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प्रभात कुमार रॉय का लेख : चीनी बने बलूच विद्रोह का निशाना

ग्वादर क्षेत्र में करीब एक लाख चीनी कार्यरत हैं और निकट भविष्य में ग्वादर में पांच लाख चीनी इंजानियरों और कर्मियों को भेजा जाना है। पाक फौज़ के 15 हजार सैन्य कमांडो की तैनाती चीनी कर्मियों की हिफाजत करने के लिए की गई है। विगत 17 वर्षों से बलूचिस्तान की अवाम अपनी आजादी के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। बलूचों की बगावत को कुचलने के लिए पाक फौज़ ने विगत दस वर्षों में बड़ा जुल्म ढाया है। बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट ने हाल ही में ग्वादर पोर्ट पर कार्यरत चीनी कर्मियों के शिविर पर भीषण हमला किया। डा. अल्लाह नज़र ने कहा है कि फ्रंट आजादी की तहरीक़ के तहत पाक-चीनियों के विरुद्ध छापामार हमले जारी रखेगा।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : चीनी बने बलूच विद्रोह का निशाना
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प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रभात कुमार रॉय

बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट ने हाल ही में पाक-चीन के संयुक्त इकोनॉमिक कॉरिडोर प्रोजेक्ट के तहत बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर कार्यरत चीनी कर्मियों के शिविर पर एक भीषण छापामार आक्रमण किया। बलूच लिबरेशन फ्रंट के लीडर डा.अल्लाह नज़र ने कहा है कि बलूच लिबरेशन फ्रंट अपनी आजादी की तहरीक़ के तहत पाकिस्तानियों और चीनियों के विरुद्ध छापामार हमले जारी रखेगा।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 में पाक-चीन इकोनॉमिक कॉरिडोर प्रोजेक्ट 42 बिलियन डालर के चीनी निवेश से शुरू किया गया और वर्ष 2020 में इस प्रोजेक्ट की लागत को 62 बिलियन डालर तक बढ़ा दिया। बलूचिस्तान के ग्वादर सिटी और ग्वादर पोर्ट को विकसित करने का इस प्रोजेक्ट में प्रावधान है। इस वक्त ग्वादर क्षेत्र में करीब एक लाख चीनी कार्यरत हैं और निकट भविष्य में ग्वादर में पांच लाख चीनी इंजानियरों और कर्मियों को भेजा जाना है। पाक फौज़ के 15 हजार सैन्य कमांडो की तैनाती चीनी कर्मियों की हिफाजत करने के लिए की गई है। विगत 17 वर्षों से बलूचिस्तान की अवाम अपनी आजादी के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। बलूचों की बगावत को कुचलने के लिए पाक़ फौज़ ने विगत दस वर्षों में बड़ा जुल्म ढाया है। पाकिस्तान में बलूचों की आबादी करीब एक करोड़ है। विगत 17 वर्ष के बलूच गृह-युद्ध में पाक फौज़ ने दस हजार बलूचों को कत्ल कर दिया और पांच लाख से अधिक दरबदर हो गए हैं। पाक वायु सेना ने बलूच विद्रोह को कुचल देने के अनेक दफा बलूचिस्तान पर अनगिनत बम बरसाए हैं। 27 अगस्त 2006 को बलूचिस्तान के विद्रोही लीडर अकबर खान बुग्ती को पाक़ फौज ने बेरहमी से कत्ल कर दिया। इसके बाद बलूच बगावत में बहुत तेजी आ गई। दुनियाभर में फैले हुए बलूच लोग बगावत के प्रबल समर्थन करने लगे हैं। पहली दफा लालकिले से दी गई अपनी तकरीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान के गंभीर सवाल को, उठाया था। तभी से बलूच लोग भारत की तरफ बड़ी उम्मीद से देख रहे हैं, कि उनके दर्द की टीस और गहराई को समझने वाला आखिर कोई तो है।

वस्तुतः ब्रिटिश सरकार और बलूच हुकूमत के मध्य 1876 में एक संधि हुई थी। संधि के तहत नेपाल और भूटान के तरह से बलूचिस्तान, जिसको कलात के नाम से भी पुकारा जाता था वस्तुतः एक खुदमुख्तार और आजाद मुल्क करार दिया गया। जब भारतीय महाद्वीप ब्रिटिश साम्राज्यवादी चले गए तो बलूचों ने अपनी आज़ादी को बाकायदा घोषित कर दिया। 1947 में पाक सरकार ने बलूचिस्तान की आजादी को क़बूल भी कर लिया, लेकिन बाद में जिन्ना अपनी घोषणा से मुकर गए। मार्च 1948 में बलूचिस्तान में पाकिस्तान की सेना दाखिल हुई और बलूच सरदार ख़ान का अपहरण कर उनको कराची ले गई। कराची में बलूच सरदार पर सैन्य दबाव डालकर पाकिस्तान के साथ विलय पत्र पर जबरन दस्तख़त करा लिए।

