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हिलेरी का प्रत्याशी बनना यूएस में बदलाव के संकेत

पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी ने डेमोक्रेट की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी जीत कर अमेरिका में रचा इतिहास

हिलेरी का प्रत्याशी बनना यूएस में बदलाव के संकेत
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अमेरिकी लोकतंत्र ने अपने इतिहास में सुनहरा अध्याय जोड़ा है। हालांकि इस अध्याय को जोड़ने में उसे 227 साल लग गए। चार जुलाई 1776 को अमेरिका आजाद हुआ था, लेकिन 13 साल बाद 1789 से वहां राष्ट्रपति चुनाव शुरू हुआ। अमेरिकी आवाम ने तब से लेकर अब तक किसी महिला को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनाया। ऐसा नहीं है कि किसी महिला ने कोशिश नहीं की। आज तक दो सौ से अधिक अमेरिकी महिलाओं ने राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनने की कोशिश की, लेकिन अंतत: राष्ट्रपति प्रत्याशी नहीं बन सकी थीं। कामयाबी हिलेरी क्लिंटन को मिली। पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी ने डेमोक्रेट की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी जीत कर अमेरिका में इतिहास रच दिया।
इसमें कोई दोराय नहीं कि हिलेरी खुद राष्ट्रपति बराक ओबामा सरकार में विदेश मंत्री रह चुकी हैं, उन्हें अमेरिकी सरकार में काम करने का अच्छा अनुभव है, जिसके चलते वह अमेरिका के लिए बेहतर राष्ट्रपति साबित हो सकती हैं, लेकिन यह सबकुछ निर्भर करेगा अमेरिकी आवाम पर, कि वे आगामी आठ नवंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी को चुनती हैं या नहीं? हिलेरी के सामने रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप हैं। अपने लुभावन भाषणों और सलेक्टिव विचारों के चलते वे भी अमेरिकी आवाम में खासे पसंद किए जा रहे हैं। इसलिए मुकाबला कांटे का है। खास बात यह है कि वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा, उनकी पत्नी मिशेल ओबामा खुलकर हिलेरी का सर्मथन कर रहे हैं।
प्रतिद्वंद्वी रहे बर्नी सैंडर्स भी क्लिंटन के सर्मथन में आ गए हैं। यहां तक तो ठीक है, लेकिन अमेरिका दुनिया के सामने मिसाल तभी दे सकेगा, जब वह व्हाइट हाउस में किसी महिला को राष्ट्रपति के रूप में सुशोभित करेगा। दुनिया में सबसे पुराना लोकतांत्रिक राष्ट्र अमेरिका है, वह शक्तिशाली देश भी रहा है, कई बार विश्व में धाक भी जमाई है और विश्व व्यवस्था कायम करने व उसे बनाए रखने में अहम भूमिका भी निभाई है, लेकिन महिलाओं को अधिकार देने के मामले में बहुत उदार नहीं रहा है। 1920 में उसने अपने संविधान में 19वें संशोधन कर महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया। यानी कि एक सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश को अपनी महिला नागरिकों को वाटिंग हक देने में 131 साल लग गए।
अमेरिका में अश्वेतों के साथ भेदभाव का मुद्दा भी रहा है। उन्हें भी वोटिंग राइट समेत तमाम मौलिक व लोकतंत्रिक अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है। लेकिन देर से ही सही प्रथम महिला एवं न्यूयार्क की सीनेटर रह चुकीं हिलेरी का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनना अमेरिकी आवाम की सोच में बड़े बदलाव का संकेत है। दुनिया में यूरोप और अमेरिका प्रगतिशील सामाजिक-राजनीतिक सोच वाले देश माने जाते हैं, लेकिन अमेरिका ने बहुत देर से एक महिला के प्रति राजनीतिक उदारता दिखाई है। ब्रिटेन में बहुत पहले माग्रेट थैचर प्रधानमंत्री बन चुकी हैं। संयोग से अभी भी वहां महिला टेरेसा मे प्रधानमंत्री हैं।
दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील में भी डिल्मा रोसेफ और र्जमनी में चासंलर एजेंला मर्केल राष्ट्र प्रमुख हैं। भारत में भी इंदिरा गांधी, र्शीलंका में चंद्रिका भंडारनायके, पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो सर्वोच्च सत्ता संभाल चुकी हैं। बांग्लादेश में तो वर्षों से दो महिला-शेख हसीना और बेगम खालिदा जिया के बीच सत्ता रही है। चीन भी अभी तक किसी महिला को राष्ट्रप्रमुख नहीं बनाया है। अमेरिका अगर इतिहास रचता है, तो हिलेरी क्लिंटन पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने की महती जिम्मेदारी होगी।
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