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कांग्रेस की चार राज्यों में मिली पराजय के बाद लोकपाल की उपेक्षा पड़ सकती है महंगी

हाल ही में चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली पराजय के बाद कांग्रेस पर दबाव साफ तौर पर देखा जाने लगा है।

कांग्रेस की चार राज्यों में मिली पराजय के बाद लोकपाल की उपेक्षा पड़ सकती है महंगी
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नई दिल्ली. जनलोकपाल की मांग को लेकर यदि अण्णा हजारे को बार-बार अनशन पर बैठना पड़ रहा है तो इसके लिए कांग्रेस कहीं ज्यादा जिम्मेवार है। लोकपाल बिल को लेकर फिर सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली पराजय के बाद कांग्रेस पर दबाव साफ तौर पर देखा जाने लगा है, लिहाजा अब वह लोकपाल को लेकर जनभावनाओं को नजरअंदाज करते हुए खुद को नहीं दिखाना चाहती है।

हालांकि पिछले करीब तीन वर्षों से कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार तो अण्णा को केवल आश्वासन ही दे रही है। वहीं सरकार जिस लोकपाल की बात कर रही है, वह न तो अण्णा का जनलोकपाल है न ही जनभावनाओं के अनुरूप। ऐसे में विधेयक का भविष्य अभी भी अनिश्चित है। यह विधेयक लोकसभा में पारित हो चुका है और राज्यसभा में रुका है। हाल के विधानसभा चुनावों में जो हुआ है उससे कांग्रेस की रूह कांप गई है। लोगों की अपेक्षाओं की अवहेलना का नतीजा हैकि राज्यों में उसकी यह दुर्गति हुई है।

राजस्थान में तमाम योजनाएं चलाने का दावा करने के बाद भी 21 सीटों पर सिमट गई। मध्यप्रदेश में लगातार दस वर्ष से सत्ता के करीब नहीं पहुंच पा रही है। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के आगे उसके लोकलुभावन वादे काम नहीं कर सके। वहीं दिल्ली में महज आठ सीटें मिलीं। यह लोगों के आक्रोश का नतीजा है। दूसरी ओर लोकसभा चुनाव शुरू होने में महज कुछ ही दिन बचे हैं। उसके नेता अभी से कह रहे हैं कि कांग्रेस 2014 में विपक्ष में बैठ सकती है।

जिस सिविल सोसाइटी के बारे में कांग्रेसी अब तक मुंह बिचका रहे थे उसने और विपक्ष ने बता दिया हैकि जनभावनाओं को दरकिनार करने का नतीजा क्या होता है। हालांकि इस बार अण्णा का आंदोलन कमजोर हुआ है। उतनी भीड़ भी नहीं है, जितनी की पिछली बार दिल्ली में दिखी थी। वे चेहरे भी नहीं हैं, जो बीते आंदोलनों तक उनके मंच पर दिखते थे, लेकिन इन सब के बावजूद उनके पास एक नैतिक बल है, जिसके सहारे वह अनशन पर बैठे हैं। उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है। डॉक्टरों ने उन्हें सलाह दी है कि अनशन उनको नुकसान पहुंचा सकता है।

इसके बावजूद जनलोकपाल की मांग को लेकर बैठे हैं तो सरकार उन पर संदेह नहीं कर सकती। ऐसा करने के लिए केंद्र सरकार ने ही उन्हें मजबूर किया है। लोकसेवकों के कामकाज के तौर-तरीकों को देखते हुए जरूरी है कि देश में मजबूत लोकपाल का गठन किया जाए। जो लोग यह कहते हैं कि महज कानून लाकर भ्रष्टाचार को नहीं रोका जा सकता, वे शायद जनभावनाओं को नहीं समझ पा रहे हैं और अभी भी अंधेरे में जी रहे हैं। यह विडंबना हैकि आजादी के 65 साल बाद भी हमने देश में ऐसा कोई तंत्र नहीं खड़ा किया है जो भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सके, लेकिन वक्त बदल गया है।

अब सत्ताधारियों को कड़ा कानून लाना होगा या जाना होगा। जनता भ्रष्टाचारियों को बर्दाश्त नहीं करेगी। अब जो राजनीतिक पार्टी जनभावनाओं को नहीं समझेगी वह सत्ता में नहीं रह पाएगी। उत्तर भारत के चार राज्यों के चुनावी नतीजे भी यही संकेत दे रहे हैं।

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