1948 में ही पाकिस्तान में जबरन सैन्य विलय के बाद बलूचिस्तान में विद्रोह की शुरुआत हो गई। तभी से बलूच जनमानस सोचता समझता है कि जिस तरह से उन्हें सैन्य बल पर ज़बरदस्ती पाकिस्तान में मिलाया गया, वो तरीका एकदम गलत था। आजाद बलूचिस्तान के संविधान में संसद के दो सदनों का प्रावधान था। बलूच सरदार ख़ान ने बलूचिस्तान के दोनों सदनों पर फ़ैसला छोड़ दिया था। बलूचिस्तान के दोनों सदनों ने प्रस्ताव को सर्वसम्मति से खारिज किया कि पाकिस्तान के साथ अपने आजाद देश का विलय करेंगे। 1948 में अंजाम दी गई बलूच बगावत को पाक़ फौज द्वारा नृशंसतापूर्वक कुचल दिया गया। 1958 में बलूच आजादी के लिए फिर से बगावत पर उतरे। विगत 73 वर्षो में अनेक दफा बलूचों ने पाकिस्तान हुकूमत के विरुद्ध बगावत कर दी, किंतु वर्ष 2003 से आरम्भ की गई बलूच बगावत निरंतर गति से जारी है।

पाकिस्तान के क्षेत्रफल के करीब 35 फीसदी भू-भाग का निर्माण करने वाले प्रांत बलूचिस्तान में सोना, तांबा, यूरेनियम, तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार विद्यमान हैं। पाकिस्तान के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहे, बलूचिस्तान में पाकिस्तान नौ सेना के ग्वादर, ओरमारा और पासनी में तीन बड़े नेवल बेस स्थित हैं। प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण बलूचिस्तान वस्तुतः पाकिस्तान का सबसे गरीब और बेहद पिछड़ा हुआ इलाका है। बलूचिस्तान का पाकिस्तान की जीडीपी में पांच फीसदी रहने वाला योगदान 21 वीं सदी में तीन फीसदी तक गिर चुका है। बलूच लिबरेशन फ्रंट द्वारा चीनी के कर्मियों को आक्रमण का निशाना बनाने की वजह का बयान फ्रंट के प्रवक्ता नबी बख्श ने कुछ इस तरह से बयान किया।

अमेरिका के पश्चात अब चीन की हुकूमत पाक़ हुकूमत की खैरख्वाह और मददगार बनी हुई है। चीन की हुकूमत आर्थिक संसाधनों का शोषण करने और उनको लूटने की गरज से बलूचिस्तान में विराट पूंजी निवेश करके ग्वादर में बुनियादी ढ़ाचा खड़ा कर रही है। इस नज़रिये से पाक़ के साथ ही साथ चीन की सरकार भी बलूचिस्तान की आजादी राह में दुश्मन बनकर खड़ी हो गई है। अतः चीनी कर्मियों पर बलूच लिबरेशन फ्रंट का हमला जारी रहेगा। चीनी सरकार का दावा कि वह ग्वादर सिटी के चीन के शनजान सिटी की तरह का विकसित बना देंगे एकदम खोखला है। बलूचों को केवल पाकिस्तान से आजादी चाहिए और पाकिस्तान की गुलामी के बरखिलाफ और उसके मददगार चीन के खिलाफ बलूचों की जंग जारी रहेगी।

बलूचिस्तान में पाकिस्तान फौज के बर्बर जुल्मों के विरुद्ध अब दुनियाभर में एक जबरदस्त आवाज उठने लगी है। करीब 25000 हजार से अधिक बलूचों को पाक फौज द्वारा अपहृत कर लिया गया है जिनका अभी कोई अता-पता नहीं है। मानव अधिकारों के लिए कार्यरत संस्थाओं द्वारा अनेक वैश्विक मचों पर बलूचिस्तान में पाक़ फौज द्वारा अंजाम दिए जा रहे जुल्मों सितम की दास्तान बयां की जा रही है। वर्ष 1971 में भारतीय सेना द्वारा बांग्लादेश को पाक सेना के बर्बर जुल्मों सितम से मुक्त किया गया था, जबकि पाक फौज़ द्वारा तकरीबन 30 लाख बंगालियों का कत्ल कर दिया गया था। यक्ष प्रश्न है कि क्या भारत बलूचिस्तान को लेकर कोई ठोस कदम उठाएगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बलूचिस्तान के प्रति अभिव्यक्त की गई गहन सहानुभूति क्या किसी सार्थक परिणाम में परिवर्तित होगी। पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि हबीब जालिब ने लिखा-मुझे जंग ए आज़ादी का मज़ा मालूम है, मुझे बलोचों पर ज़ुल्म की इंतेहा मालूम है, मुझे ज़िंदगीभर पाकिस्तान में जीने की दुआ मत देना, मुझे पाकिस्तान में इतने सालों जीने की सज़ा मालूम है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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