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गौरीशंकर राजहंस का लेख: चीन की विस्तारवादी नीति

माओ-त्से-तुंग चाहते थे कि चीन के साथ खासकर तिब्बत के साथ भारत का जो भूभाग लगा है उसके अतिरिक्त नेपाल, भूटान और म्यांमार को भी हड़प लिया जाए। माओ-त्सें-तुंग पूरी तरह विस्तारवादी थे। उन्हीं के पदचिह्नों पर चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी चिनफिंग विस्तारवादी हैं और पड़ोसियों की जमीन हथियाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। उन्होंने कई पड़ोसी देशों की जमीन को हड़पा, परन्तु वियतनामी फौज ने उन्हें नाकों चने चबवा दिए।

गौरीशंकर राजहंस का लेख:  चीन की विस्तारवादी नीति
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गौरीशंकर राजहंस

उचित तो यह था कि चीन के इतिहास को भारत के माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को पढ़ाया जाता, जिससे चीनियों के स्वभाव का परिचय भारतवासियों को अच्छी तरह से हो जाता। अभी हाल में पूर्वी लद्दाख में स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन के बीच तनाव जारी है। दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है। बहुत अधिक उम्मीद है कि दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच एक बार वार्ता फिर से हो।

पिछले कई दौर की बातचीत में दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच कोई परिणाम नहीं निकला। चीन ने वायदा किया था कि भारत और चीन दोनों तरफ की सेनाएं कई किलेामीटर पीछे हट जाएंगी। परन्तु चीन ने अपना वायदा नहीं निभाया जबकि भारत की सेना पीछे हट गई। पहले भी ऐसा हो चुका है कि चीन अपने वायदे पर कायम नहीं रहता है और कोई न कोई बहाना करके लाइन आफ एक्चुएल कंट्रोल पर दिन रात सेना की तैनाती बढ़ाता रहता है। इस बार भारतीय सेना प्रमुख विपिन रावत ने दो टूक कह दिया कि यदि चीन अपने वायदे से मुकर गया और उसने अपनी सेना पीछे नहीं हटाई तो भारत के लिए सैन्य विकल्प खुला हुआ है। इधर अगले कुछ महीनों में कडाके की ठंड शुरू हो जाएगी और उसके लिए भारतीय सेना को तैयार रहना होगा। चीन बार-बार कह रहा है कि उसकी सेना पीछे हट रही है। परन्तु यह सच्चाई से कोसों दूर है। शायद इसी कारण आजीज होकर सेनाओं के प्रमुख विपिन रावत ने कहा कि स्थिति से निपटने के लिए सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला है। परन्तु इस विकल्प को तब प्रयोग में लाया जाएगा जब कूटनीतिक तरीके से इसका कोई समाधान नहीं निकलता। जनरल विपिन रावत के इस बयान से चीन में खलबली मच गई है। भारत के विदेश मंत्रालय में इस बात से बहुत निराशा है कि चीन रह रहकर अपने वायदे से पीछे हट जाता है।

सच कहा जाए तो यह चीन की आदत ही है। 1949 में जब चीन में माओ-त्से-तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी सरकार आई, तभी से उसने यह प्रयास करना शुरू कर दिया कि किसी तरह दूसरे देशों के आसपास के क्षेत्र को हड़पा जाए। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक भयानक गलती कर दी। उन्होंने चीन के प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई की बातों पर विश्वास कर लिया। जैसे ही चाउ एन लाई अपनी भारत यात्रा से चीन लौटे, चीन ने तिब्बत को हड़प लिया। तिब्बत सदियों से एक स्वतंत्र देश रहा है और वह एक तरह से भारत का उपनिवेश ही था। वहां भारत की सेना तैनात थी, भारत की पुलिस तैनात थी और भारत की मुद्रा का तिब्बत में चलन था और विदेशी मामलों में तिब्बत पूरी तरह भारत पर निर्भर था। जैसे ही नेहरू को यह बात पता चली तो उन्होंने चाउ एन लाई से बात की तो चाउ-एन-लाई ने कहा कि तिब्बत पूरी तरह स्वतंत्र रहेगा और चीन उसके मामलों में दखलदांजी नहीं करेगा, लेकिन चीन अपनी बातों से मुकर गया और चीन ने धड़ाधड़ तिब्बती बौद्व मठों को नेस्तनाबूद करना शुरू कर दिया। इस बीच दलाई लामा के जासूसों ने दलाई लामा को बताया कि साम्यवादी सरकार उन्हें गिरफ्तार कर बिजींग ले जाना चाहती है। जैसे ही दलाई लामा को इस बात की प्रमाणिक सूचना मिली तो वे रातों रात अपने सैंकड़ों समर्थकों के साथ खच्चर और घोड़ों पर बैठकर तिब्बत की सीमा से भारत में प्रवेश कर गए। भारत आने पर पंडित नेहरू ने उन्हें राजनीतिक शरण दे दी। इससे चीन की साम्यवादी सरकार बहुत नाराज हो गई और उसने मांग की कि दलाई लामा को चीन के हवाले कर दिया जाए। परन्तु नेहरू इसके लिए तैयार नहीं हुए और अन्त में चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया जिसमें भारत को बड़ी शर्मिन्दगी के साथ मुंह की खानी पड़ी।

