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ओमकार चौधरी का लेख : कांग्रेस को एक और आघात

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, केन्द्र में स्वास्थ्य मंत्री और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल (Governor) रह चुके मोतीलाल वोरा ऐसी पीढ़ी का नेतृत्व करते थे, जिनके कुछ मूल्य, सिद्धांत और विचार थे। इस आयु में भी वह नई उम्र के नेताओं और कार्यकर्ताओं से अधिक सक्रिय थे। बरसों तक पत्रकारिता से जुड़े रहे वोरा साहब का अंतिम समय तक पत्रकारों के साथ परिवार जैसा ही सरोकार बना रहा। उनके कार्यालय में जितना जमावड़ा कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं का रहता था, उससे कम मीडियाकर्मियों का नहीं होता था। वह सबसे गर्मजोशी से मिलते थे। उन्हें पर्याप्त समय देते थे। मोती लाल वोरा की सोच और क़द के नेता अब कांग्रेस में बहुत कम बचे हैं।

ओमकार चौधरी का लेख : कांग्रेस को एक और आघात
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वर्ष 2020 कुछ ही दिनों में विदा होने वाला है परंतु इस सदी के अब तक के क्रूर साल के रूप में इसे स्मरण किया जाएगा। कोविड 19 ने पूरे विश्व के साथ-साथ भारत में भी क़हर बरसाया।

बहुत से परिवारों ने अपने प्रियजन गँवा दिए। अर्थव्यवस्था (Economy) को बड़ा आघात लगा। इससे उबरने में अभी निश्चित ही काफ़ी वक़्त लगने वाला है परंतु कुछ आघात ऐसे होते हैं, जिनकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं होती। कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी इस कालखंड में हमसे दूर चले गए, जिनका स्थान कोई नहीं ले पाएगा। कोरोना की चपेट में आकर कई केन्द्रीय मंत्री, राज्यों के मंत्री, सांसद, विधायक, साहित्यकार, अलग-अलग क्षेत्रों के नामचीन चेहरे देखते ही देखते हाथों से फिसल गए।

विपक्षी दल कांग्रेस की बात करें तो कुछ ही दिन पूर्व वर्षों तक सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) के राजनीतिक सचिव रहे अहमद पटेल और असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई नहीं रहे और अब पूर्व केन्द्रीय मंत्री, उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मोतीलाल वोरा (93) भी चले गए। वह भी 10, जनपथ के बहुत करीबी रहे और बहुत लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष भी रहे। वोरा जैसी जिजीविषा वाले समर्पित, अनुशासित और परिश्रमी नेता कांग्रेस में बहुत कम रह गए हैं।

कांग्रेस इन दिनों किस तरह के कठिन दौर से गुजर रही और चुनौतियों का सामना करना कर रही है, हम और आप जानते हैं। डा. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व के दूसरे कार्यकाल से पार्टी की मुश्किलें शुरू हुई थीं, जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। 2014 और 2019 में लगातार दो आम चुनाव में उसे ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा। बहुत से राज्यों से उसकी सरकारें चली गईं। नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब से कई तरह की दूसरी मुश्किलों ने भी आ घेरा। जो एजेंसियाँ गंभीर मामलों के सामने आने के बाद भी खामोशी अख़्तियार किए हुए थीं, उन्होंने जाँच-पड़ताल शुरू कर दी। नेशनल हेरल्ड मामले में तो स्वयं सोनिया गांधी, राहुल गांधी, ऑस्कर फ़र्नांडीज़, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और गांधी परिवार के करीबी मोतीलाल वोरा के नाम भी सामने आए। उन पर भी मुक़दमे दर्ज हुए। उन्हें भी अदालतों में पेश होना पड़ा। इतने विपरीत हालातों और उम्र के इस पड़ाव पर भी वोरा साहब का हौसला कभी कम नहीं दिखा। पार्टी और अपने कर्तव्यों के प्रति किसी प्रकार की कमी नहीं दिखी। कोषाध्यक्ष के साथ-साथ वह संगठन के प्रशासन का काम काज भी देखते थे। 24, अकबर रोड स्थित दफ़्तर में कोई और मिले न मिले, मोतीलाल वोरा ज़रूर अपने कार्यालय में मिल जाते थे। कोई किसी के संदर्भ से आए न आए, वह हर किसी की मदद के लिए तत्पर दिखाई देते थे। बहुत ध्यान से बात सुनना और उसका निराकरण करने का प्रयास करना उनकी खूबी थी। कई बार तो दूर दराज़ के राज्यों से आने वाले कांग्रेस कार्यकर्ता जब प्रभारी को नहीं पाते थे तो वोरा साहब से मिलकर और अपने दुख दर्द बताकर संतुष्ट होकर वापस लौट जाते थे।

