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संपादकीय लेख : ताइवान की संप्रभुता का सम्मान करे चीन

ताइवान और चीन के बीच जारी तनाव का अंतरराष्ट्रीय स्थिरता पर प्रभाव पढ़ सकता है। चीन जिस तरह से ताइवान पर सामरिक दबाव बना रहा है, उसे अपने जंगी जहाजों की दहाड़ से डरा रहा है, उससे ड्रैगन की नीयत पर संदेह पैदा होना लाजिमी है। ताइवान की मदद को बेशक अमेरिका व ब्रिटेन ने दक्षिण चीन सागर में तीन विमान वाहक पोत तैनात किए हों, चीन पर अमेरिका की पैनी नजर हो, फ्रांस ताइवान के पक्ष में खड़ा हो, लेकिन चीन की महत्वाकांक्षा एशिया में शांति की राह में बाधा बन रही है।

संपादकीय लेख : ताइवान की संप्रभुता का सम्मान करे चीन
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : ताइवान और चीन के बीच जारी तनाव का अंतरराष्ट्रीय स्थिरता पर प्रभाव पढ़ सकता है। चीन जिस तरह से ताइवान पर सामरिक दबाव बना रहा है, उसे अपने जंगी जहाजों की दहाड़ से डरा रहा है, उससे ड्रैगन की नीयत पर संदेह पैदा होना लाजिमी है। ताइवान की मदद को बेशक अमेरिका व ब्रिटेन ने दक्षिण चीन सागर में तीन विमान वाहक पोत तैनात किए हों, चीन पर अमेरिका की पैनी नजर हो, फ्रांस ताइवान के पक्ष में खड़ा हो, लेकिन चीन की महत्वाकांक्षा एशिया में शांति की राह में बाधा बन रही है। ताइवान को अपना हिस्सा मानने वाला चीन विश्व के अन्य देशों के ताइवान के साथ कूटनीतिक रिश्ते को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। गुस्से में वह लगातार ताइवानी हवाई क्षेत्र में अपने लड़ाकू विमान भेज रहा है। चीन के 38 लड़ाकू विमान ताइवान के हवाई क्षेत्र में अतिक्रमण करते हुए घुसे थे। जंगी विमानों के इस प्रदर्शन के बाद गत बुधवार को फ्रांसीसी सीनेटरों का एक समूह पांच दिनी यात्रा पर ताइवान पहुंचा है। चीन की बढ़ती आक्रामकता को देखते हुए ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने अपने लोकतंत्र का बचाव करते हुए कहा है कि अगर ड्रैगन ने ताइवान को अपने नियंत्रण में ले लिया तो इसके विनाशकारी परिणाम होंगे। ताइवान के प्रधानमंत्री सु सेंग-चांग ने भी कहा था कि चीन की यह आक्रामकता क्षेत्रीय शांति के लिए ख़तरा है।

ताइवान के क्षेत्र में चीनी जंगी प्लेन के अतिक्रमण को दुनिया चीन की आक्रामकता के रूप में देख रही है। ताइवान ने दुनिया भर के देशों से आग्रह किया है कि 'चीन के व्यापक ख़तरे को समझना होगा। ताइवान अगर चीन के हाथ में चला गया तो क्षेत्रीय शांति के लिए यह विनाशकारी होगा। यह लोकतांत्रिक साझेदारी के लिए भी विध्वंसकारी साबित होगा।' ताइवान की इस अपील को विश्व को गंभीरता से लेना होगा। तिब्ब्त, शिनझियांग, दक्षिणी मंगोलिया, मकाऊ को अवैध ढंग से चीन ने अपने देश में मिलाया है। भारत के करीब 43 हजार वर्ग किमी भूभाग पर चीन का अवैध कब्जा है। 23 देशों के चीन का सीमा विवाद है। इसलिए चीन भरोसे के लायक नहीं है और वह अब ताइवान को परेशान कर रहा है। भारत का ताइवान से मजबूत संबंध है, इसलिए भारत को कूटनीतिक दिलेरी दिखानी होगी। ताइवान को साथ होने का एहसास भारत को कराना होगा। पिछले 40 सालों में इस वक्त चीन व ताइवान का संबंध सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है। चीन दावा करता है कि ताइवान उसका एक प्रांत है और उसे अपने नियंत्रण में लेने के लिए प्रतिबद्ध है। चीन का कहना है कि अगर ख़ुद में मिलाने के लिए ताक़त का भी इस्तेमाल करना पड़ा तो किया जाएगा। चीन ताइवान में राष्ट्रपति साई इंग-वेन की सरकार को अलगाववादी मानता है।

चीन ने ताइवान की राष्ट्रपति को दो टूक कहा है कि एक देश दो सिस्टम नहीं चलेगा। लेकिन साई इंग-वेन कहती हैं कि ताइवान एक संप्रभु देश है और उसे अलग से स्वतंत्र घोषित करने की ज़रूरत नहीं है। ताइवान दबाव में झुकेगा नहीं। लेकिन वह टकराव नहीं चाहती हैं। ताइवान को अंदेशा है कि चीन 2025 तक उस पर हमला कर सकता है। 15 से अधिक देशों ने ताइवान को संप्रभु राष्ट्र के तौर पर मान्यता दे रखी है। संयुक्त राष्ट्र उसे स्वतंत्र देश नहीं मानते। ताइवान अगर अपनी रक्षा करने में नाकाम रहता है तो यह केवल ताइवान के लोगों के लिए विनाशकारी नहीं होगा बल्कि इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी प्रभावित होगा व पूरा पश्चिमी प्रशांत अस्थिर हो जाएगा। ताइवान के पास यूएस की अत्याधुनिक मिलिट्री टेक्नॉलॉजी है। ताइवान एडवांस्ड सेमीकंडक्टर चिप्स का अग्रणी उत्पादक है और इसी वजह से चीन की सेना उसके ख़िलाफ़ हमला नहीं कर पाती है। ये चिप सिलिकॉन से बने होते हैं और ये चिप्स ताइवान को 'सिलिकॉन शील्ड' प्रदान करते हैं। इस सेक्टर में युद्ध का असर इतना व्यापक होगा कि चीन को भी इसकी भारी आर्थिक क़ीमत चुकानी पड़ेगी। चीन व ताइवान के बीच 1949 से विवाद चला आ रहा है। इसका समाधान होना चाहिए। भारत, जापान, आस्ट्रेलिया चीन व ताइवान के मसले का शांतिपूर्ण हल चाहते हैं। चीन को लोकतांत्रिक ताइवान की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए।

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