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डा. मोनिका शर्मा का लेख : सुधरेंगे आधी आबादी के भी हालात

उत्तर प्रदेश की सरकार ने आबादी पर अंकुश लगाने का प्रारूप तैयार किया है। गाँव हो शहर, ज्यादा बच्चों की देखभाल के दबाव में अपनी काबिलियत और क्षमता के मुताबिक़ काम कर रही महिलाओं का काम छूट जाता है। अधिकतर कमजोर आर्थिक तबके से आने वाले बड़े परिवारों में आर्थिक हालात और बिगड़ जाते हैं। रोटी, कपड़ा, मकान जैसी आधारभूत सुविधायें भी न जुटा पाने वाले घरों में बच्चों की संख्या का बढ़ना, शिशु मृत्यु दर, बच्चों की असुरक्षा और कुपोषण जैसी बातें औरतों को भावनात्मक और शारीरिक रूप से भी पीड़ा पहुंचाती हैं। जनसंख्या नियंत्रण से देश की आबादी कम होगी और महिलाएं सेहतमंद और सशक्त भी होंगी।

डा. मोनिका शर्मा का लेख : सुधरेंगे आधी आबादी के भी हालात
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डा. मोनिका शर्मा

देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले सूबे उत्तर प्रदेश की सरकार ने आबादी पर अंकुश लगाने का कानून तैयार किया है। उत्तर प्रदेश विधि आयोग के अंतर्गत तैयार किये गए जनसंख्या नियंत्रण के इस मसौदे के लागू होने के बाद दो से ज्यादा बच्चों वाले परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सकेगा। साथ ही चुनाव ऐसे परिवार स्थानीय निकाय चुनाव नहीं लड़ पाने सहित कई अन्य कई सरकारी छूटों और सुविधाओं से भी वंचित रहेंगे। आबादी पर नियंत्रण का यह जरूरी कदम संसाधनों पर बढ़ते दबाव को कम करने के साथ ही पोषण एवं स्वास्थ्य के मामले में सामाजिक-पारिवारिक जीवन की खुशहाली से भी जुड़ा है। विशेषकर स्त्रियों के लिए सेहत सहेजने और स्तरीय जीवन की बुनियाद बनाने वाला है।

यही वजह है कि यह बिल आबादी पर काबू पाने का प्रारूप भर नहीं है। देश की महिलाओं के जीवन में तो यह आमूलचूल बदलाव लाने वाली नीति है। गौरतलब है कि यूपी में 2021-2030 के लिए प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण नीति के जरिये परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत गर्भ निरोधक उपायों की उपलब्धता को बढ़ाना और सुरक्षित गर्भपात की समुचित व्यवस्था करने जैसे बिंदु भी शामिल हैं। इतना ही नहीं उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से नवजात मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर घटाने के लिए उचित और सहज स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की बात भी लिए है ।

समझना मुश्किल नहीं कि बढ़ती जनसंख्या से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े सभी पहलू, महिलओं के स्वास्थ्य और सशक्तीकरण की राह में भी बड़ी बाधा हैं। ऐसे में जिस देश में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति हो, वहां औरतों के हालात परेशानियों से भरे ही हो सकते हैं। स्त्री जीवन की इन तकलीफों को इस बात समझिये कि आज संसार भर में बढ़ती आबादी को मानवाधिकारों से जुड़ा विषय समझा जा रहा है। यानी, अनगिनत लोगों के लिए जीवन की बुनियादी जरूरतों के बिना जीवनयापन करने की स्थितियां बनी हुई हैं। भारत ही नहीं दुनिया के कई हिस्सों में एक बड़ी आबादी अमानवीय हालातों में जीने को भी विवश है। पीने का स्वच्छ जल, आवास, भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में नारकीय जीवन जी रही है। कहना गलत नहीं होगा कि जीवन से जुड़ी जरूरतों से जूझते हुए महिलाएं स्वास्थ्य खोने से लेकर प्रसव जटिलताओं में जान गंवाने तक, हर मोर्चे पर बार-बार माँ बनने के जोखिम को झेलती हैं।

