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प्रभात कुमार रॉय का लेख : चीन का विस्तारवाद रोकना जरूरी

चीन की विस्तारवादी फितरत का निशाना हिमालय की पर्वत श्रंखलाओं में बसा भूटान निरंतर बनता रहा है। भूटान की कुल आबादी केवल आठ लाख है। भूटान की सैन्य सुरक्षा करने की संपूर्ण जिम्मेदारी भारत की रही है। भूटान की धार्मिक और सांस्कृतिक निकटता तिब्बत से रही है। सैन्य शक्ति के बलबूते पर चीन ने 1950 में तिब्बत पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। राजनीतिक तौर पर भूटान सदियों से भारत के निकट रहा है। भूटान और चीन के मध्य करीब 470 किलोमीटर लंबी सरहद है। चीन और भूटान की सरहद पर स्थित अनेक भूटानी इलाकों पर चीन अपना दावा करता रहा है।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : चीन का विस्तारवाद रोकना जरूरी
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

विगत कुछ वर्षों से चीन की विस्तारवादी फितरत का निशाना हिमालय की पर्वत श्रंखलाओं में बसा भूटान निरंतर बनता रहा है। भूटान की कुल आबादी केवल आठ लाख है। भूटान की सैन्य सुरक्षा करने की संपूर्ण जिम्मेदारी भारत की रही है। भूटान की धार्मिक और सांस्कृतिक निकटता तिब्बत से रही है। सैन्य शक्ति के बलबूते पर चीन ने 1950 में तिब्बत पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। राजनीतिक तौर पर भूटान सदियों से भारत के निकट रहा है। भूटान और चीन के मध्य करीब 470 किलोमीटर लंबी सरहद है। चीन और भूटान की सरहद पर स्थित अनेक भूटानी इलाकों पर चीन अपना दावा करता रहा है। चीन-भूटान सरहद पर अनेक भूटानी क्षेत्रों में चीन ने सड़कों का निर्माण प्रारंभ कर दिया है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 में भूटान के डोकलाम क्षेत्र में चीन ने निर्माण कार्य शुरू किया था। डोकलाम एक पठारी इलाका है और यह सिक्किम के नजदीक स्थित एक ट्राई-जंक्शन बिंदु है। यहां से चीन की सरहद निकट है। डोकलाम भूटान का अभिन्न अंग है, जिसके पूर्व में सिक्किम स्थित है और पश्चिम में चीन की यदोंग काउंटी है। डोकलाम पर चीन अपना क्षेत्र होने का दावा पेश करता है। भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है। डोकलाम भारत के लिए सामरिक तौर से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों को देश से जोड़ने वाली 20 किलोमीटर चौड़ी कड़ी (चिकेंन नेक) पर चीन की पहुंच आसानी से हो जाएगी। डोकलाम में चीन के निर्माण कार्य का प्रबल प्रतिरोध भूटान और भारत द्वारा किया गया। छह महीनों तक भारतीय और चीनी सेनाएं एक दूसरे सामने डटी रही। आखिरकार डोकलाम विवाद को सुलझा लिया गया। भूटान और चीन के मध्य सहरदी क्षेत्रों में उपजे विवादों का निदान करने की खातिर कुनमिंग में दोनों देशों के उच्च अधिकारियों की 25 बैठकें हो चुकी हैं, किंतु अभी तक विवादों का कोई समुचित निदान नहीं निकल सका है।

आस्ट्रेलिया के प्रख्यात शोधकर्ता बार्नेट ने अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि की है कि चीन वस्तुतः भूटान की सरहद पर विवादित इलाकों में सड़कों का निर्माण करने साथ ही एक बड़ा रिहायशी गांव भी बसाने में जुटा हुआ है। ग्यालाफुग क्षेत्र में जो भूटान का इलाका है, वहां पर सैकड़ों की तादाद में चीनी नागरिक अपनी याकों के साथ आकर बसने लगे हैं। 1998 के भूटान-चीन के मध्य एक समझौते के तहत यह तय हुआ था कि विवादित इलाकों से चीन और भूटान काफी पीछे हट जाएंगे। चीन द्वारा इस समझौते का उल्लंघन शुरू कर दिया गया है। ग्यालाफुग क्षेत्र को तो वस्तुतः चीनी के नक्शों में भी भूटान का इलाका दर्शाया गया है। भूटान के साकटेंग क्षेत्र में स्थित वाइल्ड लाइफ रिजर्व इलाके पर भी चीन अपनी दावेदारी पेश कर रहा है, जबकि यह इलाका तो चीन और भूटान की सरहद पर भी विद्यमान नहीं है। भारत के पड़ोसी चीन का सीमा विवाद सिर्फ भारत और भूटान के साथ ही नहीं रहा है, बल्कि चीन के 16 पड़ोसी अन्य देशों के साथ भी चीन का सीमा विवाद बरकरार रहा है। एक तरफ रूस, जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, सिंगापुर, फिलीपींस, इंडोनेशिया, वियतनाम, ताइवान, मलेशिया, ब्रुनेई के साथ चीन का जल सीमा को लेकर विवाद जारी रहा है, वहीं भारत, भूटान, नेपाल, म्यांमार और मंगोलिया के साथ चीन का सरहदी इलाकों को लेकर विवाद चल रहा है।

