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Citizenship Amendment Bill: नागरिकता नियमों पर राजनीति उचित नहीं

नरेंद्र सांवरिया | UPDATED Jan 9 2019 5:19PM IST
Citizenship Amendment Bill: नागरिकता नियमों पर राजनीति उचित नहीं

Citizenship Amendment Bill 2016 

नागरिकता को लेकर देश के पास स्पष्ट नीति होनी चाहिए। इसमें कोई दोराय नहीं है। नागरिकता के लिहाज से भारत को विश्व में सबसे उदार देश माना जाता है। देश ने 1955 में नागरिकता अधिनियम लागू किया था। इसमें कौन नागरिक होगा और किनको भारत की नागरिकता मिल सकती है, यह प्रावधान किया गया। जिसमें कहा गया था कि 11 साल भारत में बिताने के बाद नागरिकता मिल सकती है।

मौजूदा राजग सरकार ने वर्ष 2016 में नागरिकता संशोधन विधेयक पेश किया। जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी तथा ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को भारत में छह साल बिताने के बाद नागरिकता देने का प्रावधान किया गया। यहां समझने वाली बात है कि आखिर संशोधन की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?

दरअसल, हाल के वर्षों में मुस्लिम बहुल पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान में अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। इन देशों में इस्लाम की कट्टरता बढ़ने के चलते अल्पसंख्यकों के लिए रहना दूभर हुआ है, इसलिए वैसे अल्पसंख्यक जो भारत में रहना चाहते हैं, उनके लिए नागरिकता नियम में संशोधन करना जरूरी है। समय घटाने का मकसद नेक है, क्योंकि उन्हें मुख्यधारा में लाना जरूरी है।

सरकार के हर फैसले का विरोध करना ठीक नहीं है। नागरिकता पर हमें चीन, जर्मनी, यूरोप अमेरिका आदि देशों से सीखना चाहिए। चीनी सरकार अपने देश में इस्लाम के कट्टरपन को रोकने के लिए कड़े नियम बनाए हैं। देश की सुरक्षा, एकता, अखंडता के लिए आवश्यक है कि हमारी नागरिकता देने के नियम बेहतर हों।

कांग्रेस, असम गण परिषद, माकपा, सपा, टीएमसी जैसी पार्टियां नागरिकता विधेयक (सिटिजनशिप बिल) में बदलाव का विरोध कर रही हैं, तो यह भी ध्यान देने की बात है कि ये इसका विरोध क्यों कर रही हैं। चूंकि ये विरोधी दल अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करते रहे हैं, इसलिए सरकार के हर फैसले को हिंदू चश्मे से देख रहे हैं। भारत में अल्पसंख्यक पहले से ही सबसे सुरक्षित हैं और उन्हें सभी संवैधानिक अधिकार हैं।

नागरिकता अधिनियम में संशोधन से देश के अल्पसंख्यकों पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, इसलिए इस बिल को लेकर विरोधी दलों के स्यापे का कोई अर्थ नहीं है। विपक्ष का इस बिल के विरोध में तर्क है कि इसमें धार्मिक पहचान को प्रमुखता दी गई है और नागरिकता संशोधन के लिए धार्मिक पहचान को आधार बनाना संविधान के अनुच्छेद 14 की मूल भावना के खिलाफ है।

अनुच्छेद-14 समता के अधिकार की व्याख्या करता है। विपक्ष का यह भी तर्क है कि असम में बड़ी संख्या में आए बांग्लादेशी हिंदुओं को मान्यता देने के बाद मूल निवासियों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। अगर संशोधन पारित हो जाता है तो असम के मूल निवासियों की धार्मिक, क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और मौलिक पहचान पर विपरीत असर होगा, लेकिन विपक्ष के ये सभी तर्क बेमानी हैं।

पाक, बांग्लादेश व अफगानिस्तान आए अल्पसंख्यकों को नागरिकता मिलने से वे भारतीय कानून के दायरे में आ जाएंगे। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि इस संशोधन बिल असम विशेष के लिए नहीं है और इससे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बन रहे नेशनल सिटिजन रजिस्टर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके बाद विरोध की कोई गुंजाइश नहीं बचती है। केवल विरोध के लिए हर मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी वाहिए। सरकार को नागरिकता नियमों में संशोधन का हक है। देश की सुरक्षा का ध्यान सबको रखना चाहिए।


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