चीन की धोखेबाजी के कारण ही पंडित नेहरू की अकाल मौत हो गई। उसके बाद भारत और चीन के संबंध अत्यन्त ही कटु रहे। बाद में जब राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री बने तब दोनों देशों के बीच सामान्य संबंध स्थापित हुए और दोनों देशों के नेताओं ने तय किया कि दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी बैठकर भारत और चीन की सीमा का निर्धारण करेंगे। परन्तु कई दौर की बैठकें हुई और सीमा निर्धारण नहीं हो पाया।

माओ-त्से-तुंग विस्तारवादी थे। उसके पहले के चीन के नेता भी विस्तारवादी थे। परन्तु भारत के नेता चीन की असली नियत को भांप नहीं पाए। माओ-त्से-तुंग चाहते थे कि चीन के साथ खास कर तिब्बत के साथ भारत का जो भूभाग लगा है उसके अतिरिक्त नेपाल, भूटान और म्यांमार को भी हड़प लिया जाए। माओ-त्सें-तुंग पूरी तरह विस्तारवादी थे। उन्हीं के पदचिह्नों पर चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग विस्तारवादी हैं और पड़ोसियों की जमीन हथियाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। उन्होंने कई पड़ोसी देशों की जमीन को हड़पा। परन्तु जब वे वियतनाम की जमीन हथियाना चाहते थे तो वियतनामी फौज ने उन्हें नाकों चने चबा दिए और लाचार होकर चीन की फौज को वापस हटना पड़ा।

भारत के साथ ही चीन का मुकाबला डोकलाम में हुआ और दोनों देशों की सेना आमने सामने डटी रही और अन्त में चीन की फौज को पीछे हटना पड़ा। इस बीच चीन ने पाकिस्तान से अपने संबंध मजबूत कर लिए और पाकिस्तान को भड़का कर चीन आए दिन भारत में आतंकी हरकतें करवाता रहता है। चीन और पाकिस्तान का गठबंधन निश्चित रूप से भारत के लिए एक तरह से खतरे की घंटी है। यह प्रसन्नता की बात है कि अमेरिका, कनाड़ा और जापान जैसे देश भारत के साथ खड़े हैं। चीन इस बात को अच्छी तरह जानता है कि यदि युद्व की नौबत आई तो चीनी सेना भारतीय सेना के सामने टिक नहीं पाएंगी। इसीलिए चीन के नेताओं ने हाल में ऐसे बयान दिए जिससे यह साबित हो कि चीन भारत से मित्रवत्ा संबंध रखना चाहता है। परन्तु चीन की नियत पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। अब समय आ गया कि हर भारतवासी चीन और पाकिस्तान के नापाक गठबंधन का खुलकर विरोध करे। अब तो यह मानकर चलना चाहिए कि न तो पाकिस्तान और न ही चीन भारत का मित्र हो सकता है। इसलिए भारत को हर घड़ी अपनी सैन्य ताकत मजबूत रखनी चाहिए। जब से राफेल लड़ाकू विमान फ्रांस से भारत आया है चीन तिलमिला रहा है। पाकिस्तान तो पहले से ही भारत के खिलाफ था। यह मानकर चलना चाहिए कि भारत को नीचा दिखाने के लिए चीन और पाकिस्तान अपनी हरकतें जारी रखेंगे। ऐसी हालत में हर भारतवासी को खुले दिल से सरकार का साथ देना चाहिए।

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