जवाहरलाल नेहरू के साथ 1954 के पंचशील समझौते और मनमोहन सिंह के साथ 2013 में हुए समझौते और सहित भारत और चीन के बीच सात प्रमुख समझौते हो चुके हैं। मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार ने भी चीन के साथ संबंध बेहतर करने के लिए काफी प्रयास किए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग पिछले सात वर्षों के दौरान 18 बार मुलाकातें कर चुके हैं। इन दोनों की पहली मुलाकात 2014 में ब्राजील में हुई थी, जिसमें सीमा विवाद सुलझाने के लिए परस्पर वार्ताएं करने पर सहमति बनी, लेकिन वर्तमान में दोनों देशों के बीच जारी तनाव में मास्को समझौते के पश्चात कुछ शैथिल्य नजर आया है जबकि लद्दाख और पैंगोंग झील से दोनों देशों की सेनाएं काफी पीछे हट गई हैं, किंतु अभी तक अरुणाचलम के तवांग में सैन्य तनाव बरकरार है। तवांग अरुणाचल प्रदेश का क्षेत्र है, जिसे चीन तिब्बत का हिस्सा मानता है। 1914 में जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों के बीच समझौता हुआ था, तब अरुणाचल प्रदेश के तवांग को भारत का हिस्सा स्वीकार किया गया था। 1962 में भारत-चीन के युद्ध के पश्चात चीन तवांग से पीछे हट गया था। इतिहास के पन्नों से ज्ञात होता है कि चीन ने 1950 में तिब्बत पर आक्रमण करके उस पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। तिब्बत पर सैन्य आधिपत्य के पश्चात चीन वस्तुतः भारत का पड़ोसी देश बन गया। चीन के कठोर नियंत्रण के बाद वर्ष 1959 में तिब्बती आध्यात्मिक प्रमुख दलाई लामा ने अपने अनुयायिओं सहित भारत से शरण मांगी और हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस गए। इसके बाद चीन ने भारत पर तिब्बत और पूरे हिमालयी क्षेत्र में विस्तारवाद अंजाम देने के मनगढ़त आरोप चस्पा कर दिए। भारत और चीन के मध्य विद्यमान सरहद की लंबाई 3,488 किलोमीटर है, जो जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल से लगी हुई है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल अर्थात एलएसी एक तरह का सीमांकन है जो भारत के अधिकार वाले इलाके और चीन के नियंत्रण वाले हिस्से को एक दूसरे से अलग करती है। भारत के मुताबिक एलएसी की लंबाई 3,488 किलोमीटर है, जबकि चीन एलएसी को सिर्फ 2,000 किलोमीटर लंबी ही स्वीकार करता है। एलएसी पर अनेक ग्लेशियर, बर्फ के रेगिस्तान, पर्वत श्रंखाएं और नदियां मौजूद हैं।

दक्षिण चीन सागर और हिमालय क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी फितरत का मुकाबला करने के लिए क्वाडिलेटरल डॉयलाग (क्वाड) रणनीति का सृजन किया गया। क्वाड में जापान, आस्ट्रेलिया, अमेरिका और भारत सक्रिय हैं। क्वाड की सक्रियता से चीन की हुकूमत बेहद बौखलाई हुई। बांग्लादेश को क्वाड में शामिल नहीं होने देने के लिए चीन की हुकूमत कूटनीतिक दबाव कायम किए हुए है। मलेशिया आजकल चीन की पैरवी करने पर उतारू है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के साथ मिलकर मलेशिया पहले भी भारत का विरोधी देश बनने पर आमादा रहा है। वियतनाम और ताइवान ने यकीनन चीन के विस्तारवाद का डटकर मुकाबला किया है। दक्षिण एशिया उन तमाम मुल्कों को एकजुट होकर चीन के विस्तारवाद का प्रबल प्रतिरोध करना चाहिए, जिनके इलाकों पर चीन अपना जबरन दावा पेश करता रहा है। कोविड 19 के विश्वव्यापी संकट के लिए अमेरिका और अन्य अनेक देश चीन को गुनाहगार करार देते रहे हैं। चीन को विश्वपटल पर अलग-थलग किए बिना, चीन के आक्रामक विस्तारवाद को कोई समुचित निदान नहीं निकल सकेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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