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कांग्रेस का सिर्फ रोड शो से ही भला नहीं होगा

यूपी में कांग्रेस का संगठन कहीं नहीं है। पार्टी के पास कार्यकर्ता नदारद है। वोट बैंक नहीं है।

कांग्रेस का सिर्फ रोड शो से ही भला नहीं होगा
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सोनिया गांधी का बनारस में रोड शो निश्चित ही कांग्रेस के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। राजनीतिक रूप से यह राज्य किसी भी पार्टी के लिए अहम है। कहा जाता है कि केन्द्र की सत्ता का रास्ता भी उत्तर प्रदेश से होकर ही जाता है। 2014 में भाजपा भी उत्तर प्रदेश को फतह करके ही केन्द्र की सत्ता पर काबिज हुई थी। यूपी के 80 में से 73 सीटों पर एनडीए को सफलता मिली थी। इनमें से 71 सीटों पर अकेले भाजपा विजयी हुई थी। कांग्रेस की कोशिश भी उत्तर प्रदेश में सीटें हासिल करने की है। पार्टी प्रदेश की सत्ता से 1989 से बाहर है। 27 साल से किसी पार्टी का किसी राज्य की सत्ता से बाहर रहना उस पार्टी के लिए सब कुछ खत्म होने जैसा है।
वर्तमान में हालात भी वैसे ही हैं। यूपी में कांग्रेस का संगठन कहीं नहीं है। पार्टी के पास कार्यकर्ता नदारद है। वोट बैंक नहीं है। राज्य में पार्टी का कोई भी मास लीडर नहीं है। जो भी नेता हैं, वे केवल पार्टी के दफ्तरों तक सीमित रहने वाले नेता हैं। किसी का कोई जनाधार नहीं है। कोई भी नेता अपने दम पर पार्टी को एक भी सीट दिलाने की स्थिति में नहीं है। इसके बावजूद प्रदेश के नेता खेमों में बंटे हुए हैं, यूपी कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर है। इन सबका नतीजा है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यूपी की 403 सीटों में से केवल 28 सीटें मिली थीं। चौथे नंबर की पार्टी बन कर रह गई। उस चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर जरूर बढ़ा था, लेकिन वह 2007 के 8.61 फीसदी से बढ़कर 11.63 फीसदी ही हुआ था। लगभग तीन फीसदी का मामूली इजाफा।
2014 के लोकसभा चुनाव में भी केवल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ही अपनी सीटें बचा पाए थे। यानी 80 में से कांग्रेस के खाते में दो सीटें। इस आम चुनाव में कांग्रेस वोट प्रतिशत भी काफी गिरा था। 2009 के 18.25 फीसदी में से 10.75 प्रतिशत गिरकर 7.50 फीसदी रह गया था। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को पता है कि 2019 में अगर भाजपा से लड़ना है तो उत्तर प्रदेश में जीत की शुरुआत 2016 के विस चुनाव से करनी होगी। इसी कोशिश में पार्टी ने '27 साल यूपी बेहाल' नारों के साथ अपना अभियान शुरू किया है। इसी अभियान का हिस्सा सोनिया का 'दर्द-ए-बनारस' रोड शो है। कांग्रेस ने सोच-समझकर सोनिया के रोड शो के लिए बनारस को चुना है।
एक तो यह पीएम नरेन्द्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र है और दूसरा यह पूर्वी उत्तर प्रदेश में आस्था का बड़ा केंद्र है। तीसरा, ईस्ट यूपी में 160 विस सीटें हैं और यह क्षेत्र काफी पिछड़ा हुआ है। कांग्रेस बनारस के पिछड़ेपन को सीधे यहां के सांसद नरेन्द्र मोदी की विफलता से जोड़कर अपना चुनाव अभियान चलाएगी। इस नीति से जहां कांग्रेस मोदी के मुकाबले सोनिया को खड़ा कर पाएगी, वहीं भाजपा के विकास एजेंडे पर वार कर पाएगी।
काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा कर सोनिया ने कांग्रेस की हिंदू विरोधी छवि को भी तोड़ने की कोशिश की है। कांग्रेस को अगर भाजपा के 'कांग्रेस मुक्त अभियान' को टक्कर देनी है, तो इस तरह के रोड शो देशभर में करने होंगे। हालांकि केवल रोड शो से ही कांग्रेस का भला नहीं होगा। मरणासन्न पार्टी में जान फूंकने के लिए कांग्रेस नेताओं को इसी तरह जनता के बीच लगातार जाते रहना होगा। राज्यों में क्षेत्रीय छत्रप तैयार करने होंगे। जनमुद्दों को लेकर संघर्ष करना होगा। हालांकि घपले-घोटालों के चलते बदनाम हो चुकी कांग्रेस के लिए जनता का विश्वास हासिल करना आसान नहीं होगा।
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