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पाकिस्तान परस्त चीन से कैसे निपटे भारत

यह पहली बार नहीं है जब चीन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान में छिपे बैठे आतंकी सरगना का बचाव किया है।

पाकिस्तान परस्त चीन से कैसे निपटे भारत
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भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यही उठ खड़ा हुआ है कि वह पाक परस्त चीन से कैसे निपटे। एक सीमा पार से आतंकवादी भेजकर नित नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है तो दूसरा उसे और उसके आतंकी आकाओं को बचाने की बेशर्म कोशिशें कर रहा है। यह पहली बार नहीं है जब चीन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान में छिपे बैठे आतंकी सरगना का बचाव किया है। इससे पहले भी वह इस तरह की हिमाकत कई बार कर चुका है।
एनएसजी की सदस्यता को लेकर भारत की दावेदारी में अड़ंगा लगाने के बाद चीन ने अब संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को आतंकी घोषित कराने की भारत की मुहिम को बड़ा झटका दिया है। चीन के उप विदेश मंत्री ली बाडोंग ने तो भारत को यह नसीहत तक दे डाली है कि वह राजनीतिक फायदे के लिए इस तरह की मुहिम नहीं छेड़े। चीन ऐसी किसी मुहिम का हिस्सा नहीं बनेगा।
उनका कहना है कि काउंटर टेरेरिज्म के नाम पर कोई देश राजनीतिक फायदा नहीं उठा सकता। पंद्रह सदस्यीय सुरक्षा परिषद के चौदह देश भारत के साथ हैं, परन्तु चीन ने इस मुद्दे पर एक बार फिर पाकिस्तान के हितों की रक्षा करते हुए भारत की कोशिशों को पलीता लगाने का काम कर दिया है। पाकिस्तान इस कारण से मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने के खिलाफ है, क्योंकि ऐसा होते ही बाकी देशों के साथ-साथ पाक को भी उस पर पाबंदी लगानी होगी।
चीन सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और वीटो पावर का इस्तेमाल कर वह किसी भी मुहिम को रोक सकता है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है। छह महीने पहले तकनीकी आधार पर चीन ने इसमें अडं़गा लगाया था। कुछ दिन पहले उसने फिर तीन महीने का समय मांगा था ताकि बाकी सदस्य देशों को और समय मिल सके, लेकिन अंतत: उसने वीटो का प्रयोग कर पाकिस्तान के हितों की रक्षा करके आतंकवाद पर अपने दोहरे रवैये का परिचय दे दिया।
अच्छे और बुरे आतंकवाद में फर्क करने के इसी तौर तरीके की भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से कड़ी आलोचना कर चुका है, परन्तु ऐसा लगता है कि न पाकिस्तान पर इसका कोई असर है और न चीन पर। चीन का भारत के साथ सौ अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार है। भारत जब चाहे, उसे बड़ा झटका दे सकता है, लेकिन इससे केवल चीन को ही एकतरफा नुकसान नहीं होगा।
इससे कई तरह से गलत संदेश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच जाएंगे, जो भविष्य की दीर्घकालिक योजनाओं की दृष्टि से नुकसानदेह हो सकते हैं, इसलिए भारत को बहुत सोच विचारकर इस मामले में कदम उठाने होंगे। चीन को भी अहसास है कि उसकी इन अड़ंगेबाजियों से भारत नाखुश है, परन्तु वह यह भी जानता है कि भारत की ओर से कोई ऐसा कड़ा फैसला नहीं होगा, जिससे दोनों देशों के रिश्तों पर बुरा असर पड़े।
आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान भले ही विश्व में अलग-थलग पड़ चुका है, चीन फिर भी उसके साथ मजबूती से खड़ा नजर आ रहा है। इसकी वजह यही है कि चीन के कई बड़े प्रोजेक्ट गिलगित-पीओके, बलूचिस्तान आदि में चल रहे हैं, जिनके जरिये वह खाड़ी के अलावा यूरोपीय देशों तक अपनी आसान व्यापारिक पहुंच कायम करना चाहता है। अमेरिका चूंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत के नजदीक आ चुका है, इसलिए पाकिस्तान अब चीन और रूस के करीब होकर अपना शक्ति संतुलन साधना चाहता है।
चीन के भारत के साथ खट्टे-मीठे रिश्ते रहे हैं। एक दौर था, जब हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगते थे। इसके बाद 1962 की जंग हुई, जिसमें भारत को पराजय झेलनी पड़ी। हाल के वर्षों में दोनों देशों ने व्यापार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाकर आगे की ओर देखने का निर्णय लिया, परन्तु पाक को प्र्शय देने के चक्कर में चीन कुछ ऐसे फैसले कर रहा है, जिससे भारतीय हितों को चोट पहुंच रही है।
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