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सदन में विश्वास से भरी भाजपा के सामने कांग्रेस पस्त

कांग्रेस की यह हालत तो तब है, जबकि वह 2014 में केन्द्र की सत्ता से बाहर हो चुकी है।

सदन में विश्वास से भरी भाजपा के सामने कांग्रेस पस्त

एक सौ बत्तीस साल पुरानी कांग्रेस पार्टी इन दिनों एक ही चिंता से ग्रस्त है कि किस तरह सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल फिर से राज्यसभा में पहुंचें। दोनों सदनों में उसके सदस्य कभी नोटा को मुद्दा बनाते हैं, कभी अपने विधायकों के दलबदल को तो कभी कर्नाटक के मंत्री डी शिवकुमार के ठिकानों पर आयकर विभाग के छापों को।

इस सबके बीच पार्टी का सर्वोच्च नेतृत्व या तो खामोशी से पूरे घटनाक्रम को देख रहा है या उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा है। कांग्रेस की यह हालत तो तब है, जबकि वह 2014 में केन्द्र की सत्ता से बाहर हो चुकी है। राज्यों की सत्ता से बाहर हो रही है। नीतीश जैसे सहयोगी टूट रहे हैं। पार्टी के कद्दावर नेता कांग्रेस छोड़कर दूसरे दलों का रुख कर रहे हैं।

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असमंजस और फूट के चलते राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान सौंपने का फैसला भी अधर में लटक गया है। 2014 के आम चुनाव और इस बीच हुए विधानसभा के चुनावों में राहुल गांधी ही कांग्रेस के स्टार प्रचारक रहे हैं। जहां वह सबसे कम गए, उस पंजाब में पार्टी को बहुमत मिल गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वहां अकाली दल के प्रति लोगों में इस कदर गुस्सा था कि वह फिर अमरिंदर सिंह की ओर उन्मुख हो गया।

वहां कांग्रेस के बजाय लोग अमरिंदर की जीत मान रहे हैं। आजादी के बाद से अब तक कांग्रेस की इतनी खस्ता हालत कभी नहीं हुई कि लोकसभा में सदस्यों की संख्या मात्र चौवालीस पर सिमट जाए और एक-एक कर राज्य भी हाथ से निकल जाएं। कर्नाटक और पंजाब सहित इसकी मात्र छह राज्यों में सरकारें बची हैं। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में जल्दी ही भी चुनाव प्रस्तावित हैं।

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जैसे हालात बने हुए हैं, वहां भी भाजपा की वापसी तय मानी जा रही है। इतनी विषम परिस्थितियों और सब कुछ लुट-पिट जाने के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व हाथ पर हाथ रखे बैठा है। 2019 के लोकसभा चुनाव अभी करीब दो साल दूर हैं। फिर भी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह देशव्यापी दौरे पर निकले हुए हैं। बुधवार को वह रोहतक पहुंचे हैं, जहां तीन दिन तक डेरा डालेंगे।

वह 95 दिन के भीतर सभी राज्यों का दौरा कर जहां संगठन को चुस्त चौकस कर रहे हैं, वहीं 2019 के चुनाव में फिर केन्द्र में सरकार बनाने की तैयारियों में जुट जाने की प्रेरणा कार्यकर्ताओं को दे रहे हैं। किन राज्यों और क्षेत्रों में कहां क्या कमियां और कमजोरियां हैं। उन्हें कैसे दूर करना है। इस पर मंथन कर रहे हैं। जहां सरकारें हैं, वहां कार्यकर्ताओं के स्वाभाविक असंतोष को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं।

किस मतदाता वर्ग को जोड़ना है, कैसे जोड़ना है-इसकी रणनीति तैयार कर रहे हैं। मीडिया के जरिए जन-जन तक यह बात पहुंचाने में लगे हैं कि नरेन्द्र मोदी सरकार समाज के पिछड़े, दलित, वंचित, महिलाओं और दूसरे वर्गों के कल्याण के लिए कौन से कदम उठा चुकी हैं। कांग्रेस अखिल भारतीय स्तर की पार्टी है और करीब साठ साल उसने शासन किया है।

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इसलिए उसका दायित्व बनता है कि वह विपक्षी दलों को केन्द्र सरकार के खिलाफ इकट्ठा करे, परन्तु ऐसा लगता है कि वह अपने ही घर को नहीं संभाल पा रही है। भाजपा के पास जहां प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी जैसा कुशल राजनीतिज्ञ है, वहीं अध्यक्ष के तौर पर चाणक्य की भूमिका में अमित शाह हैं, जिनकी अगुआई में पार्टी एक के बाद एक कई राज्यों में चुनाव जीतती आ रही है।

दूसरी तरफ कांग्रेस सदन में और सदन के बाहर केवल हंगामा करने और सरकार का रास्ता रोकने में ही लगी दिख रही है। ऐसे में वह 2019 के लिए कब रणनीति तैयार करेगी। कब विपक्षी दलों को इकट्ठा करेगी और कब नेतृत्व का सवाल सुलझाएगी, यह बहुत बड़े यक्ष प्रश्न हैं।

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