभावशाली नेता अब 'जी-हजूरी' को अलविदा कहते हुए खुली हवा में सांस लेना आरंभ कर चुके हैं। काश! ये कांग्रेसी थोड़ा पहले चेत जाते तो पार्टी को संजीवनी मिल जाती। वैसे अब राजनीतिक दलों में कलह-कोहराम, दांव-पेंच, उठा-पटक, खींच-तान और टूट-फूट सामान्य बात मानी जाती है, परन्तु आलाकमान की इच्छा को कानून मानने की परंपरा वाली कांग्रेस में पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार टूट-फूट एवं खींचतान जारी है, और जिसे उसके वफादार सिपाही आंतरिक लोकतंत्र की संज्ञा देते नहीं थक रहे, उसे देख यदि कहा जाए कि कांग्रेस आईसीयू में चली गई है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालांकि अब पुराने कांग्रेसियों को भी यह समझ में आने लगा है कि पार्टी के भीतर मचा कोहराम सामान्य घटना नहीं, बल्कि पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व के अशक्त होने का प्रतीक है।

यह तो स्पष्ट ही है कि आजकल किसी भी राजनीतिक सत्ता-संगठन की मजबूती इसी बात पर निर्भर करती है कि उसका सुप्रीम नेता अथवा आलाकमान अपने कार्यकर्ताओं-नेताओं को चुनाव जीताने में सक्षम हो तथा संगठन की बागडोर संभालने की योग्यता रखता हो। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि देशभर में कांग्रेस का घटता जनाधार ही उसकी सबसे बड़ी समस्या है। जाहिर है कि उसके नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को शायद अब ऐसा महसूस होने लगा है कि उसके नेता उसे चुनाव जिताने में सक्षम नहीं हैं, इसीलिए पार्टी के भीतर टूट-फूट जारी है और आलाकमान की नजर में नेता-कार्यकर्ता मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखाएं पार करने लगे हैं। वैसे तर्क दिया जा सकता है कि कई राज्यों में अब भी कांग्रेस की सरकारें मौजूद हैं, पर किसे नहीं पता कि उन राज्यों में वस्तुतः क्षेत्रीय नेताओं की राजनीतिक सूझबूझ और क्षमता के कारण ही कांग्रेस सत्ता में काबिज है। पंजाब को ही लें, तो वहां के मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने अपने बल-बूते पर ही चुनाव जीतकर स्वयं अपना ताज सुरक्षित रखा। हालांकि कैप्टन अमरिन्दर जैसे अनुभवी नेता के नेतृत्व वाली सरकार को कितनी नासमझी से गिराकर पार्टी ने अपनी ही छीछालेदर कराई, सबने देखा। पार्टी के नेता-कार्यकर्ता जिसे हाईकमान का मास्टर-स्ट्रोक बता रहे थे, तीन दिनों में ही उसकी बुरी तरह से धज्जियां उड़ती दिखीं। इसी प्रकार राजस्थान में अशोक गहलोत ने जैसे-तैसे सचिन पायलट को मनाकर तमाम खींच-तान के बावजूद अपनी साख बचाई। यह अलग बात है कि दोनों नेताओं में सुलह कराने में आलाकमान के नाकाम रहने के कारण गहलोत और पायलट के बीच का द्वन्द्व राख में दबी चिंगारी की भांति अब भी सुलग ही रहा है। छत्तीसगढ़ में भूपेश सिंह बघेल और टीएस सिंहदेव ने मिल-जुलकर राज्य का सिंहासन प्राप्त किया। तात्पर्य यह है कि कांग्रेसी क्षत्रप अब चुनावी वैतरणी पार करने के लिए अपने आलाकमान के ऊपर निर्भर नहीं रहते। वे अब 'अपना हाथ जगन्नाथ' की भूमिका में स्वयं ही अपना नेता बनकर उभरने लगे हैं। हालांकि चुनावी जीत-हार में निश्चित रूप से पार्टी की छवि आदि का भी प्रभाव अवश्य पड़ता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्वाभाविक ही है कि चुनावी राजनीति में घटती साख के कारण कांग्रेसी नेता-कार्यकर्ता अब आलाकमान को आंखें तरेरने लगे हैं। जाहिर है कि जो धरातल से जुड़ा हुआ हो... और जो अपने बलबूते पर सरकार बनाने-बिगाड़ने का खेल खेलने की क्षमता और साहस रखता हो, वह ऊपरी नेताओं का आदेश भला क्यों मानेगा। ऊपर का आदेश तो वैसे कार्यकर्ता-नेता मानते हैं, जिनका अपना जनाधार नहीं होता... जो चुनावी समर जीतने के लिए आलाकमान की कृपा पर निर्भर रहते हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व तक कांग्रेसी आलाकमान देश की चुनावी राजनीति में बड़े उलटफेर करने की क्षमता रखता था, परन्तु अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। स्पष्ट है कि बदले हुए माहौल में यदि 'अपना हाथ जगन्नाथ' की भूमिका वाले कांग्रेसी क्षत्रपों के ऊपर दिल्ली का आदेश थोपा जायेगा तो मध्य प्रदेश और पंजाब वाली स्थिति से पार्टी को बार-बार सामना करना ही पड़ेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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