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गौरीशंकर राजहंस का लेख : चीन को उचित जवाब जरूरी

चीन को कड़ा जवाब देना जरूरी है। भारत आर्थिक मोर्चे पर चीन को पछाड़ने की कोशिश कर रहा है। यदि हर भारतीय यह दृढ़ निश्चय कर ले कि वह वह चीनी सामान नहीं खरीदेगा तो चीन की रीढ़ ही टूट जाएगी। महात्मा गांधी ने भी अंग्रेजों को भारत से भागने के लिए तब लाचार कर दिया जब उन्होंने घर-घर में चरखा चलवाया और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करवाया। इसी प्रकार चीन की कमर भी टूट सकती है।

गौरीशंकर राजहंस का लेख : चीन को उचित जवाब जरूरी
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गौरीशंकर राजहंस

लेह का अचानक दौरा कर प्रधानमंत्री ने चीन ही नहीं सारे संसार को आश्चर्यचकित कर दिया। उन्होंने दो टूक यह ऐलान किया कि विस्तारवादी नहीं भूलें कि ऐसी ताकतें मिट जाती हैं। बिना हिटलर का नाम लिए प्रधानमंत्री ने कहा 20वीं शताब्दी में जिन लोगों ने विस्तारवादी तरीका अपनाया उन्हें सारे संसार ने कूड़ेदान में डाल दिया। प्रधानमंत्री ने कहा विस्तारवादी यह नहीं भूलें कि गत शताब्दी में जिन देशों ने ताकत के बल पर दूसरों की जमीन हड़पने की कोशिश की वे मिट गए। सही अर्थ में विस्तारवाद के दिन लद गए हैं और विस्तारवाद का स्थान विकासवाद ने ले लिया है। उन्होंने चीन को सख्त संदेश दिया कि लद्दाख भारत का मस्तक है और हमारे सैनिक बहादुर हैं, उनके इरादे मजबूत हैं और अपनी सीमा की रक्षा के लिए वे हसंते हंसते अपनी जान की बाजी लगा देते हैं।

सेना के जवानों को शाबाशी देते हुए उन्होंने कहा कि भारत तेजी से आधुनिकत हथियार विदेशों के खरीद रहा है। अभी हाल में रक्षा मंत्री जब रूस गए तब उन्होंने रूस की सरकार से आग्रह किया कि आधुनिकतम हथियारों की खरीद के लिए जो अनुबंधन किया गया है, उन हथियारों की आपूर्ति शीघ्रातिशीघ्र की जाए। यहां यह उल्लेखनीय है कि पुतिन इस बात के लिए तैयार हो गए हैं और चीन के विरोध के बावजूद भी वे आधुनिकतम हथियार शीघ्रातिशीघ्र भारत को मुहैया कराएंगे।

रूस सदा से भारत का परम मित्र रहा है। वह चीन का भी मित्र रहा है। परन्तु उसे चीन की नापाक हरकतों का ज्ञान अच्छी तरह से है। इसलिए चीन के लाख मना करने के बावजूद भी पुतिन भारतीय सेना को आधुनिक अस्त्र-शस्त्र शीघ्रातिशीघ्र देने को तैयार हो गए हंै।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत सुरक्षा के लिए जल, थल और नभ में अपनी शक्ति बढ़ा रहा है और अपनी सेनाओं के लिए आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण जोरों से करने के साथ साथ जरूरी आयात भी कर रहा है। सीमा प्रबंधन पर खर्च तीन गुणा बढ़ा दिया गया है तथा ढांचागत विकास जैसे सड़कें और पुल बनाने का काम जोरों पर है। इसके बाद प्रधानमंत्री उस अस्पताल में भी गए जहां गत 15 जून को भारत-चीनी सैनिकों के बीच संघर्ष में हुए घायल भारतीय सैनिकों का इलाज चल रहा है। प्रधानमंत्री ने घायल सैनिकों का मनोबल बढ़ाते हुए कहा कि आप के इरादे पर्वतों की चोटी से भी उंचे और बुलन्द हैं। देश का हर नागरिक आपके त्याग और बलिदान को याद कर उसे सराहता रहता है।

लद्दाख जाकर प्रधानमंत्री ने सैनिकों का मनोबल जिस तरह बढ़ाया उसे सारे देश ने सराहा है। यह अत्यन्त दुर्भाग्य की बात है कि इस मौके पर कुछ विपक्षी नेता प्रधानमंत्री की आलोचना कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह हुई कि प्रधानमंत्री ने संसार के अतिधकतर देशों को भारत के पक्ष में कर लिया। सभी चीन की आलोचना कर रहे हैं। संसार के अधिकतर देश प्रधानमंत्री के साथ हैं। सीमा पर अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित जवान दिन रात चीन की चालबाजियों को विफल करने में लगे हुए हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत किसी भी हालत में दुश्मन को अपनी एक ईंच जमीन भी हड़पने नहीं देगा।

दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे अधिकतर नेता चीन के इतिहास के बारे में नहीं जानते हैं। चीन हमेशा से विस्तारवादी देश रहा है। 1949 में जब चीन को आजादी मिली तब उसने पहला काम यह किया कि तिब्बत को हड़प लिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई के मित्र थे। उन्होंने चीन के इस काम का विरोध किया। चाउ-एन- लाई ने उन्हें भरोसा दिलाया कि तिब्बत की स्वतंत्रता अक्षुण रहेगी और चीन की सरकार इसमेें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी। परन्तु चीन ने देखते ही देखते सारे बौद्व मठों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया और दलाई लामा को कैद कर बिजींग ले जाने की योजना बनाने लगे। जब दलाई लामा के गुप्तचरों ने उन्हें इसकी सूचना दी तो दलाई लामा अपने सैंकड़ों समर्थकों के साथ भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए। जहां पंडित नेहरू ने उन्हें राजनीतिक शरण दे दी। इस बात से चीन बहुत खफा हो गया और उसने भारत को चेतावनी दी कि दलाई लामा को चीन के हवाले किया जाए। परन्तु भारत इस पर तैयार नहीं हुआ और 1962 में दोस्ती की आड़ में चीन ने भारत पर चढ़ाई कर दी। भारत उस समय लड़ाई के लिए तैयार नहीं था। भारत सरकार समझ गई कि चीन जो हिन्द-चीनी भाई-भाई का नारा दे रहा था वह ढोंग था और दोस्ती के नाम पर उसने पीठ में छूरा भोंक दिया।

देंग के समय में भारत-चीन के संबंधों में थोड़ा सुधार हुआ। फैसला हुआ कि दोनों देशों के सुरक्षा विशेषज्ञ मिल बैठकर सीमा के मसले पर फैसला करेंगे। अनगिनत बैठकें हुई और कोई नतीजा नहीं निकला। देंग के बाद चीन में जब शी-जिन-पिंग सत्ता में आए तो उन्होंने उपर से भारत से दोस्ती का ढोंग किया और अन्दर खाते पाकिस्तान से दोस्ती कर भारत को तबाह करने की योजना बनाने लगे। अभी हाल में जिस तरह चीनी सैनिकों ने गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर धोखे से वार किया। उससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समझ गए कि चीन दोस्त के रूप में दुश्मन है। उन्होंने लद्दाख जाकर सैनिकों का जो मनोबल बढ़ाया उसकी प्रशंसा न केवल भारत में हुई बल्कि सारी दुनिया कर रही है।

भारत आर्थिक मोर्चे पर चीन को पछाड़ने की कोशिश कर रहा है। यदि हर भारतीय यह दृढ़ निश्चय कर ले कि वह वह चीनी सामान नहीं खरिदेगा तो चीन की रीढ़ ही टूट जाएगी। महात्मा गांधी ने भी अंग्रेजों को भागने के लिए तब लाचार कर दिया जब उन्होंने घर घर में चरखा चलवाया और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करवाया। इसी प्रकार चीन की कमर तभी टूट सकती है। भारत में जगह जगह चीन के सामान को जलाकर होली जलाई जा रही है। चीन की दगाबाजी के कारण भारतीय जनमानस के दिल में रोष है। 1962 में जब चीन ने भारत पर चढ़ाई की थी तो पूरा देश एक हो गया था। यहां तक कि महिलाओं ने अपने जेवर-गहने भी सरकार को दे दिए थे। परन्तु इस बार जो कुछ विपक्षी सरकार की आलोचना कर रहे हैं उसे भारत की जनता पसन्द नहीं कर रही है। समय आ गया पूरा देश एक होकर चीन का मुकाबला करें। चीन विस्तारवादी और परम धोखेबाज है। वह बातों में भारत के नेताओं को उलझाए रखना चाहता है। परन्तु सतर्क रहना आवश्यक है। कहावत है दूध का जला छाछ भी फंूक मारकर पीता है। भारत के लड़ाकू विमान सीमा पर गश्त लगा रहे हैं और अब राफेल भी आने वाले हैं। आशा की जानी चाहिए कि चीन को सद्गति आएगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हर भारतीय को चीन और पाकिस्तान के नापाम गठबंधन को ध्वस्त करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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