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प्रमोद जोशी का लेख : मुंह के बल गिरेगा चीन

चीनी महत्वाकांक्षाएं स्पष्ट हैं। पुराने चीनी साम्राज्य को फिर से जगाने की कामना। हाल में एक चीनी विशेषज्ञ ने दावा किया कि लद्दाख की गलवान घाटी पर हमारा कब्जा छिंग साम्राज्य के समय का है। यह केवल हमारी सीमा तक सीमित मामला भी नहीं है। गलवान में जो हुआ, उसके पीछे चीन की हांगकांग, ताइवान, वियतनाम और जापान से जुड़ी प्रतिस्पर्धा भी काम कर रही है। थोड़ी सी आर्थिक सफलता मिल जाने के बाद चीन बौरा गया है। इस दुराभिमानी बोझ के कारण वह मुंह के बल गिरेगा। इसकी शुरुआत गलवान प्रकरण से हो गई है। देखना होगा कि चीनी नेतृत्व का रवैया क्या रहता है। भारत और चीन दोनों ने ही फिलहाल बातचीत के जरिए मसले को सुलझाने की इच्छा व्यक्त की है।

चीन ने लद्दाख के पास तैनात किए परमाणु बमों से लैस बॉम्बर
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भारत-चीन (फाइल फोटो)

प्रमोद जोशी

चीन की स्थिति प्यादे से फर्जी वाली है। उसे महानता का इलहाम हो गया है। ऐसी गलतफहमी नाजी जर्मनी को भी थी। लद्दाख में उसने धोखे से घुसपैठ करके न केवल भारत का बल्कि पूरी दुनिया का भरोसा खोया है। ऐसा संभव नहीं कि वैश्विक जनमत को धता बताकर वह अपने मंसूबे पूरे कर लेगा। भारत के 20 सैनिकों ने वीर गति प्राप्त करके उसकी धौंसपट्टी को मिट्टी में मिला दिया है। यह घटना इतिहास के पन्नों में इसलिए याद रखी जाएगी, क्योंकि इसके बाद न केवल भारत चीन के रिश्तों में बड़ा मोड़ आएगा, बल्कि विश्व मंच पर चीन की किरकिरी होगी। उसकी कुव्वत इतनी नहीं कि वैश्विक जनमत की अनदेखी कर सके।

वैश्विक मंच के बाद हमें अपनी एकता पर भी एक नजर डालनी चाहिए। भारत-चीन मसले को आंतरिक राजनीति से अलग रखना चाहिए। शुक्रवार को हुई सर्वदलीय बैठक में हालांकि प्रकट रूप में एकता थी, पर कुछेक स्वरों में राजनीतिक पुट भी था। बैठक में प्रधानमंत्री के एक बयान को तोड़-मरोड़कर पढ़ने की कोशिशें भी हुई हैं। प्रधानमंत्री का आशय केवल इतना था, 'न कोई हमारी सीमा में घुसा हुआ है, न ही हमारी कोई पोस्ट किसी के कब्जे में है।' बात कहने के तरीके से ज्यादा महत्वपूर्ण उनका आशय है। हमारा लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, पर इस स्वतंत्रता का उद्देश्य भारतीय राष्ट्र राज्य की रक्षा है। उसे बचाकर रखना चाहिए।

हाल की घुसपैठ के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत अभी चल ही रही है। जरूरी नहीं कि इसका समाधान फौरन निकल आए। इस टकराव का फौरी तौर पर कोई समाधान निकल भी जाए, पर यह स्थायी समाधान नहीं होगा। सच यह है कि इस विवाद के पीछे चीन और पाकिस्तान की मिली-जुली साजिश है। पिछले साल कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद से चीन ने इस मामले को सुरक्षा परिषद तक में उठाने की कोशिश की, जिसमें उसे सफलता नहीं मिली। अब वह फौजी कार्रवाई करके भारत को धौंस दिखा रहा है। इस साजिश में नेपाल भी शामिल है। ये देश क्यों एक साथ आए हैं, इसे समझने के लिए एक अलग विमर्श की जरूरत है, पर हमें स्वीकार करना होगा कि कोई साजिश है।

चीनी महत्वाकांक्षाएं स्पष्ट हैं। पुराने चीनी साम्राज्य को फिर से जगाने की कामना। हाल में एक चीनी विशेषज्ञ ने दावा किया कि लद्दाख की गलवान घाटी पर हमारा कब्जा छिंग साम्राज्य के समय का है। जुलाई 2013 में चीनी भाषा के अखबार वेनवीपो में छपे एक लेख में कहा गया कि प्राचीन गौरव की वापसी के लिए चीन को अगले पचास वर्षों में छह युद्ध लड़ने ही होंगे। इनमें ताइवान, दक्षिण चीन सागर के द्वीप, बाहरी मंगोलिया और रूस में शामिल जमीन के अलावा दक्षिणी तिब्बत को वापस लेना है, जो भारत के पास है। चीन के थिंकटैंक गाहे-बगाहे भारत के तीस-चालीस टुकड़े करने की योजनाएं बनाते रहते हैं।

