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चिंतन : कांग्रेस पतन के लिए नया रास्ता खुला

आखिकार युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार को ले बैठी। 17 दिनों तक सियासी ड्रामे के बाद शुक्रवार को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बहुमत साबित करने से पहले राज्यपाल लालजी टंडन को इस्तीफा सौंप दिया। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाते ही तय हो गया था कि कमलनाथ सरकार बहुमत खो चुकी है

चिंतन : कांग्रेस सरकार का पतन के लिए नया रास्ता खुलाज्योतिरादित्य सिंधिया (फाइल)

आखिकार युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार को ले बैठी। 17 दिनों तक सियासी ड्रामे के बाद शुक्रवार को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बहुमत साबित करने से पहले राज्यपाल लालजी टंडन को इस्तीफा सौंप दिया। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाते ही तय हो गया था कि कमलनाथ सरकार बहुमत खो चुकी है और भाजपा सरकार बनाने वाली है, लेकिन वे कुर्सी से चिपके रहे। सिंधिया के पार्टी छोड़ते ही उनके समर्थक 22 कांग्रेस विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। दरअसल 2018 के विस चुनाव में कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे रखा था। 15 साल बाद कांग्रेसी की वापसी में सिंधिया का अहम योगदान रहा। चुनाव प्रचार में उन्होंने जमकर पसीना बहाया।

माना जा रहा था कि सिंधिया मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन उनकी जगह कमलनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया गया। उसके बाद सिंधिया के मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की भी बात चल रही थी, लेकिन उनकी इस मांग को भी पार्टी ने नहीं माना। सिंधिया कमलनाथ सरकार व आलाकमान को चुनाव के दौरान जनता से किए वादे याद दिलाते रहे। कमलानाथ इन वादों को लेकर कभी गंभीर नजर नहीं आए। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शपथ लेने के कुछ ही घंटे बाद कर्ज माफी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। पार्टी का दावा था कि 21 लाख किसानों के पचास हजार से लेकर एक लाख रुपये तक के कर्ज माफ कर दिए गए जबकि सच्चाई यह थी कि किसानों को कर्ज माफी के लिए आंदोलन की राह पकड़नी पड़ी। सिंधिया ने भी किसानों की बेहाली का मुद्दा उठाया, लेकिन राज्य सरकार इसकी अनदेखी करते हुए कहा गया कि सब कुछ ठीक ट्रैक पर है। कांग्रेस ने गेंहू उत्पादकों को 150 रुपये बोनस देने का वादा किया था, लेकिन इस पर अमल नहीं कर पाई। चुनाव प्रचार के दौरान दूध उत्पादन पर प्रति लीटर पांच रुपये का बोनस देने का ऐलान किया गया। बाद में पार्टी इसे भूल गई।

प्रदेश में तेल सस्ता करने का भी ऐलान किया गया। सरकार गठन के बाद पेट्रोल और डीजल पर सितंबर 2019 में पांच फीसदी का अतिरिक्त वैट लगाया गया, जिससे तेल देशभर के सभी राज्यों से महंगा हो गया। कांग्रेस ने रोजगार बढ़ाने का वादा किया पर इस दिशा में अभी कोई कदम नहीं उठाया गया, जिससे आम आदमी खासकर युवाओं का सरकार से मोह भंग होता गया। लड़कियों की शादी पर 51,000 रुपये देने की बात कही गई। ये घोषणा सिर्फ घोषणा ही बन कर रह गई। नवविवाहिताओं को वो रकम भी नहीं मिली जो पिछली भाजपा सरकार के दौरान दी जा रही थी। कांग्रेस ने नर्सरी से पीएचडी तक लड़कियों को मुफ्त शिक्षा के अलावा 12वीं में 70 फीसदी से अधिक अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों को मुफ्त लैपटॉप और लड़कियों को दुपहिया वाहन के लिए ब्याज सब्सिडी देने के वादे भी किए, लेकिन सरकार बनने के बाद इन्हें भूल गई। स्कूल-कॉलेजों में गेस्ट टीचर्स/फैकल्टी को रेग्युलर करने का भी वादा किया।

सरकार गठन के बाद से ये शिक्षक आंदोलन की राह पर हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इन वादों के बारे में कमलनाथ सरकार को बार-बार याद दिलाया। कमलानाथ ने अनदेखी की, जिससे राज्य के लोग खुद को ठगा महसूस कर रहे थे। इससे तंग आकर सिंधिया ने 10 मार्च को कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। इनके साथ ही 6 मंत्रियों समेत 22 विधायकों ने इस्तीफे का ऐलान कर दिया। होना तो यह चाहिए था कि कमलनाथ तुरंत त्यागपत्र दे देते, लेकिन वो अंत समय तक जोड़-तोड़ के प्रयास करते रहे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुक्रवार को बहुमत साबित करने के आदेश के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। देर आए, दुरुस्त आए। अब कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया है तो नई सरकार के लिए रास्त खुल गया है। राज्यपाल को सरकार का गठन करना चाहिए ताकि थम चुका विकास का पहिए आगे बढ़ सके।

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