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डॉ. उमेश प्रताप वत्स का लेख : आमने-सामने चीन और अमेरिका

चीन का मानना है कि अमेरिका ताइवान में अलगाववादी एजेंडे पर काम कर रहा है, जिसे नैन्सी पेलोसी की यात्रा से बल मिल सकता है। यद्यपि ताइवान को चीन अपनी मुख्य भूमि का हिस्सा बताता रहा है और पेलोसी की वहां जाने की कथित योजना से वह भड़का हुआ है। पेलोसी की प्रस्तावित यात्रा पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने अमेरिकी समकक्ष जो बाइडन को पिछले बृहस्पतिवार को फोन पर बातचीत में चेतावनी देते हुए कहा था कि जो लोग आग से खेलते हैं वे इससे नष्ट हो जाएंगे।

डॉ. उमेश प्रताप वत्स का लेख : आमने-सामने चीन और अमेरिका
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डॉ. उमेश प्रताप वत्स 

डॉ उमेश प्रताप वत्स

चीन की परिणाम भुगतने की चेतावनी को दरकिनार करते हुए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी का विमान असमंजस की स्थिति को बरकरार रखता हुआ मंगलवार को जैसे ही ताइवान के एयरपोर्ट पर लैंड हुआ चीन का पारा भी सातवें आसमान पर पहुंच गया।

पच्चीस वर्षों में अमेरिका के किसी भी चुने गए उच्च अधिकारी की ताइवान में यह पहली यात्रा थी। चीन का मानना है कि अमेरिका ताइवान में अलगाववादी एजेंडे पर काम कर रहा है, जिसे नैन्सी पेलोसी की यात्रा से बल मिल सकता है। यद्यपि ताइवान को चीन अपनी मुख्य भूमि का हिस्सा बताता रहा है और पेलोसी की वहां जाने की कथित योजना से वह भड़का हुआ है। पेलोसी की प्रस्तावित यात्रा पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने अमेरिकी समकक्ष जो बाइडन को पिछले बृहस्पतिवार को फोन पर बातचीत में चेतावनी देते हुए कहा था कि जो लोग आग से खेलते हैं वे इससे नष्ट हो जाएंगे।

पड़ोसी देशों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए बहुत ही सधी हुई कूटनीति का प्रयोग किया जाता है किंतु चीन जिस प्रकार हथियारों की एक बड़ी खेप एवं आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने के अहंकार में हर पड़ोसी देश को घुड़की देता रहता है, यह कमजोर कूटनीति की अनुभूति कराता है। इतिहास साक्षी है कि तिब्बत को दक्षिण में नेपाल से भी कई बार युद्ध करना पड़ा और नेपाल ने इसको हराया। नेपाल और तिब्बत की सन्धि के मुताबिक तिब्बत द्वारा हर साल नेपाल को पांच हजार नेपाली रुपये हर्जाना भरना पड़ा। इस हर्जाने से बचने के लिए चीन से सहायता मांगी। चीन की सहायता से उसने नेपाल से तो छुटकारा पा लिया किन्तु इसके बाद 1906 ई. में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। 14वें दलाई लामा ने 1940 ई. में शासन भार संभाला। इधर चीन में अक्टूबर 1949 में एक गृहयुद्ध में च्यांग काई-शेक के कुओमिनतांग राष्ट्रवादियों को हराने के बाद माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने बीजिंग की सत्ता पर कब्जा कर लिया।

23 मई 1951 को चीन ने तिब्‍बत पर कब्‍जा कर लिया था, जिसमें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने भी समर्थन किया, जिसका भुगतान आजतक करना पड़ रहा है। हिमालय पार का चीन अब तिब्बत लेनेे के बाद हमारे सिर पर आकर बैठ गया है। भारत और तिब्‍बत में इसे काला दिन कहा जाता है। वास्तव में इसी दिन तिब्बत ने चीन के दबाव में आकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था, जिसके बाद तिब्बत पर चीन का कब्जा हो गया।

1951 से भूमि सुधार कानून एवं दलाई लामा के अधिकारों में हस्तक्षेप एवं कटौती होने के कारण असंतोष की आग सुलगने लगी जो क्रमश: 1956 एवं 1959 ई. में जोरों से भड़क उठी। परन्तु माओत्से तुंग के बल प्रयोग द्वारा चीन ने इसे दबा दिया। तिब्बत पर चीन के अवैध कब्जे से वहां के लोगों में चीन के खिलाफ गुस्सा बढ़ने लगा। 1959 में राजधानी ल्हासा में हुए पहले हिंसक विरोध प्रदर्शनों को चीन ने सैन्य कार्रवाई से बेरहमी से कुचल दिया, जिसमें हजारों तिब्बतियों की जान चली गई। अत्याचारों, हत्याओं आदि से किसी प्रकार बचकर दलाई लामा नेपाल पहुंच सके। अभी वे भारत में रहकर चीन से तिब्बत को अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। श्रीलंका का ताजा उदाहरण पूरा विश्व देख रहा है जो चीन के कर्ज में कंगाली तक पहुंच गया है।

