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महाभियोग प्रस्ताव का जो हश्र होना था, कांग्रेस सहित सात विपक्षी दलों की निकली हवा

कांग्रेस सहित सात विपक्षी दलों की ओर से मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ लाए गये महाभियोग प्रस्ताव का जो हश्र होना था, वही हुआ। उपराष्ट्रपति एम वैंकेया नायडु ने तकनीकी और दूसरे आधार पर इसे रद्द कर दिया और कहा कि न इसमें तथ्य हैं और न इसकी जरूरत है। इसे लाने के पीछे विशुद्ध राजनीति है।

महाभियोग प्रस्ताव का जो हश्र होना था, कांग्रेस सहित सात विपक्षी दलों की निकली हवा
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कांग्रेस सहित सात विपक्षी दलों की ओर से मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ लाए गये महाभियोग प्रस्ताव का जो हश्र होना था, वही हुआ। उपराष्ट्रपति एम वैंकेया नायडु ने तकनीकी और दूसरे आधार पर इसे रद्द कर दिया और कहा कि न इसमें तथ्य हैं और न इसकी जरूरत है। इसे लाने के पीछे विशुद्ध राजनीति है। जो आरोप लगाए गए हैं, उनमें कोई तथ्य नहीं है।

दरअसल, कांग्रेस और छह अन्य दलों द्वारा पिछले सप्ताह पेश किए गए महाभियोग प्रस्ताव को लेकर देश में तीखी बहस जारी है। कानून के जानकार हैरत में हैं क्योंकि आजादी के बाद कभी भी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग नहीं लाया गया। यह अपने आप में अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक है। खुद कांग्रेस के भीतर भी इसे लेकर गंभीर मतभेद हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, सलमान खुर्शीद, अश्वनी कुमार से लेकर अभिषेक मनु सिंघवी तक इसके खिलाफ बताए गए हैं। लेकिन कपिल सिब्बल की मुहिम को चूकि राहुल गांधी का समर्थन रहा है, इसलिए सिंघवी ने भी दबाव में आकर दस्तख्त कर दिए। पिछले कुछ वक्त से कांग्रेस जिस तरह की राजनीति कर रही है, उस पर एक बड़े वर्ग में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

कई सत्रों से उसने संसद नहीं चलने दी। वह चुनाव आयोग पर सवाल खड़े करती आ रही है। सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर भी उसके कई नेताओं ने सवाल उठाते हुए सेना की काबिलियत पर प्रश्नचिह्न लगाने का काम किया था। अब देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ भी उसने महाभियोग लाने का फैसला ले लिया। जिस तरह वह संवैधानिक संस्थाओं के काम-काज पर प्रश्न खड़े कर रही है।

जहां तक महाभियोग प्रस्ताव लाने का प्रश्न है, कहा जा रहा है कि अयोध्या केस की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल और राजीव धवन ऊंची आवाज में दलीलें देकर सर्वोच्च अदालत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे। इसके दो दिन बाद एक अन्य मामले की सुनवाई करते हुए दिसंबर 2017 में मुख्य न्यायाधीश ने इस रवैये पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए ऐसे वकीलों को फटकार लगाई।

और कहा कि सर्वोच्च अदालत में ऊंची आवाज में दलीलें पेश करने की प्रवृत्ति को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वकील इस पर खुद अंकुश लगा लें अन्यथा उन्हें ही इस पर कड़ी कार्रवाई करनी पड़ेगी। कहा जा रहा है कि उसी समय से कपिल सिब्बल उनके खिलाफ महाभियोग लाने की मुहिम में जुटे हुए थे। संसद सत्र के दौरान ही इसे लेकर मीडिया में चीजें लीक की जाने लगी थीं।

  • अंततः जब सीबीआई अदालत के विशेष जज ब्रजगोपाल लोया पर मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय पीठ ने पिछले सप्ताह अपना फैसला सुनाया कि उनकी मृत्यु की जांच एसआईटी से कराने की कोई जरूरत नहीं है तो फौरन महाभियोग प्रस्ताव लाने का फैसला ले लिया गया।
  • उप राष्ट्रपति वैंकेया नायडु को प्रस्ताव देने के बाद जिस तरह कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद ने प्रेस कांफ्रैंस करके मुख्य न्यायाधीश पर लंबे-चौड़े आरोप लगाए, उस पर भी कानून के जानकारों ने आश्चर्य जाहिर करते हुए इसे न्यायापालिका पर हमला करार दिया।
  • नियमानुसार यदि इस तरह का कोई प्रस्ताव दिया जाता है तो आरोपों को गोपनीय रखा जाता है इस तरह प्रेस कांफ्रैंस करके न्यायापालिका को अपमानित नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसा किया गया।
  • इस पूरे प्रकरण पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बाकायदा अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि यह जजों और न्यायापालिका को डराने-धमकाने की कोशिश है कि अगर आपने हमारे अनुसार फैसले नहीं दिए तो इस तरह के महाभियोग के लिए तैयार रहें।
  • सर्वविदित है कि 2014 में कांग्रेस केन्द्र की सत्ता से बाहर हो गई थी। इसके बाद कुछ को छोड़कर अधिकांश राज्यों से भी वह साफ हो चुकी है। उसे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की आक्रामक चुनावी रणनीति उस पर भारी पड़ रही है।
  • उसकी कोशिश रही है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कोई ऐसा मुद्दा हाथ लग जाए, जिसे वह इनके खिलाफ अस्त्र बना सके। जज लोया मामले पर कांग्रेस उम्मीद लगाए बैठी थी,
  • परंतु विफलता हाथ लगी। इससे उसका धैर्य जवाब दे गया और वह सीधे मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ही महाभियोग ले आई, जिसे उप राष्ट्रपति ने खारिज कर उसकी मुहिम की हवा निकाल दी है।

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