यह भी हकीकत है कि आबादी नियंत्रित करने के लिए जन-जागरूकता, शिक्षा और सामाजिक-पारिवारिक सोच में बदलाव लाना बेहद जरूरी है | गौरतलब है कि ऐसे सभी पहलुओं पर हमारे यहाँ बरसों से काम हो रहा है। बावजूद इसके कभी बेटे के जन्म के लिए परिवार बढाते जाना तो गर्भ निरोधक उपायों के इस्तेमाल से दूरी बनाना। जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर कामयाबी पाने की गति बहुत धीमी रही है। एक ओर बाल विवाह जैसी कुरीतियाँ जड़ें जमाए हैं तो दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता दोहन भी चिंतनीय है। बढ़ती भीड़ के चलते गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन महानगरों में मलिन बस्तियों को विस्तार दे रहा है। निर्धनता, बेरोजगारी, भुखमरी, बीमारी, कुपोषण, अराजकता- अशांति ही नहीं जल-वायु-धरती के प्रदूषण की अहम वजह भी बढ़ती आबादी ही है। बढ़ती भीड़ की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन किया जा रहा है। पीने के पानी का संकट आज बड़ी समस्या बन गया है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पानी की वर्तमान आपूर्ति के मुकाबले 2030 तक आबादी को दोगुनी पानी की आपूर्ति की जरूरत होगी। भूजल दोहन के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है। यह किसी से छुपा नहीं कि देश एक दूर दराज़ के इलाकों में खुद महिलाएं ही मीलों चलकर पीने का पानी जुटाती हैं ।

विचारणीय है कि गिनती के वर्षों में ही आबादी के मोर्चे पर दुनिया में अव्वल होने जा रहे हमारे देश के पास प्राकृतिक संसाधन तो आज भी उतने ही हैं, जितने आधी सदी पहले थे। तभी तो आबादी की लगातार वृद्धि ने विकास के कार्यों तक को अप्रभावी कर दिया है। घटते संसाधन और बढ़ती जनसंख्या ऐसा असंतुलन पैदा कर रही है कि आज जीवनयापन से जुड़ी अनगिनत दुश्वारियां हमारे सामने हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता और सुरक्षा जैसे मोर्चों पर किये गए सभी प्रयास कम ही पड़ते नजर आते हैं। नतीजतन, घर के आँगन से लेकर बाहर तक समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।

ऐसी सभी समस्याएं सामाजिक, पारिवारिक पहलुओं से लेकर स्वास्थ्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता तक औरतों का जीना और मुश्किल बना रही हैं। बार बार माँ बनने से उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही भविष्य में परिवार की आर्थिक स्थिति और बच्चों की शिक्षा और सेहत भी प्रभावित होती है। गाँव हो शहर, ज्यादा बच्चों की देखभाल के दबाव में अपनी काबिलियत और क्षमता के मुताबिक़ काम कर रही महिलाओं का काम छूट जाता है। अधिकतर कमजोर आर्थिक तबके से आने वाले बड़े परिवारों में आर्थिक हालात और बिगड़ जाते हैं। रोटी, कपड़ा, मकान जैसी आधारभूत सुविधायें भी न जुटा पाने वाले घरों में बच्चों की संख्या का बढ़ना, शिशु मृत्यु दर, बच्चों की असुरक्षा और कुपोषण जैसी बातें औरतों को भावनात्मक और शारीरिक रूप से भी पीड़ा पहुंचाती हैं।

विचारणीय है कि दूर दराज़ के इलाकों में तो सेहतमंद और सुरक्षित मातृत्व के लिए गर्भावस्था में सही संभाल और प्रसव के बाद उचित देखभाल से जुड़ी सजगता और समझ की स्थितियां आज भी नहीं बन पाई हैं । नतीजतन, गर्भावस्था के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं संक्रमण, बाधित प्रसव, एनीमिया,आयोडीन की कमी और मानसिक तनाव जैसी कई पेचिदगीयों का भी शिकार होती हैं। कई महिलाओं को संतुलित आहार नहीं मिल पाता । इतना ही नहीं गरीब परिवारों में तो प्रसव के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों तक सकुशल पहुँचने की परिवहन सुविधाएँ तक नहीं होतीं। ऐसे में बार बार प्रसव की जटिलताओं का सामना करने की बात हो या जच्चा-बच्चा के उचित पोषण और देखभाल की कमी, महिलाएं अपना स्वास्थ्य भी खो रही हैं और बच्चे भी कुपोषित हैं ।

कुछ समय पहले आई राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण की रिपोर्ट मां और बच्चे दोनों की पोषण की चिंतनीय स्थितियां सामने रखती हैं | पांच वर्ष तक के 35 फीसदी बच्चे नाटे कद के हैं, 17 फीसदी कमज़ोर हैं, 33 फीसदी का वजन कम है और 11 फीसदी भयंकर कुपोषित हैं। राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण के सर्वे के मुताबिक़ गर्भवती महिलाओं के खान-पान और सेहत की खैरियत से जुड़े सभी कारक माँ ही नहीं बच्चे की सेहत पर भी असर डालते हैं। शिक्षा, जागरूकता व परिवार नियोजन को लेकर सामने आये इस प्रारूप पर सही ढंग से काम किया जाय तो आबादी कम होगी और महिलाएं सेहतमंद और सशक्त होंगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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