Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

मोनिका शर्मा का लेख : बच्चों की सेहत सर्वोपरि

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने ऑनलाइन पढ़ाई से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनके तहत स्मार्टफोन और लैपटॉप पर हो रही ऑनलाइन पढ़ाई से बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ने से परेशान अभिभावकों की चिंता को दूर किया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्री-प्राइमरी के बच्चों के लिए रोज 30 मिनट और पहली से 12वीं तक के बच्चों के लिए 30 से 45 मिनट के अधिकतम चार सत्रों की समय सीमा तय की है। बच्चों की स्वास्थ्य को देखते हुए यह सही भी है।

हिमाचल में बच्चों की पढ़ाई अब रेडियो से...
X
प्रतीकात्मक तस्वीर

मोनिका शर्मा

कोरोना काल में सहजता से चल रही जिंदगी कई नई चिंताओं से घिर गई है। हाल में ऐसी ही एक फिक्र का समाधान करते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने ऑनलाइन पढ़ाई से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनके तहत स्मार्टफोन और लैपटॉप पर हो रही ऑनलाइन पढ़ाई से बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ने से परेशान अभिभावकों की चिंता को दूर किया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 'प्रज्ञाता' नाम से गाइडलाइन जारी करते हुए प्री-प्राइमरी के बच्चों के लिए रोज 30 मिनट और 1 से 12वीं तक के बच्चों के लिए 30 से 45 मिनट के अधिकतम चार सत्रों की समय सीमा तय की है। योजना, समीक्षा, व्यवस्था, मार्गदर्शन, वार्ता, कार्य, निगरानी और सराहना जैसे आठ बिंदुओं पर गौर करते हुए ये दिशा-निर्देश तैयार किए हैं। अब विद्यालयों को इन निर्देशों के आधार पर ऑनलाइन पढ़ाई करवानी होगी।

गौरतलब है कि कोरोना संकट देखते हुए देशभर के स्कूल कालेजों को 16 मार्च से बंद कर दिया गया था, जिसके बाद नए सत्र की पढ़ाई ऑनलाइन शुरू की गई। बच्चों की सेहत से जुड़े कई पहलुओं पर चिंता जताते हुए अभिभावक लंबे स्क्रीन टाइम को लेकर परेशान थे, लेकिन अब सीबीएसई बोर्ड, केंद्रीय विद्यालय, नवोदय से लेकर सभी राज्यों को अपने-अपने राज्य शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में एचआरडी मंत्रालय के दिशा निर्देशों के अनुसार ऑनलाइन कक्षाएं संचालित की जाएंगी। समय सीमा तय करने का निर्णय उचित और सराहनीय है। असल में देखा जाए तो ऑनलाइन शिक्षा को लेकर अभिभावकों की फिक्र लाजिमी थी। इस संकटकाल में पहले से ही सेहत से जुड़े खतरों का भय बना हुआ है। ऐसे में बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ना न केवल उनकी नजर कमजोर करने वाला बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दूसरी परेशानियों को न्योता देने वाला भी था।

हालांकि यह भी सच है कि कोरोना संक्रमण के फैलने की चिंताओं के बीच नए सत्र में ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करना ही एकमात्र रास्ता बचा है। यही वजह है कि विद्यार्थियों, शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन और बच्चों के माता-पिता की परेशानियों को पर गौर करते हुए यह दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। छात्रों की पढ़ाई सुचारू रखते हुए स्वास्थ्य का ख्याल रखने के लिए पढ़ाई की अवधि से जुड़ी नियमावली आवश्यक भी थी। सुखद है किगाइडलाइंस में साइबर दुनिया से जुड़े अन्य पहलुओं पर विचार किया गया है। डिजिटल शिक्षा से जुड़ी इस नियमावली में स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों को बच्चों से जुड़ीं सूचनाओं की गोपनीयता और साइबर सुरक्षा को सुनिश्चित करने की बात भी कही गई है। साथ ही 'प्रज्ञाता' के दिशा-निर्देश बच्चों की शारीरिक और मानसिक सेहत ही नहीं साइबर सुरक्षा को लेकर अभिभावकों को भी जागरूक और सजग करते हैं। दिशा-निर्देश डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल से समय बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में भी समझाते हैं। इतना ही नहीं इन गाइडलाइंस में स्कूली कक्षाओं के लिए स्मार्टफोन या लैपटॉप का लंबे समय तक इस्तेमाल बच्चों में तनाव, गलत पोस्चर में बैठने से जुड़ी तकलीफ़ों और आंखों से जुड़ी समस्याओं से संबंधित जानकरियां दी गई हैं।

