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प्रभात कुमार रॉय का लेख : ताइवान पर चीन की आक्रामकता

चीन सरकार ताइवान को अपना एक प्रांत करार देती है और ताइवान को चीन के साथ एकीकृत करने का संकल्प दोहराती है। चीनी हुकूमत ने एकीकरण के लिए ताइवान के समक्ष एक राष्ट्र और दो राजनीतिक व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव भी रखा। इस प्रस्ताव को ताइवान सरकार ने ठुकरा दिया। ताइवान के नागरिक तो अब स्वयं को चीनी नहीं ताइवानी कहलाना अधिक पसंद करते हैं। स्वतंत्र और जनतांत्रिक देश बने रहने के लिए ताइवान कटिबद्ध है। चीनी हुकूमत शांतिपूर्ण तौर पर ताइवान को चीन के साथ एकीकृत करने की पेशकश करती है, किंतु ताइवान को चीन के साथ एकीकृत करने के लिए आक्रमणकारी सैन्य विकल्प से कदापि इनकार नहीं करती।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : ताइवान पर चीन की आक्रामकता
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और रिपब्लिक ऑफ चाइना (ताइवान) आजकल द्वंदात्मक सैन्य तनाव में उलझे हुए हैं। यक्ष प्रश्न है कि क्या चीन और ताइवान के मध्य जारी यह विकट सैन्य तनाव महायुद्ध में बदल सकता है? क्योंकि ऐतिहासिक तौर पर चीन द्वारा ताइवान पर किसी भी सैन्य आक्रमण की स्थिति में अमेरिका के नेतृत्व में नॉटो राष्ट्र ताइवान की हिफाजत करने के लिए कटिबद्ध रहे हैं। क्या ताइवान की प्रतिरक्षा करने के अपने ऐतिहासिक संकल्प को अमेरिका भविष्य में निभाएगा? क्या अमेरिका ताइवान को चीन के रहम ओ करम पर छोड़ देगा?

चीन सरकार ताइवान को अपना एक प्रांत करार देती है और ताइवान को चीन के साथ एकीकृत करने का संकल्प दोहराती है। चीनी हुकूमत ने एकीकरण के लिए ताइवान के समक्ष एक राष्ट्र और दो राजनीतिक व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव भी रखा। इस प्रस्ताव को ताइवान सरकार ने ठुकरा दिया। ताइवान के नागरिक तो अब स्वयं को चीनी नहीं ताइवानी कहलाना अधिक पसंद करते हैं। स्वतंत्र और जनतांत्रिक देश बने रहने के लिए ताइवान कटिबद्ध है। चीनी हुकूमत शांतिपूर्ण तौर पर ताइवान को चीन के साथ एकीकृत करने की पेशकश करती है, किंतु साथ ही ताइवान को चीन के साथ एकीकृत करने के लिए आक्रमणकारी सैन्य विकल्प से कदापि इनकार नहीं करती। विगत एक वर्ष से चीनी हुकूमत द्वारा ताइवान के विरुद्ध सैन्य तौर पर एक आक्रमक रुख अख्त्यार करने का प्रदर्शन किया जा रहा है। सैन्य अभ्यास करने के नकाब में चीन वायुसेना ताइवान के वायु क्षेत्र का प्रायः अतिक्रमण करती है। इस वर्ष एक, दो और तीन अक्तूबर को चीनी वायु सेना के तकरीबन अस्सी लड़ाकू विमानों से जिनमें एच-6 बमवर्षक विमान और जे-16 फाइटर जेट ताइवान के वायु क्षेत्र में अतिक्रमण किया। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1950 से एक अक्तूबर को साम्यवादी क्रांति संपन्न होने के उपलक्ष्य में चीन में राष्ट्रीय समारोह का आयोजन किया जाता है। इसमें चीन सरकार सैन्य और आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करती है।

ताइवान हुकूमत ने एक से तीन अक्तूबर तक किए चीनी वायुसेना के अतिक्रमण को अभी तक का सबसे खतरनाक और गंभीर अतिक्रमण करार दिया है। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि अतिक्रमण के विरोध में ताइवान वायुसेना के फाइटर जेटों ने भी रक्षात्मक उड़ान भरी, किंतु दोनों देशों के लड़ाकू विमानों का आमना-सामना नहीं हो सका। उल्लेखनीय है कि चीन की वायुसेना के बेड़े में 1500 फाइटर जेट और 500 बमवर्षक विमान हैं, जबकि ताइवान की वायुसेना में 450 फाइटर जेट हैं और कोई बमवर्षक विमान नहीं है। वस्तुतः चीन और ताइवान के मध्य सैन्य शक्ति की कोई तुलना नहीं है। ताइवान के साथ अमेरिका और नाटो राष्ट्रों की सैन्य शक्ति निरंतर खड़ी रही हैं। वर्ष 1949 से ही चीनी हुकूमत ने ताइवान के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया, जबकि साम्यवादियों द्वारा पराजित हुए जनरल चांग काई शेक ने चीन से दो हजार किलोमीटर दूर पर ताइवान द्वीप पर सैन्य शासन स्थापित किया। वर्ष 1949 में चीन की लालफौज़ के पास नेवल शक्ति नहीं थी कि ताइवान पर कब्जा कर पाती।