एक दिन पहले बीस दिसंबर को उनका जन्मदिन था और आज अस्पताल से उनके नहीं रहने की दुखद सूचना मिली। कुछ दिन पहले वह कोरोना वायरस से भी संक्रमित हुए थे। तब उन्हें एम्स में दाखिल कराया गया था। ठीक होकर घर लौट गए थे परंतु स्वास्थ्य कारणों से फिर भर्ती कराना पड़ा। इस बार वह कांग्रेस पार्टी उतने भाग्यशाली नहीं रहे। 2002 में वह कोषाध्यक्ष बनाए थे। 2018 में जब फेरबदल किए गए, तब स्वास्थ्य कारणों के चलते ही उनके स्थान पर अहमद पटेल को यह दायित्व सौंपा गया। दुर्योग देखिए कि कुछ दिनों के भीतर दोनों का निधन हो गया है। राहुल गांधी ने ट्वीट करके सही ही कहा है कि वोरा जी एक सच्चे कांग्रेसी और अद्भुत इंसान थे। हम उन्हें बहुत मिस करेंगे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, केन्द्र में स्वास्थ्य मंत्री और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रह चुके मोतीलाल वोरा ऐसी पीढ़ी का नेतृत्व करते थे, जिनके कुछ मूल्य, सिद्धांत और विचार थे। इस आयु में भी वह नई उम्र के नेताओं और कार्यकर्ताओं से अधिक सक्रिय थे। बरसों तक पत्रकारिता से जुड़े रहे वोरा साहब का अंतिम समय तक पत्रकारों के साथ परिवार जैसा ही सरोकार बना रहा। उनके कार्यालय में जितना जमावड़ा कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं का रहता था, उससे कम मीडियाकर्मियों का नहीं होता था। वह सबसे गर्मजोशी से मिलते थे। उन्हें पर्याप्त समय देते थे।

वह किस स्तर के नेता थे, इस घटना से पता चलता है कि 2019 में लोकसभा के नतीजे आने के उपरांत जब राहुल गांधी ने अचानक अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया और सोनिया गांधी कई महीने तक फ़ैसला नहीं कर सकीं कि क्या करें, तब मोतीलाल वोरा का नाम कार्यकारी अध्यक्ष पद के लिए चला था परंतु स्वयं उन्होंने आगे बढ़कर कहा कि सोनिया गांधी ही व्यवस्था होने तक यह दायित्व सँभालेंगी। उनके निधन की सूचना के साथ आनलाइन पोर्टल्स पर ख़बर के साथ उनके जो चित्र लगाए गए, उनमें सोनिया गांधी के साथ वोरा साहब का चित्र भी है, जिसमें सोनिया छाता सँभाले हुए हैं और वोरा उनके साथ चल रहे हैं। यह एक तस्वीर बता देती है कि 10, जनपथ की निगाहों में उनके लिए कितना सम्मान था। वह गांधी नेहरू परिवार के दिलों में क्या स्थान रखते थे। कांग्रेस का कोषाध्यक्ष पद फंड जुटाने, खर्च करने और चुनाव से लेकर सभाओं, कैंम्पेन आदि तमाम तरह की व्यवस्थाएँ करने की दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। पार्टी के शीर्ष नेताओं में से कुछ का ही बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से सीधा संपर्क रहता आया है। मोतीलाल वोरा उनमें से एक थे, जो करीब-करीब रोज़ाना सोनिया गांधी से बातचीत करते थे। नेशनल हेरल्ड को चलाने वाली एजेएल कंपनी के कर्ताधर्ताओं में गांधी परिवार से बाहर के जिन लोगों के नाम शामिल थे, उनमें मोतीलाल वोरा भी थे। वो एजेएल कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर थे। परिवार के चलते उन्हें केस का सामना करना पड़ा।

क़रीब दो दशक से मेरा उनसे परिचय था। बहुत अनौपचारिक बातचीत में भी वह कभी किसी सहयोगी की निंदा, बुराई या आलोचना करते हुए मुझे नहीं दिखे। बहुत विपरीत से विपरीत स्थितियों परिस्थितियों में भी मुस्कराते रहना, कठिन से कठिन प्रश्न से बचकर निकल जाना, कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी घटनाक्रम को छुपा जाना उनकी विशेषताएँ थीं। जब डा. एपीजे अब्दुल कलाम के बाद नए राष्ट्रपति के रूप में नामों की चर्चा हो रही थी, तब मैंने उन्हें कुरेदने की कोशिश की। उनका नाम भावी राष्ट्रपति के रूप में लेकर। तब वह खुलकर हंस दिए थे। इसके अलावा उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। कभी किसी पद के लिए लाबिंग नहीं की। मध्य प्रदेश हो या बाद में बने उनके गृह राज्य छत्तीसगढ़ की कांग्रेस राजनीति की उठापटक रही हो, वह स्वयं को उससे अलग रखते थे। मोती लाल वोरा की सोच और क़द के नेता अब कांग्रेस में बहुत कम बचे हैं।

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