यह केवल हमारी सीमा तक सीमित मामला भी नहीं है। गलवान में जो हुआ, उसके पीछे चीन की हांगकांग, ताइवान, वियतनाम और जापान से जुड़ी प्रतिस्पर्धा भी काम कर रही है। थोड़ी सी आर्थिक सफलता मिल जाने के बाद चीन बौरा गया है। इस दुराभिमानी बोझ के कारण वह मुंह के बल गिरेगा। इसकी शुरुआत गलवान प्रकरण से हो गई है। फिलहाल देखना होगा कि चीनी नेतृत्व का रवैया क्या रहता है। भारत और चीन दोनों ने ही फिलहाल बातचीत के जरिए मसले को सुलझाने की इच्छा व्यक्त

की है।

युद्ध को लेकर दोनों पक्षों की झिझक के बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत-चीन के बीच एक बार बड़ी लड़ाई होगी। .यह भी सच है कि युद्ध न हमारे लिए अच्छा है और न चीन के लिए। चीन के पास साधन ज्यादा हैं, पर हम इतने कमजोर नहीं कि चुप होकर बैठ जाएं। हमारी फौजी ताकत इतनी है कि उसे गहरा नुकसान पहुंचा दे। इससे चीन का सारा ताना-बाना बिखर जाएगा। हमारा जो होगा, सो होगा।

जरूरी नहीं कि टकराव अभी हो और यह भी जरूरी नहीं कि हिमालय में हो। युद्ध का ज्यादा बड़ा केंद्र अब हिंद महासागर बनता जा रहा है। फिलहाल दोनों देशों के बीच तीन मोर्चों पर लड़ाई है। सामरिक मोर्चा, डिप्लोमेसी और आर्थिक व्यवस्था, जो पहले दोनों मोर्चों की बुनियादी ताकत है। दोनों के टकराव की बात होती है, तो हिमालय की बर्फीली पहाड़ियां दिमाग में आती हैं। सीमा रेखा पर विवाद हैं, पर आने वाले समय में टकराव हिंद महासागर में होगा।

पिछले कुछ वर्षों से भारत की रक्षा-योजना के केंद्र में हिंद महासागर है। इसके दो कारण हैं। दुनिया का ज्यादातर विदेशी-व्यापार समुद्र के रास्ते से होता है। रास्तों को निर्बाध बनाने की जिम्मेदारी हमारी है। दूसरा कारण है चीन की बढ़ती उपस्थिति। उसे रोकने की जिम्मेदारी भी हमारी है। इस भूमिका का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है मलक्का की खाड़ी। चीनी पनडुब्बियां इसी रास्ते से हिंद महासागर में प्रवेश कर सकती हैं। उनकी पहचान वहीं हो जाए, तो फिर उनका पीछा करना आसान होगा।

हिंद-प्रशांत सुरक्षा अवधारणा के साथ अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद भी चल रहा है। भारत और अमेरिका की नौसेनाओं बीच शुरू हुए युद्धाभ्यास मालाबार में अब जापान भी शामिल है, शायद ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हो जाए। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान 'शत्रु देश' घोषित हो गया। सांविधानिक व्यवस्थाओं ने उसे निष्िक्रय देश बना दिया, पर सांविधानिक बदलावों के बाद जापान अब सक्रिय रूप से इस व्यवस्था में शामिल है। चीन को लेकर भारत अभी तक भ्रम की स्थिति में है। यह साफ है कि हमारे और चीन के सामरिक हित टकराते हैं। उनकी रक्षा के लिए हमें भी अपने मित्रों की पहचान करनी होगी।

हम खुद को किसी एक समूह के साथ जोड़ना नहीं चाहते, पर हिंद प्रशांत रक्षा-व्यवस्था में भी शामिल हैं। दक्षिण चीन सागर की प्राकृतिक सम्पदा के दोहन को लेकर चीन और उस क्षेत्र के देशों के बीच विवाद है। वियतनाम के लिए भारत वहां तेल और गैस की खोज कर रहा है। चीन को इस पर आपत्ति है। भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए दक्षिण चीन सागर तक समुद्री गश्त का दायरा बढ़ाना पड़ा है। हमारी नौसेना दक्षिण पूर्व में मलक्का की खाड़ी के उस संकरे समुद्री मार्ग की निगरानी भी कर रही है, जहां से होकर पोत गुजरते हैं।

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