ताइवान के इतिहास पर एक संक्षिप्त दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि ताइवान वर्ष 1624 से 1661 तक डच आधिपत्य में रहा। वर्ष 1895 में जापान और चीन के बीच प्रथम युद्ध में जापान ने ताइवान पर कब्जा कर लिया जो 1945 तक जारी रहा। शीतयुद्ध के उस दौर में 1949-79 तक अमेरिका और यूरोप के नॉटो देश, रिपब्लिक ऑफ चीन (ताइवान) को ही के तौर पर कूटनीतिक मान्यता देते रहे। विश्व पटल पर वर्ष 1971 से कूटनीतिक हालात शनैः शनैः बदलने लगे, जबकि अमेरिकन कूटनीतिज्ञ हैनरी किसिंगर की सलाह पर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कम्युनिस्ट चीन की कूटनीतिक यात्रा की। शीतयुद्ध का विकट दौर में सोवियत संघ के साम्यवादी गुट को कमजोर करने के लिए कामरेड माओ के कम्युनिस्ट चीन को अपने खेमे में लाने की खातिर अमेरिका के नेतृत्व में नॉटो देशों ने 25 अक्तूबर वर्ष 1971 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चीन अर्थात कम्युनिस्ट चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य के तौर पर मनोनीत कराया और रिपब्लिक ऑफ चीन अर्थात ताइवान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से बरखास्त कर दिया गया। 1979 में अमेरिका और यूरोप के नाटो राष्ट्र द्वारा कम्युनिस्ट चीन को कूटनीतिक मान्यता प्रदान कर दी।

चीनी हुकूमत ने सदैव चीन राष्ट्र की कूटनीति पर अत्यंत कठोरता के साथ अमल किया। अतः चीनी हुकूमत के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करने वाले मुल्कों को ताइवान से अपने कूटनीतिक संबंध समाप्त करने होते हैं। चीनी हुकूमत विश्व पटल पर केवल एक चीन के अस्तित्व में होने का दावा करती रही है, किंतु हकीक़त में विगत 72 वर्षों से पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और रिपब्लिक ऑफ चाइना (ताइवान) नाम के दो चीनी राष्ट्र अस्तित्व में रहे हैं। कूटनीतिक तौर पर ताइवान के साथ केवल तीन देशों के कूटनीतिक संबंध स्थापित हैं, जो क्रमशः हैती, पैरागुवे और एल सल्वाडोर हैं, किंतु तकरीबन अस्सी देशों के साथ जिनमें भारत भी शामिल है। ताइवान के प्रगाढ़ व्यापारिक संबंध हैं। वर्ष 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की लुक ईस्ट पालिसी के तहत भारत-ताइवान मैत्री संगठन की स्थापना की और व्यापारिक संबंधों का आग़ाज़ किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईस्ट एक्ट पालिसी के तहत 14 दिसंबर 2020 को भारत और ताइवान के मध्य एक बड़ा व्यापारिक समझौता हुआ तो चीन का बयान आया कि भारत आग से खेल रहा है। भारत ने चीन की परवाह किए बिना ताइवान के साथ प्रबल व्यापारिक संबंध को कायम बनाए रखा है। अतः विश्वपटल पर ताइवान कोई अलग थलग राष्ट्र नहीं है, वरन संप्रभुता संपन्न स्वत्रंत्र राष्ट्र है।

भारत के पक्ष में ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन अपने तेजस्वी विचार सदैव प्रकट करती है। भारत को भी कूटनीतिक तौर पर ताइवान के पक्ष में खुलकर बोलना और खड़ा होना चाहिए. एशिया के देशों का दायित्व है कि ताइवान की चीनी आक्रामकता से हिफाज़त करने के लिए से क्वाड को शक्तिशाली बनाएं। वियतनाम, फिलीपींस, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया आदि देशों को भी क्वाड में शामिल किया जाना चाहिए। चीन की आक्रमकता से ताइवान की हिफाजत के लिए केवल अमेरिका व नाटो देशाें पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, क्योंकि ऑकस के कारण अमेरिका और यूरोप के नाटो देशों में दरार पैदा हो चुकी है। अतः दक्षिण एशिया के देशों को चीन की आक्रामकता के विरुद्ध क्वाड को सशक्त रणनीतिक मोर्चा बनाना चाहिए, तभी ताइवान सहित अन्य देशों की हिफाजत हो सकेगी। भारत को कूटनीति पहल करके रूस को आश्वस्त करना चाहिए कि क्वाड एक रक्षात्मक रणनीतिक मोर्चा है और क्वाड में रूस को भी शामिल करने का प्रयास भारत को करना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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