दरअसल, डिजिटल उपकरणों की स्क्रीन के सामने बीत रहे समय और बच्चों की स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों में सीधा संबंध है। खासकर आंखों और शरीर के गलत पोस्चर से जुड़ी व्याधियां चिंता का विषय हैं। कुछ समय पहले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक अध्ययन में सामने आया था कि भारत के लगभग 13 फीसदी स्कूली बच्चों की दूर की नजर कमजोर है। अध्ययन के मुताबिक़ पिछले एक दशक में यह संख्या बढ़कर दोगुनी हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का इस्तेमाल बढ़ने से बच्चों में नज़र कमज़ोर होने के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। बच्चे टैब, स्मार्टफोन और लैपटॉप पर 30-40 फीसदी वक्त नज़दीक की चीजें देखने में लगा रहे हैं, जिसके चलते उनकी दूर की नजर धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। हमारे यहां 18 वर्ष से कम उम्र की आयु के 41 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी नेत्र विकार से जूझ रहे हैं। साथ ही कम उम्र में ही अब आंखों में संक्रमण, कम दिखना और आंखों का सूखना आदि शिकायतें भी अब आम है। हालिया वर्षों में यूं भी बच्चे अपना काफी वक्त स्मार्ट गैजेट्स के साथ बिता रहे हैं। लंबे समय तक बैठे रहने या गलत पोस्चर में बैठने के कारण कमर दर्द और हड्डियों से जुड़ी परेशानियां भी बढ़ रही हैं । ऐसे में अब स्कूल की पढ़ाई ऑनलाइन जारी रखते हुए स्क्रीन के आगे बीत रहे समय की सीमा और सही पोस्चर जैसी कई बातों का खयाल रखना जरूरी भी है।

कोविड-19 के संकट काल में स्कूलों में नामांकित करीब 24 करोड़ बच्चे प्रभावित हुए हैं। कोरोना काल में सीखने-सिखाने के तरीके बदल गए हैं। ऐसे में बच्चों की दिनचर्या से लेकर सामाजिक मेलजोल तक, सब कुछ प्रभावित हुआ है। यहां तक कि उनके सामाजिक-भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ने का खतरा है। लंबा स्क्रीन टाइम और तकनीक की दुनिया से जुड़े कई भय अचानक बच्चों की दुनिया में शामिल हो गए। मासूमों की खेल-कूद की गतिविधियों पर विराम लग गया है। ऐसे में बच्चों में चिड़चिड़ापन, क्रोध, अवसाद और आखों से जुड़ी परेशानियां दस्तक दे रही हैं। ऑनलाइन पढ़ाई के चलते बढ़ रही बुलिइंग प्रवृत्ति को देखते हुए चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्लूसी) ने बाकायदा एक गाइडलाइन भी बनाई है। ऐसे में स्क्रीन अवधि को तय करना और शिक्षकों एवं अभिभावकों के लिए मार्गदर्शन से वाले दिशा-निर्देश बनाए जाना वाकई जरूरी था। यूं भी फिलहाल बच्चों की पढ़ाई को सुचारू रखने का रास्ता ऑनलाइन कक्षाएं चलाना ही है। ऐसे में महामारी के इस दौर में बच्चों की शिक्षा जारी रखने और सेहत सहेजने के लिए कई मोर्चों पर जूझते हुए यह दिशा-निर्देश वाकई मददगार साबित होंगे।

Next Story