भारत की हजारों किलोमीटर की सीमा चीन से लगती है। भारत का प्राचीन इतिहास रहा है कि वह किसी पर जल्दी आक्रमण नहीं करता। इस नीति को भारत की कमजोरी समझ शी जिनपिंग की सरकार आए दिन भारत से सीमा पर झगड़ा कर दबाव बनाने का असफल प्रयास करती है। अभी हाल ही में औचक दौरे पर भारत आए चीन के विदेश मंत्री वांग यी से विदेशमंत्री जयशंकर की तीन घंटे चर्चा चली जो कि दोनों देशों के आपसी रिश्तों पर ही केंद्रित रही।

मई और जून 2020 में दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीमा पर कई इलाकों में झड़प हुई थी। 15 जून को लद्दाख की गल्वान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक मुठभेड़ हुई जिसमें भारतीय सेना के कम से 20 सिपाही मारे गए और चीन के 40 से भी अधिक, जिसे वह मानने को तैयार नहीं है। इस घटना के बाद जल्द ही दोनों देशों ने सीमा पर भारी संख्या में सेना तैनात कर दी और दोनों देश लगभग युद्ध के मुहाने तक पहुंच गए।

वर्तमान में नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा से सात दशकों से चल रहा चीन-ताइवान विवाद, एक बार फिर बढ़ गया। पिछले 70 वर्षों से चीन को ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका के विरोध का सामना झेलना पड़ा है। चीन का सदैव यह दावा रहा है कि ताइवान उसी का हिस्सा है, जबकि ताइवान खुद को एक अलग स्वतंत्र देश मानता है। ताइवान को अमेरिका का समर्थन मिलने के बाद चीन ताइवान से और चिढ़ गया है। चीन इसे अपनी संप्रभुता पर अमेरिकी हमले की तरह देखता है किंतु विश्व बिरादरी में चीन के इस रवैये को एक-आध देश को छोड़कर समर्थन नहीं मिल रहा है।

चीन ने अमेरिका को चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका की संसद अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी ताइवान गईं, तो अमेरिका इसकी कीमत चुकाएगा। चीन ने इस तनाव के बीच टैंक और अन्य हथियारों की तैनाती की है, जिसके वीडियो वायरल हो रहे हैं। ताइवान के प्रधानमंत्री सु त्सेंग चांग के अनुसार अमेरिकी संसद की अध्यक्षा नैन्सी पेलोसी का ताइवान ने चीन की गीदड़-भभकियों को अनदेखा कर जबरदस्त स्वागत किया जिससे चीन के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है।

जनवरी 2019 में भी शी जिनपिंग ने चेतावनी दी थी कि चीन और ताइवान का एकीकरण अपरिहार्य है इसे कोई रोक नहीं सकता। 2021 में अमेरिका-चीन तनाव के कारण चीनी सैन्य जेट ने ताइवान के रक्षा क्षेत्र में सैकड़ों बार घुसपैठ किया था। अक्टूबर में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है तो संयुक्त राज्य अमेरिका ताइवान की रक्षा करेगा। 23 मई को बाइडेन ने पश्चिम से यूक्रेन पर रूस के खिलाफ मजबूती से खड़े होने के लिए चीन द्वारा ताइवान को बलपूर्वक लेने की कोशिश करने पर एेतराज किया और दोहराया कि अमेरिका आक्रमण की स्थिति में ताइवान की रक्षा करेगा। 2 अगस्त को संसद अध्यक्षा नैंसी पेलोसी एशियाई दौरे के दौरान ताइवान में चीनी धमकियों को नजरअंदाज करते हुए पहुंची। पेलोसी का कहना है कि उनकी यात्रा ताइवान के प्रति वाशिंगटन की मजबूत प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करती है। नैंसी पेलोसी की यात्रा के वक्त चीन के 21 लड़ाकू विमान ताइवान के एयर डिफेंस जोन में घुसे।

दोनों देश विश्व का सरताज बनना चाहते हैं। यद्यपि अमेरिका तो पहले से ही सरताज बना हुआ था जबकि चीन की लगातार बढ़ती शक्ति उसे चुनौती दे रही है। चीन को विश्व का सिरमौर बनने की इतनी जल्दी है कि इसके लिए वह पूरे विश्व को युद्ध में झोंकने से भी नहीं हिचकेगा। अब लगता है कि इन गैर जिम्मेदाराना देशों के कारण तीसरा विश्वयुद्ध मुहाने ही खड़ा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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